छोटे कारोबारियों पर भारी पड़ी ऊर्जा की मार
खाड़ी देशों में उपजे इस ऊर्जा संकट का सीधा असर भारत के शहरी मज़दूरों और छोटे-मोटे कारोबारियों पर पड़ा है। LPG सिलेंडरों के दाम आसमान छू रहे हैं, जिससे लोगों को मिट्टी का तेल, कोयला और लकड़ी जैसे पुराने और महंगे विकल्पों पर लौटना पड़ रहा है। दिल्ली में एक सड़क किनारे ढाबा चलाने वाले सत्यपाल बताते हैं कि उन्हें 2013 के बाद पहली बार मिट्टी का तेल इस्तेमाल करना पड़ रहा है, जिसकी कीमत अब लगभग 32 डॉलर प्रति चूल्हा तक पहुँच गई है। उनके परिवार के लिए LPG सिलेंडर ब्लैक मार्केट में सामान्य कीमत से चार गुना ज़्यादा महंगा मिल रहा है, और उनकी पत्नी को लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाना पड़ रहा है। इस वजह से उनके ढाबे पर रोज़ाना की कमाई आधी रह गई है, और उन्हें खाने के दाम 40 रुपये से बढ़ाकर 50 रुपये करने पड़े हैं, जिससे ग्राहक और कम हो गए हैं। कश्मीरी गेट में 1984 से रेस्टोरेंट चलाने वाले राजू भंडारी ने भी बताया कि उनकी बिक्री आधी हो गई है और उन्हें खाना पकाने के तेल का इस्तेमाल कम करना पड़ा है। जहां पहले उनका रेस्टोरेंट रोज़ाना 4 बड़े LPG सिलेंडर इस्तेमाल करता था, वहीं अब कोयले और लकड़ी पर निर्भर होना पड़ रहा है, जिससे बर्तन धोना भी मुश्किल हो गया है।
सरकार की कोशिशें और असलियत
भारतीय सरकार इस ईंधन संकट के सामाजिक और राजनीतिक असर को समझ रही है। उन्होंने आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल करके घरेलू LPG उत्पादन बढ़ाने और पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के निर्देश दिए हैं। रोज़ाना करीब 10,000 नए PNG कनेक्शन जोड़े जा रहे हैं। सरकार ने जमाखोरी और कालाबाज़ारी रोकने के लिए 3,000 से ज़्यादा छापे भी मारे हैं। सरकारी दावों के अनुसार, देश की 60% मांग अभी पूरी हो रही है। हालांकि, कमर्शियल LPG की सप्लाई में काफी कटौती की गई है। आपको बता दें कि भारत अपनी LPG की ज़रूरत का लगभग 60% आयात करता है, और इसका 90% से ज़्यादा हिस्सा हॉरमुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होकर आता है। सरकार ने कंपनियों को संकट से पहले के स्तर का 70% तक कमर्शियल LPG आवंटन करने का निर्देश दिया है, ताकि कारोबारियों को कुछ राहत मिल सके। हालांकि, ज़मीनी हकीकत सरकारी दावों से काफी अलग नज़र आती है।
बढ़ती कमज़ोरियां
भारत अपनी सीमित रणनीतिक भंडार (strategic reserves) और बड़े स्टॉक की कमी के कारण ऐसे ऊर्जा झटकों के प्रति बहुत संवेदनशील है। यह संकट इस बात को उजागर करता है कि हम आयातित LPG पर कितने ज़्यादा निर्भर हैं। FY26 की पहली छमाही में 10 मिलियन मीट्रिक टन से ज़्यादा का आयात गैप रहा। LPG का भंडारण (storage) क्षमता भी केवल 22 दिनों की ज़रूरत के हिसाब से है, जो लंबी रुकावटों के सामने हमें असुरक्षित बनाता है। घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता देना सामाजिक स्थिरता के लिए ज़रूरी है, लेकिन इससे छोटे व्यवसायों को बड़ा झटका लग रहा है जो ईंधन जल्दी से बदल नहीं सकते। अनौपचारिक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा यह दबाव बढ़ती बेरोज़गारी और लोगों के गांवों की ओर पलायन का कारण बन सकता है। इसके अलावा, प्राकृतिक गैस की कमी से उर्वरक उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है, जिससे खेती-किसानी प्रभावित हो सकती है। आयात लागत बढ़ने से देश के चालू खाते के घाटे (current account deficit) में वृद्धि, महंगाई बढ़ने और रुपये के कमज़ोर होने की आशंका है।
आर्थिकOutlook पर चिंता
आर्थिक मोर्चे पर भी चिंताएं बढ़ रही हैं। Goldman Sachs ने ऊर्जा जोखिमों और महंगाई को देखते हुए 2026 के लिए भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान घटाकर 5.9% कर दिया है। Moody's ने चेतावनी दी है कि गंभीर हालात में Brent क्रूड की कीमतें 64% तक बढ़ सकती हैं, जिससे एशिया-प्रशांत क्षेत्र की GDP को नुकसान होगा। वहीं, OECD का अनुमान है कि FY26-27 में भारत की GDP ग्रोथ 6.1% रहेगी, जो अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं से बेहतर होगी। हालांकि, पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) को तेज़ी से अपनाने और ऊर्जा आयात के स्रोतों में विविधता लाने जैसे सरकारी प्रयासों का नतीजा देखना महत्वपूर्ण होगा। लेकिन फिलहाल, अनौपचारिक क्षेत्र का भविष्य अनिश्चित लग रहा है, जो भू-राजनीतिक तनावों में कमी और घरेलू सप्लाई के स्थिर होने पर निर्भर करेगा।