यह $21 बिलियन का आंकड़ा, जो कई अनुमानों से कम था, सतह पर तो अच्छा लग रहा है, पर यह किसी स्थायी आर्थिक मजबूती का नहीं, बल्कि बाहरी झटकों का नतीजा है। हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसी लॉजिस्टिकल रुकावटों के कारण इंपोर्ट में भारी कमी आई, विशेषकर सोने और तेल के इंपोर्ट में।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, सोने का इंपोर्ट गिरकर करीब $3.1 बिलियन और तेल का इंपोर्ट $12.2 बिलियन रहा। यह समझना महत्वपूर्ण है कि इंपोर्ट में यह गिरावट मांग में कमी से नहीं, बल्कि सप्लाई में दिक्कत से हुई। जैसे ही ये सप्लाई चेन की दिक्कतें सामान्य होंगी, इंपोर्ट के आंकड़े फिर बढ़ेंगे और इस अस्थायी डेफिसिट (deficit) में कमी का असर खत्म हो जाएगा। भारतीय रुपया (Indian Rupee) भी इन चिंताओं को दर्शाता हुआ 83.00-83.50 के आसपास अस्थिर बना हुआ है। वहीं, 2026-2027 के लिए अनुमानित मध्यम ग्लोबल ग्रोथ को देखते हुए, भारत के एक्सपोर्ट (Export) सेक्टर को भी भू-राजनीतिक तनाव और महंगाई जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।
हालांकि भारत की घरेलू ग्रोथ FY27 में 6.5-7.0% रहने और महंगाई RBI के 2-6% बैंड में रहने का अनुमान है, देश बाहरी फैक्टर्स के प्रति अधिक संवेदनशील है। चीन के विपरीत, जिसके पास मजबूत Trade Surplus है, या वियतनाम, जो अपने बढ़ते डेफिसिट से जूझ रहा है, भारत का Trade Balance ग्लोबल कमोडिटी की कीमतों और मांग से बहुत प्रभावित होता है। FY27 के लिए ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude Oil) की कीमतें $80-$95 प्रति बैरल के बीच रहने की उम्मीद है, लेकिन लगातार भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण इनमें तेज उछाल का जोखिम बना हुआ है। तेल की ऐसी कीमतें सीधे भारत के इंपोर्ट बिल को बढ़ाती हैं। ऐतिहासिक रूप से, तेल की कीमतों में बड़े उछाल Current Account Deficit (CAD) और मुद्रा के अवमूल्यन (currency depreciation) से जुड़े रहे हैं, जिससे मॉनेटरी पॉलिसी (Monetary Policy) कड़ी हो सकती है।
इसके अलावा, इंडस्ट्रियल इनपुट्स (industrial inputs) का इंपोर्ट कम हुआ है, जो घरेलू उत्पादन में संभावित मंदी का संकेत देता है। फिलहाल यह इंपोर्ट को कम कर रहा है, लेकिन आर्थिक गतिविधियों में रिकवरी इंपोर्ट की मांग को फिर बढ़ा सकती है, बिना एक्सपोर्ट ग्रोथ के। यह बाहरी खातों के लिए एक संरचनात्मक जोखिम पैदा करता है।
मजबूत सर्विसेज सेक्टर (Services Sector) के $18.2 बिलियन के सरप्लस के बावजूद, यह मर्चेंडाइज ट्रेड (Merchandise Trade) के घाटे को पूरी तरह से कवर करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता है। खाड़ी देशों से आने वाले रेमिटेंस (remittances) में संभावित गिरावट भी भारत के Current Account पर जोखिम बढ़ाती है। Yes Securities का अनुमान है कि FY27 में Current Account Deficit बढ़कर $70.1 बिलियन यानी GDP का 1.6% हो सकता है। अगर तेल की कीमतें $85-$95 प्रति बैरल के औसत पर रहती हैं, तो यह 1.6-2.0% तक भी पहुंच सकता है, जो भारत की बाहरी कमजोरियों को दर्शाता है। भारत की घरेलू मांग की मजबूती, विरोधाभासी रूप से, आर्थिक गतिविधियों के तेज होने पर इंपोर्ट की जरूरतें बढ़ा सकती है, बिना एक्सपोर्ट में समान तेजी के। यह बाहरी खातों के लिए एक संरचनात्मक जोखिम पैदा करता है, खासकर अगर वैश्विक मांग उम्मीद से ज्यादा कमजोर होती है या भू-राजनीतिक घटनाएं कमोडिटी सप्लाई को और बाधित करती हैं।
कुल मिलाकर, विश्लेषकों को भारत के बाहरी वित्त के लिए एक चुनौतीपूर्ण वित्तीय वर्ष की उम्मीद है। Moody's और Fitch जैसी रेटिंग एजेंसियों ने स्थिर आउटलुक बनाए रखा है, लेकिन वे बाहरी जोखिमों पर कड़ी नजर रख रही हैं। Reserve Bank of India (RBI) से उम्मीद है कि वह आर्थिक विकास, मूल्य स्थिरता और बाहरी खातों के प्रबंधन के बीच संतुलन बनाए रखेगा। हालांकि, अस्थिर ग्लोबल ऑयल प्राइसेज और ट्रेड फ्लो के कारण FY27 में Current Account Deficit के बढ़ने की आशंकाएं बनी हुई हैं। तेल की ऊंची कीमतें या वैश्विक मंदी डेफिसिट को अनुमान से ज्यादा बढ़ा सकती है, जिसके लिए सावधानीपूर्वक आर्थिक प्रबंधन की आवश्यकता होगी।