India के बॉन्ड बाजार में विदेशी निवेशकों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा रुपए को स्थिर करने के प्रयासों के चलते, विदेशी बॉन्ड निवेशकों के लिए हेजिंग (Hedging) की लागत में भारी इजाफा हुआ है। इससे भारतीय सरकारी बॉन्ड (Government Bonds) पर मिलने वाले रिटर्न (Yield) का फायदा लगभग खत्म हो गया है। RBI के कदम उठाने के बाद से, एक साल के ऑनशोर (Onshore) हेजिंग की लागत लगभग 30 बेसिस पॉइंट (Basis Points) बढ़ गई है, जबकि ऑफशोर नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड (NDF) मार्केट में यह लागत 70 बेसिस पॉइंट तक बढ़ी है। NDF मार्केट में हेजिंग की लागत एक दशक में सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है, जिससे विदेशी निवेशकों के लिए रुपए के जोखिम को मैनेज करना महंगा और मुश्किल हो गया है। Eastspring Investments के पोर्टफोलियो मैनेजर Matthew Kok का कहना है, 'निवेशकों को अब जोखिम उठाने के बदले बहुत कम रिटर्न मिल रहा है।' उनकी कंपनी भारतीय बॉन्ड पर न्यूट्रल (Neutral) नजरिया रखती है।
वहीं, दूसरी ओर ईरान में चल रहे संघर्ष के कारण तेल की कीमतों में लगातार उछाल आ रहा है, जिससे शेयर बाजार के निवेशकों की चिंताएं और बढ़ गई हैं। भारत अपनी 90% से ज्यादा तेल की जरूरत मध्य पूर्व से ही पूरा करता है, इसलिए सप्लाई में किसी भी तरह की रुकावट या कीमतों में उतार-चढ़ाव का अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ता है। ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude Oil) की कीमतें करीब $91.50 प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। ऊर्जा की बढ़ी हुई लागत कंपनियों के लिए पहले से मौजूद समस्याओं, जैसे कि स्टॉक की ऊंची वैल्यूएशन (Valuation) और धीमी मुनाफा ग्रोथ (Profit Growth), को और गंभीर बना रही है।
इन सब वजहों के चलते विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से लगातार पैसा निकाल रहे हैं। 28 फरवरी के बाद से उन्होंने भारतीय सरकारी डेट (Debt) से करीब ₹211 अरब (या $2.26 अरब) निकाल लिए हैं, और RBI के करेंसी नियमों की घोषणा के बाद यह बिकवाली और तेज हो गई। इक्विटी (Equity) यानी शेयरों से तो निकासी और भी बड़ी है, अनुमान है कि 2025 की शुरुआत से अब तक करीब $38 अरब निकाले गए हैं, जिसमें अकेले मार्च में रिकॉर्ड $12.7 अरब की बिकवाली शामिल है। इसके नतीजतन, बेंचमार्क Nifty 50 इंडेक्स साल-दर-तारीख (Year-to-Date) 7% से ज्यादा गिर चुका है और फिलहाल 23,850 के स्तर के आसपास कारोबार कर रहा है।
भारतीय बाजार की आकर्षण क्षमता अब पॉलिसी से जुड़े खर्चे (Policy Risks) और फंडामेंटल वैल्यूएशन (Valuation) की चिंताओं के कारण लगातार घट रही है। RBI की करेंसी पॉलिसी ने हेजिंग खर्चों को बढ़ाकर विदेशी बॉन्डधारकों के नेट रिटर्न को सीधे तौर पर कम कर दिया है। इसके अलावा, भारतीय शेयर बाजार की फॉरवर्ड प्राइस-टू-अर्निंग्स (P/E) रेश्यो करीब 23x है, जो इमर्जिंग मार्केट (Emerging Market) के औसत 19x से काफी ऊपर है। यह महंगा वैल्यूएशन बाजार को और गिरावट के लिए संवेदनशील बनाता है, खासकर जब कंपनियों के मुनाफे पर दबाव है। ब्रोकरेज फर्मों ने भी अपने अनुमानों को कम करना शुरू कर दिया है। Goldman Sachs ने अगले दो वर्षों के लिए भारत की अर्निंग्स ग्रोथ फोरकास्ट (Earnings Growth Forecast) में कुल 9 प्रतिशत अंकों की कटौती की है। Nomura का मानना है कि अगर तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो कंसेंसस अर्निंग्स एस्टिमेट्स (Consensus Earnings Estimates) पर 10-15% तक की गिरावट का जोखिम है, और उन्होंने Nifty 50 के दिसंबर 2026 के टारगेट को 15% घटाकर 24,600 कर दिया है। वर्तमान 10-वर्षीय भारतीय सरकारी बॉन्ड यील्ड लगभग 7.15% है, जो हेजिंग की लागतों के साथ मिलकर जोखिम की तुलना में बहुत कम रिटर्न दे रहा है।
यह सब देखते हुए, यह कहना मुश्किल है कि भले ही तत्काल भू-राजनीतिक तनाव कम हो जाएं, तो भी भारत के प्रति सेंटिमेंट (Sentiment) में जल्दी सुधार होगा। First Sentier Investors के एशियन फिक्स्ड इनकम हेड Nigel Foo बताते हैं कि करेंसी स्टेबिलिटी (Currency Stability) को लेकर लगातार चिंताएं बनी हुई हैं, और विदेशी निवेशकों का भरोसा वापस लाने के लिए शायद ऊंचे बॉन्ड यील्ड (Bond Yields) की जरूरत पड़ेगी। उनका मानना है कि तेल की कीमतें गिरने पर भी, करेंसी जोखिमों के कारण सेंटिमेंट में तुरंत बदलाव की संभावना कम है। Aberdeen Investments जैसी फर्मों के एशिया और इमर्जिंग मार्केट इक्विटी फंड भारतीय शेयरों में अंडरवेट (Underweight) पोजिशन लिए हुए हैं। मार्च और अप्रैल की शुरुआत में देखी गई विदेशी पूंजी की निकासी, करेंसी पॉलिसी और भू-राजनीतिक घटनाओं के भारत के इन्वेस्टमेंट अट्रैक्टिवनेस (Investment Attractiveness) पर पड़ने वाले प्रभाव के प्रति निवेशकों की बढ़ती सतर्कता और जांच को दर्शाती है।