मैन्युफैक्चरिंग का बड़ा दांव: GDP में 25% हिस्सेदारी का लक्ष्य
भारत सरकार ने मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की GDP में हिस्सेदारी को मौजूदा 17-17.5% से बढ़ाकर 25% तक ले जाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। इस सपने को पंख लगाने के लिए हालिया बजट के साथ-साथ EU और US के साथ हुए नए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTAs) अहम भूमिका निभाएंगे। इंडस्ट्री लीडर्स इस प्लान को लेकर उत्साहित तो हैं, लेकिन ग्लोबल प्रोटेक्शनिज्म, बढ़ती इंपोर्ट निर्भरता और घरेलू इंडस्ट्रीज, खासकर माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs) की नई ट्रेड डील्स का फायदा उठाने की क्षमता पर गंभीर चिंताएं भी जाहिर कर रहे हैं।
EU और US के साथ ट्रेड की दोहरी राह
EU के साथ हुआ नया FTA भारत के ट्रेड को 41% और EU के ट्रेड को 65% तक बढ़ा सकता है। इससे केमिकल्स, टेक्सटाइल्स और इंजीनियरिंग गुड्स जैसे भारतीय एक्सपोर्ट्स पर टैरिफ तुरंत कम होने की उम्मीद है। यह एग्रीमेंट भारत के 99% से ज्यादा एक्सपोर्ट्स के लिए मार्केट एक्सेस खोलेगा और MSME-संचालित इंडस्ट्रियल हब्स के लिए एक बड़ा बूस्टर साबित हो सकता है। दूसरी तरफ, US के साथ हाल में हुआ एग्रीमेंट कुछ एनालिस्ट्स की नजर में ग्रोथ इंजन से ज्यादा एक 'हार्म रिडक्शन टूल' (नुकसान कम करने का जरिया) है। इसके कारण भारत से US को होने वाले एक्सपोर्ट्स में 22-26% तक की गिरावट आ सकती है, जिसका भारत की GDP पर भी नेगेटिव असर पड़ सकता है। आंकड़े बताते हैं कि 2024 में भारत का US के साथ गुड्स ट्रेड डेफिसिट $45.8 बिलियन था, जबकि दोनों देशों के बीच कुल द्विपक्षीय व्यापार लगभग $212.3 बिलियन रहा।
चीन पर निर्भरता का चक्रव्यूह
चीन पर इंपोर्ट निर्भरता कम करने की बातों के बावजूद, 2024-25 में बीजिंग के साथ भारत का ट्रेड डेफिसिट बढ़कर $99.21 बिलियन हो गया। फर्टिलाइजर्स, केमिकल्स और आयरन/स्टील जैसे सेक्टर्स में इंपोर्ट घटने और मोबाइल फोन इंपोर्ट में आई बड़ी गिरावट के बावजूद, चीन अभी भी कई जरूरी इनपुट्स का मुख्य सोर्स है। गौर करने वाली बात यह है कि भारत अपनी 60-80% रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (REPMs) की जरूरतें चीन से ही पूरी करता है, जो स्ट्रेटेजिक इंडस्ट्रीज की सप्लाई चेन्स में एक बड़ी कमजोरी को दिखाता है। यह निर्भरता 'आत्मनिर्भरता' की कहानी को जटिल बनाती है और सप्लाई चेन्स को डाइवर्सिफाई करने की चुनौती को रेखांकित करती है।
स्केल-अप की जरूरत: MSMEs और टेक्नोलॉजी का एजेंडा
फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की आउटपुट ग्रोथ 4.26% रही और जनवरी 2025 में इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन इंडेक्स (IIP) 5.0% बढ़ा, लेकिन 25% GDP टारगेट को हासिल करने के लिए स्ट्रक्चरल इश्यूज़ को सुलझाना जरूरी है। MSMEs, जो GDP में 8%, मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट में 45% और एक्सपोर्ट्स में 40% का योगदान देते हैं, उन्हें टेक्नोलॉजी अपनाने और स्केल-अप करने में काफी दिक्कतें आ रही हैं। यूनियन बजट 2026-27 में ₹10,000 करोड़ के SME ग्रोथ फंड और एनहांस्ड क्रेडिट गारंटी स्कीम्स का ऐलान इसी कमी को पूरा करने के लिए किया गया है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि MSMEs को FTA की डिमांड्स पूरी करने के लिए सिर्फ ग्रोथ नहीं, बल्कि परफॉरमेंस और टेक्नोलॉजी अपग्रेड को भी इनसेंटिवाइज करना होगा। प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम्स ने $17 बिलियन से ज्यादा का इन्वेस्टमेंट आकर्षित किया है, जिसका मकसद डोमेस्टिक कैपेबिलिटीज को मजबूत करना है। हालांकि, SMEs के लिए FTAs कितने फायदेमंद होंगे, यह अभी भी बहस का विषय है, खासकर सस्ते इंपोर्ट्स से कड़ी प्रतिस्पर्धा को देखते हुए।
एनालिटिकल डीप डाइव: ग्लोबल पोजीशनिंग
भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर, जो GDP में लगभग 17% का योगदान देता है, वैल्यू-एडेड परसेंटेज के मामले में चीन (28%) और जापान (20%) जैसे ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग पावरहाउसेस से पीछे है। अमेरिका की हिस्सेदारी लगभग 11% है, जबकि भारत का लक्ष्य 2028 तक इसे 20.1% तक ले जाना है। निफ्टी इंडिया मैन्युफैक्चरिंग ETF, जो लीडिंग मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों का एक बास्केट है, ने 4 फरवरी 2026 तक 1 साल में 17.2% का रिटर्न दिया है, जो सेक्टर की ग्रोथ स्टोरी में मार्केट की भागीदारी को दर्शाता है। यूनियन बजट 2026-27 एक दो-ट्रैक स्ट्रेटेजी अपना रहा है: स्ट्रेटेजिक, टेक्नोलॉजी-इंटेंसिव सेक्टर्स में कैपेबिलिटीज को गहरा करना और साथ ही जॉब क्रिएशन व एक्सपोर्ट डाइवर्सिफिकेशन के लिए लेबर-इंटेंसिव इंडस्ट्रीज को भी बढ़ावा देना। यह अप्रोच इंडिजीनस प्रोडक्शन और सप्लाई सिक्योरिटी की जरूरत को ग्लोबल कॉम्पिटिटिवनेस और एक्सपोर्ट मार्केट एक्सेस के साथ संतुलित करने का प्रयास है।