IBC का 'ऑपरेशन रिवाइवल' सवालों के घेरे में? ज़्यादा कंपनियां बंद, कम रिवाइव, जानें असली वजह!

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AuthorMehul Desai|Published at:
IBC का 'ऑपरेशन रिवाइवल' सवालों के घेरे में? ज़्यादा कंपनियां बंद, कम रिवाइव, जानें असली वजह!
Overview

भारत का इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) असल में तो डूबी हुई कंपनियों को उबारने के लिए बनाया गया था, न कि उन्हें बंद करने के लिए। लेकिन, नए आंकड़े बता रहे हैं कि अब ज़्यादातर मामले कंपनियों को रिवाइव करने की बजाय सीधे लिक्विडेशन (Liquidation) यानी बंद करने की ओर जा रहे हैं। यह बदलाव इस कानून की असलियत पर सवाल खड़े कर रहा है और बताता है कि कंपनियों को बचाने के लिए समय पर फाइलिंग कितनी ज़रूरी है।

रिवाइवल की कोशिशें नाकाम, बंद होने की कतार में ज़्यादा कंपनियाँ?

IBC को कंपनियों की समस्याओं को सुलझाने और उन्हें फिर से खड़ा करने के मकसद से लाया गया था। मगर, एक बड़ी सच्चाई सामने आ रही है कि ज़्यादातर केस रिवाइवल की सफल योजनाओं के बजाय लिक्विडेशन में खत्म हो रहे हैं। इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी बोर्ड ऑफ इंडिया (IBBI) के आंकड़े बताते हैं कि IBC अब तेजी से कंपनियों को बंद कराने का ज़रिया बनता जा रहा है, जो इसके मूल मकसद पर ही सवाल उठाता है।

देर से फाइलिंग, रिवाइवल की उम्मीदें खत्म

कई कंपनियां इंसॉल्वेंसी प्रोसेस, जिसे CIRP (कॉर्पोरेट इंसॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन प्रोसेस) कहते हैं, में तब आती हैं जब उन्हें बचाना बहुत मुश्किल हो जाता है। तब तक उनका कामकाज रुक चुका होता है, स्टाफ जा चुका होता है और कंपनी की वैल्यू भी काफी कम हो चुकी होती है। जब कोई बिजनेस इस स्टेज पर पहुंच जाता है, तो उसे रिवाइव करना बेहद कठिन हो जाता है। ऐसे में लिक्विडेशन एक फॉर्मल स्टेप बन जाता है, उस बिजनेस के लिए जो पहले ही नाकाम हो चुका है। इससे पता चलता है कि IBC फ्रेमवर्क से ज़्यादा, इंसॉल्वेंसी फाइलिंग का 'टाइमिंग' ही कंपनी के बचने की कुंजी है।

बड़े रिज़ॉल्यूशन और देरी की मार

चुनौतियों के बावजूद, IBC ने Essar Steel India Limited (जिसे ArcelorMittal और Nippon Steel Corporation ने खरीदा) और Bhushan Power and Steel Limited (जिसकी डील JSW Steel ने की) जैसी बड़ी कंपनियों के लिए सफल रिज़ॉल्यूशन (Resolution) सुनिश्चित किए हैं। ये उदाहरण IBC की क्षमता दिखाते हैं, खासकर तब जब कंपनियां अभी भी चलने लायक हों और खरीदार मिल जाएं। हालांकि, रिज़ॉल्यूशन को एक तय समय-सीमा के अंदर पूरा करने का वादा—शुरुआत में 180 दिन, जिसे 330 दिन तक बढ़ाया जा सकता था—अक्सर पूरा नहीं हो पाता। लंबी देरी, जो कभी-कभी दावों (Claims), बिडर की योग्यता, रेगुलेटरी बाधाओं और टैक्स मुद्दों पर मुकदमों के कारण दो से तीन साल तक खिंच जाती है, कंपनी की वैल्यू को खत्म कर देती है और ज़्यादातर मामलों को लिक्विडेशन की ओर धकेल देती है।

अदालतों के फैसले, देरी और रिज़ॉल्यूशन टीम्स

सुप्रीम कोर्ट के अहम फैसले, जैसे कि Swiss Ribbons केस में व्यवसायों को सुलझाने पर सुप्रीम कोर्ट का फोकस और Ghanashyam Mishra केस में पिछले कर्जों (Past Debts) की स्पष्टता, ने IBC के कामकाज को आकार दिया है। हालांकि इन फैसलों ने स्पष्टता लाई, लेकिन लगातार कानूनी लड़ाइयों ने भी काफी देरी की है। रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल (Resolution Professionals) कानूनी विवादों को कम करने और प्रैक्टिकल रीस्ट्रक्चरिंग प्लान्स पर ध्यान केंद्रित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। तेज प्रक्रियाएं बहुत ज़रूरी हैं, क्योंकि तुरंत की गई कार्रवाई सीधे कंपनी के जीवित रहने की संभावनाओं को बढ़ाती है।

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