महंगाई का डबल अटैक!
अप्रैल में भारत की खुदरा महंगाई दर बढ़कर 3.48% हो गई, जो पिछले चार महीनों का उच्चतम स्तर है। खाने-पीने की वस्तुओं के दाम खास तौर पर बढ़े हैं, जो मार्च के 3.87% से बढ़कर 4.20% पर पहुँच गए। हालांकि, यह दर विश्लेषकों की 3.8% की भविष्यवाणी से कम रही, लेकिन घरेलू बजट पर इसका असर साफ दिख रहा है।
इस बढ़ोतरी की जड़ें वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में उछाल से जुड़ी हैं, जिसका मुख्य कारण पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव है। भारत अपनी तेल ज़रूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल की ऊंची कीमतें सीधे तौर पर देश के आयात बिल को बढ़ाती हैं। जानकारों का अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमत में हर $10 का इजाफा भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) को करीब $15 बिलियन तक बढ़ा सकता है और खुदरा महंगाई में 0.3% से 0.4% की बढ़ोतरी कर सकता है।
गिरता रुपया और बढ़ी मुश्किलें
महंगाई की मार झेल रहे भारत पर एक और झटका लगा है - गिरता हुआ रुपया। भारतीय रुपया (USD/INR) 95.6870 के स्तर के करीब पहुँच गया है, जो पिछले एक साल में 12.51% की गिरावट दर्शाता है। कमजोर होता रुपया आयात को और महंगा बना रहा है, जिससे वैश्विक कमोडिटी की ऊंची कीमतों का प्रभाव बढ़ गया है और करंट अकाउंट डेफिसिट का दायरा और चौड़ा हो रहा है।
देश से बाहर जाते पैसे और भारत के भारी आयात बिल को लेकर चिंताएँ रुपये पर लगातार दबाव बना रही हैं। इतिहास गवाह है कि 2011 से 2013 के बीच जब कच्चे तेल की कीमतें ऊंची थीं, तब रुपये में बड़ी गिरावट आई थी और ब्याज दरों में बढ़ोतरी करनी पड़ी थी।
जानकारों की राय और आगे का अनुमान
भारत की यह महंगाई की स्थिति वैश्विक चुनौती का ही एक हिस्सा है, जहाँ ऊर्जा आयात करने वाले देश तेल के झटकों के प्रति संवेदनशील हैं। कई देशों के सामने मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने और आर्थिक विकास को समर्थन देने के बीच मुश्किल चुनाव हैं।
ऐतिहासिक तौर पर, भारत में तेल की कीमतों में उछाल, बढ़ती महंगाई, कमजोर रुपया और बड़े करंट अकाउंट डेफिसिट के बीच सीधा संबंध देखा गया है। 2008 के वित्तीय संकट और यूक्रेन युद्ध जैसी घटनाओं ने भी आयात लागत में वृद्धि, कमजोर मुद्रा और आरबीआई के लक्ष्य स्तर से अधिक महंगाई को जन्म दिया था।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि हालांकि मौजूदा महंगाई के आंकड़े ने कुछ राहत दी है, लेकिन भविष्य में जोखिम बना हुआ है। ICRA के विश्लेषकों का अनुमान है कि खाद्य कीमतों पर खराब मौसम के असर के कारण मई 2026 तक महंगाई दर लगभग 4.1% तक पहुँच सकती है। Kotak Mahindra Bank वैश्विक सप्लाई संबंधी चिंताओं और अल नीनो (El Niño) के डर की ओर इशारा करता है, जिससे यह संकेत मिलता है कि आरबीआई सतर्क रहेगा। आरबीआई का वित्त वर्ष 2026-27 के लिए CPI महंगाई का अनुमान 4.6% है, लेकिन कई विश्लेषकों को उम्मीद है कि यह इस फाइनेंशियल ईयर में 5% को पार कर सकता है।
आर्थिक जोखिम और आगे का रास्ता
पश्चिम एशिया संघर्ष से उत्पन्न उच्च तेल कीमतों और कमजोर रुपये का मेल महत्वपूर्ण जोखिम पैदा करता है। लगातार उच्च ऊर्जा आयात लागत अर्थव्यवस्था में व्यापक मूल्य वृद्धि का कारण बन सकती है, जिससे आरबीआई की ब्याज दरें घटाने की क्षमता सीमित हो जाएगी। इन चिंताओं में संभावित कमजोर मानसून का पूर्वानुमान भी शामिल है, जिसमें अल नीनो की स्थिति का उच्च संभावना है, जो खाद्य कीमतों को और बढ़ा सकता है। यह भारत की महंगाई टोकरी का एक प्रमुख घटक है और ग्रामीण आय और मांग को प्रभावित कर सकता है।
जबकि सरकार उपभोक्ताओं को तत्काल ऊर्जा मूल्य वृद्धि से बचाने की कोशिश कर रही है, अगर वैश्विक कीमतें ऊंची बनी रहीं तो ये उपाय टिकाऊ नहीं हो सकते हैं, जिससे सरकारी खजाने पर दबाव पड़ सकता है। आर्थिक फोकस महंगाई प्रबंधन से हटकर इन सप्लाई झटकों और उनके बाहरी क्षेत्र पर प्रभाव से निपटने की ओर बढ़ रहा है।
RBI की पॉलिसी क्या रहेगी?
विशेषज्ञों को उम्मीद है कि भारतीय रिजर्व बैंक फिलहाल ब्याज दरों को अपरिवर्तित रखेगा और महंगाई के रुझानों तथा वैश्विक जोखिमों पर नज़र रखेगा। हालांकि, ऊर्जा कीमतों, मुद्रा कमजोरी और मौसम संबंधी खाद्य मूल्य वृद्धि से उत्पन्न निरंतर जोखिमों के कारण नीति समीक्षा की आवश्यकता हो सकती है। कुछ विश्लेषक अक्टूबर से संभावित दर वृद्धि की भविष्यवाणी कर रहे हैं, जबकि HSBC का सुझाव है कि वित्त वर्ष 27 के दौरान दो बार दरें बढ़ाई जा सकती हैं। केंद्रीय बैंक का वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 4.6% का महंगाई पूर्वानुमान मौजूदा चुनौतियों को देखते हुए आशावादी साबित हो सकता है।
