भारत का इंफ्रास्ट्रक्चर प्लान: खर्च बढ़ा, पर काम क्यों अटका?

ECONOMY
Whalesbook Logo
AuthorMehul Desai|Published at:
भारत का इंफ्रास्ट्रक्चर प्लान: खर्च बढ़ा, पर काम क्यों अटका?
Overview

भारत सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी खर्च करने की तैयारी में है, लेकिन प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा करने में बड़ी चुनौतियां सामने आ रही हैं। यूनियन बजट में कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capital Expenditure) बढ़ाने की बात कही गई है, लेकिन भूमि अधिग्रहण, रेगुलेटरी परमिशन और प्रोजेक्ट प्लानिंग में देरी के कारण काम अटक रहा है।

इंफ्रास्ट्रक्चर पर सरकार का ज़ोर, पर एग्जीक्यूशन में क्यों हो रही है देरी?

यूनियन बजट में भारत सरकार ने साफ कर दिया है कि देश की तरक्की का मुख्य इंजन इंफ्रास्ट्रक्चर ही होगा। इसी सोच के साथ सरकार ने पिछले कुछ सालों में इंफ्रास्ट्रक्चर पर पब्लिक कैपिटल एक्सपेंडिचर (सार्वजनिक पूंजीगत व्यय) में ज़बरदस्त बढ़ोत्तरी की है। यह खर्च देश की GDP के मुकाबले भी बढ़ा है, जो पिछली बार की फिस्कल पाबंदियों से एक बड़ा बदलाव दिखाता है। लेकिन, असली कहानी फंड बांटने से शुरू होकर उसे ज़मीन पर उतारने, यानी एग्जीक्यूशन (Execution) की है, जहाँ देश की योजनाओं को हकीकत में बदलने की रफ़्तार बजट की प्रतिबद्धताओं से पीछे छूट रही है।

एग्जीक्यूशन डेफिसिट: क्यों लटक रहे हैं प्रोजेक्ट्स?

बजट में जहाँ एक ओर मजबूत पब्लिक कैपिटल एक्सपेंडिचर पर ज़ोर है, वहीं दूसरी ओर प्रोजेक्ट्स की निगरानी के आंकड़े लगातार बताते हैं कि काम बहुत धीमा है। खासकर हाईवे और शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे ज़रूरी सेक्टर्स में, प्रोजेक्ट्स तय समय और बजट से बहुत ज़्यादा आगे निकल जाते हैं। भूमि अधिग्रहण (Land Acquisition) में मुश्किल, समय पर रेगुलेटरी क्लीयरेंस (Regulatory Clearance) न मिलना, और शुरू से ही प्रोजेक्ट की कमजोर प्लानिंग, ये लगातार बताई जाने वाली बड़ी रुकावटें हैं। फंड की बढ़त और नतीजों में दिख रहा यह बड़ा अंतर बताता है कि भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर की असली चुनौती अब खर्च की रकम नहीं, बल्कि उसे डिलीवर करने वाली सिस्टम की इफेक्टिवनेस (Effectiveness) है।

फाइनेंसिंग और प्लानिंग में स्ट्रक्चरल गैप

भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस (Infrastructure Finance) के माहौल में तीन बड़ी स्ट्रक्चरल कमियां हैं। पहली, 'बैंक योग्य' (Bankable) प्रोजेक्ट्स की कमी। कई प्रोजेक्ट्स जमीन पक्की हुए बिना, मांग का ठीक से आकलन किए बिना, या कमाई और रिस्क शेयरिंग के स्पष्ट ढांचे के बिना ही शुरू हो जाते हैं। ऐसे में देरी और बढ़ते खर्चे लाज़मी हैं, जिससे निवेशकों का भरोसा कम होता है। इंटरनेशनल अनुभव बताता है कि प्रोजेक्ट की शुरुआती तैयारी, जैसे फीजिबिलिटी स्टडीज, एनवायरनमेंटल असेसमेंट और फाइनेंशियल स्ट्रक्चरिंग में थोड़ा सा निवेश भी बाद में फिस्कल दबाव और कॉन्ट्रैक्ट से जुड़े मुद्दों को काफी हद तक कम कर सकता है। इस फाउंडेशन वर्क के बिना, बड़े कैपिटल आउटलेज (Capital Outlays) सिर्फ 'स्ट्रैंडेड एसेट्स' (Stranded Assets) यानी बेकार पड़े प्रोजेक्ट्स का ढेर लगा सकते हैं।

दूसरी, एसेट मोनेटाइजेशन (Asset Monetization) - जो डेट-फ्री फाइनेंसिंग का एक ज़रूरी टूल है - वह भरोसे पर टिकी है। ट्रांसपेरेंट वैल्यूएशन, कॉम्पिटिटिव बिडिंग और सर्विस क्वालिटी की सुरक्षा ज़रूरी है। इनके बिना, मोनेटाइजेशन को एक शॉर्ट-टर्म फिस्कल उपाय के तौर पर देखा जा सकता है, न कि एक सस्टेनेबल रणनीति के तौर पर।

तीसरी, फाइनेंसिंग का आधार (Financing Base) अभी भी बहुत सीमित है। ज़्यादातर फाइनेंस बैंकों और बजट के पैसों से आता है। लॉन्ग-टर्म डोमेस्टिक इन्वेस्टर्स, जैसे पेंशन फंड्स और इंश्योरेंस कंपनियों की भागीदारी बहुत कम है, जो मिलकर अपने फंड का सिर्फ लगभग 6% इंफ्रास्ट्रक्चर में लगाते हैं। लॉन्ग-डेटेड बॉन्ड्स (Long-dated bonds) का इस्तेमाल बढ़ाना और म्युनिसिपल फाइनेंस मैकेनिज्म (Municipal finance mechanisms) को मजबूत करना, इन एसेट्स के लाइफसाइकिल के साथ फाइनेंसिंग को अलाइन करने के लिए बहुत ज़रूरी है।

क्या हैं बड़े जोखिम?

खर्च और नतीजों के बीच लगातार दिख रहा यह अंतर उन सिस्टमैटिक कमजोरियों को दिखाता है जो बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर एजेंडे पर सवाल खड़े करती हैं। 'बैंक योग्य' प्रोजेक्ट्स की कमी, जो अक्सर ज़रूरी तैयारी के बिना जल्दबाजी में शुरू होते हैं, देरी और लागत बढ़ने का कारण बनती है। इससे निवेशकों का भरोसा घटता है और नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (Non-performing Assets) बनने का खतरा बढ़ जाता है। एसेट मोनेटाइजेशन, जिसे फंडिंग का समाधान बताया जा रहा है, पारदर्शिता और भरोसे को लेकर चुनौतियों का सामना कर रहा है; मजबूत सुरक्षा उपायों के बिना, यह एक सतही फिस्कल फिक्स (Fiscal fix) बनकर रह सकता है, न कि एक टिकाऊ रणनीति। फाइनेंसिंग का सीमित आधार, जो बैंकों और बजट आवंटन पर ज़्यादा निर्भर है, भारत को लिक्विडिटी की कमी (Liquidity constraints) और लंबे समय तक चलने वाले प्रोजेक्ट्स के लिए ज़रूरी 'पेशेंट कैपिटल' (Patient capital) तक पहुंचने में बाधा डालता है। इसके अलावा, ऑपरेशंस और मेंटेनेंस (O&M) पर लगातार कम ध्यान देना मौजूदा एसेट्स की उम्र और आर्थिक रिटर्न को खतरे में डालता है, और यह भेद्यता जलवायु परिवर्तन के जोखिमों से और बढ़ जाती है। ICRA और India Ratings जैसी रेटिंग एजेंसियों का कहना है कि कम क्रेडिट रेटिंग्स और ज़्यादा माने जाने वाले रिस्क, लॉन्ग-टर्म निवेशकों को हतोत्साहित करते हैं, जिसके लिए बैंकबिलिटी बढ़ाने हेतु इनोवेटिव फाइनेंसिंग स्ट्रक्चर (Innovative financing structures) और बेहतर प्रोजेक्ट अप्रेजल (Project appraisal) की ज़रूरत है। रेगुलेटरी अनिश्चितताएं (Regulatory uncertainties), भूमि अधिग्रहण विवाद और कानूनी प्रवर्तन के मुद्दे भी प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन को एक जोखिम भरा काम बनाते हैं।

आगे का रास्ता क्या है?

आगे का रास्ता केवल खर्च बढ़ाने से हटकर डिलीवरी सिस्टम को मजबूत करने की ओर एक बड़े बदलाव की मांग करता है। वर्ल्ड बैंक (World Bank) और ADB जैसे इंटरनेशनल इंस्टीट्यूशंस, बैंकबिलिटी सुधारने के लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी (Private sector involvement) और मजबूत प्रोजेक्ट अप्रेजल फ्रेमवर्क (Project appraisal frameworks) की ज़रूरत पर ज़ोर देते हैं। NaBFID जैसे संस्थान फाइनेंसिंग गैप को पाटने के लिए स्थापित किए जा रहे हैं, लेकिन उनका पूरा असर अभी देखा जाना बाकी है। प्रोजेक्ट की तैयारी, फाइनेंसिंग और मेंटेनेंस में संस्थागत चुनौतियों का समाधान, साथ ही डिजाइन स्टैंडर्ड्स में जलवायु लचीलेपन (Climate resilience) को एकीकृत करना, सर्वोपरि होगा। ऐसा न करने पर, पब्लिक इन्वेस्टमेंट बर्बाद होने और भारत की लॉन्ग-टर्म इकोनॉमिक एस्पिरेशंस (Economic aspirations) को झटका लगने का खतरा है।

Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.