फिस्कल पॉलिसी (Fiscal Policy) अब स्थिरता की ओर
भारत की आर्थिक रणनीति ग्रोथ बढ़ाने के लिए बड़े कैपिटल स्पेंडिंग (Capital Spending) से हटकर फिस्कल स्टेबिलिटी (Fiscal Stability) पर फोकस करती दिख रही है। सालों तक, मजबूत कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capital Expenditure) GDP ग्रोथ का एक अहम जरिया रहा है, लेकिन मौजूदा फाइनेंशियल माहौल एक बदलाव का संकेत दे रहा है। ₹1.25 लाख करोड़ से ₹1.5 लाख करोड़ तक की अनुमानित कमी सरकारी खजाने के लिए एक मुश्किल स्थिति पैदा कर रही है। चूँकि ग्लोबल सिक्योरिटी (Global Security) चिंताओं को देखते हुए डिफेंस स्पेंडिंग (Defence Spending) जरूरी है, इसलिए एडजस्टमेंट (Adjustment) का भार नॉन-डिफेंस प्रोजेक्ट्स पर पड़ने की संभावना है, जिससे आने वाले फाइनेंशियल ईयर में इन प्रोजेक्ट्स के पूरा होने की रफ्तार धीमी हो सकती है।
ऑयल कंपनियों (Oil Companies) और रेवेन्यू (Revenue) में उतार-चढ़ाव
पब्लिक सेक्टर ऑयल कंपनियां (Public Sector Oil Companies) एक मुश्किल स्थिति में हैं। इन कंपनियों को अपने फ्यूल सेल्स (Fuel Sales) पर ब्रेक-ईवन (Break-even) के लिए $85 और $87 प्रति बैरल के बीच तेल की कीमतों की जरूरत है। इसका मतलब है कि सरकार से किसी भी अतिरिक्त टैक्स (Tax) या लेवी (Levy) को झेलने के लिए उनके पास बहुत कम गुंजाइश है। अगर सरकार फ्यूल प्राइस (Fuel Price) को स्थिर रखने के बजाय अपने डेफिसिट टारगेट (Deficit Target) को पूरा करने को प्राथमिकता देती है, तो उपभोक्ताओं को ऊंची कीमतों का सामना करना पड़ सकता है, या सरकार को कम डिविडेंड पेमेंट (Dividend Payment) मिल सकता है। यह सरकार की कैपिटल स्पेंडिंग को फंड (Fund) करने की क्षमता को और जटिल बनाता है। ऐतिहासिक रूप से, जब सरकारी डिविडेंड (Government Dividend) घटता है, तो गैप (Gap) अक्सर सरकारी संपत्तियों को बेचकर भरा जाता है, एक ऐसी रणनीति जो पहले मिले-जुले नतीजों और देरी का शिकार रही है।
फिस्कल इम्बैलेंस (Fiscal Imbalance) के रिस्क (Risks)
सरकार के कमाई से ज्यादा खर्च करने का जोखिम केवल अकाउंटिंग एरर (Accounting Error) से कहीं बढ़कर है; यह मीडियम टर्म (Medium Term) में डेफिसिट (Deficit) को कम करने की अपनी योजनाओं की विश्वसनीयता को खतरे में डालता है। Morgan Stanley जैसी संस्थाओं की भविष्यवाणियों से पता चलता है कि कम टैक्स इनकम (Tax Income) और फर्टिलाइजर सब्सिडी (Fertilizer Subsidy) की ऊंची लागत फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) को GDP के लगभग 4.5% तक बढ़ा सकती है। यह हाल के वर्षों में पब्लिक फाइनेंस (Public Finance) को कंसोलिडेट (Consolidate) करने में हुई प्रगति को उलट देगा। प्राइवेट कंपनियों के विपरीत, जो अपने निवेशों को जल्दी से एडजस्ट (Adjust) कर सकती हैं, सरकार की लॉन्ग-टर्म इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स (Long-term Infrastructure Projects) के प्रति प्रतिबद्धता का मतलब है कि फंडिंग में थोड़ी सी भी रुकावट से लागत में भारी वृद्धि और अक्षमताएं हो सकती हैं।
जियोपॉलिटिकल (Geopolitical) और इकोनॉमिक शॉक (Economic Shocks)
एनालिस्ट (Analysts) संभावित व्यवधानों के लिए मिडिल ईस्ट (Middle East) पर कड़ी नजर रख रहे हैं। हालांकि तेल की कीमतों में वर्तमान बदलाव एक फोकस हैं, कुछ फर्मों का अनुमान है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) के बंद होने जैसे बड़े सप्लाई इंटरप्शन (Supply Interruption) की 40% संभावना है। यह इस बात पर प्रकाश डालता है कि भारत की अर्थव्यवस्था बाहरी घटनाओं के प्रति कितनी संवेदनशील है। अगर ऐसी कोई संकट आता है, तो सब्सिडी की लागत आसमान छू जाएगी, जिससे वर्तमान फिस्कल प्लानिंग (Fiscal Planning) अविश्वसनीय हो जाएगी। नतीजतन, निवेशक सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर कॉन्ट्रैक्ट्स (Government Infrastructure Contracts) से जुड़े स्टॉक्स (Stocks) के लिए उच्च रिटर्न की मांग करने लगे हैं, जो इस चिंता का संकेत दे रहा है कि तेज, अनियंत्रित कैपिटल स्पेंडिंग (Capital Spending) का दौर अधिक चयनात्मक और बाधित दृष्टिकोण को रास्ता दे रहा है।
