तेल की ऊंची कीमतों से महंगाई और रुपये पर दबाव
दुनिया में मचे भू-राजनीतिक घमासान, खासकर मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल (Crude Oil) के दाम $115-120 प्रति बैरल तक पहुँच गए हैं। इससे सप्लाई में रुकावट का डर बढ़ गया है। भारत अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए ऊंची कीमतों का मतलब है कि देश का इंपोर्ट बिल काफी बढ़ जाएगा। विश्लेषकों का मानना है कि इससे हर महीने $7-8 अरब का विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Outflow) बाहर जा सकता है, जिससे चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) बढ़ेगा। भारतीय रुपया पहले ही अहम सपोर्ट लेवल से नीचे फिसल चुका है और फिलहाल यह $1 के मुकाबले 91.9-92.33 के आसपास कारोबार कर रहा है। अगर तनाव जारी रहा तो यह 95 तक भी जा सकता है। मजबूत डॉलर और कमजोर रुपया आयात को और महंगा बना रहा है, जिससे देश के अंदर महंगाई को और बढ़ावा मिल रहा है।
उद्योगों पर कैसा असर?
कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भारत के लगभग हर सेक्टर पर असर डाल रही हैं। एविएशन, मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स, पेंट, केमिकल और फर्टिलाइजर जैसे एनर्जी पर निर्भर उद्योग लागत बढ़ने से भारी दबाव में हैं। खासकर एयरलाइंस के लिए, जिनका परिचालन खर्च (Operating Expenses) का 30-40% सिर्फ ईंधन (Fuel) पर खर्च होता है, यह स्थिति सीधे मुनाफे (Profit) को प्रभावित कर रही है। इसका असर हवाई किराए पर भी दिख सकता है। हालांकि, आईटी सर्विसेज (IT Services) और बैंकिंग जैसे कुछ सेक्टर पर इसका असर कम है। भारत ने 2008, 2013 और 2022 जैसे समय में भी तेल की कीमतों में ऐसे उछाल देखे हैं, जिनका नतीजा महंगाई, कमजोर रुपया और बढ़ते घाटे के रूप में सामने आया था।
RBI के सामने बड़ी चुनौती
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सामने अब एक मुश्किल स्थिति है। भले ही भारत में महंगाई फिलहाल RBI के लक्ष्य 1.8-2.8% के आसपास बनी हुई है, लेकिन तेल की बढ़ती कीमतें इसे फिर से ऊपर ले जा सकती हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के अनुसार, अगर तेल की कीमतों में 10% की बढ़ोतरी होती है, तो इससे महंगाई में सिर्फ 30 बेसिस पॉइंट का इजाफा हो सकता है, बशर्ते यह पूरा बोझ ग्राहकों पर डाला जाए। लेकिन, लगातार ऊंची तेल कीमतें और कमजोर रुपया महंगाई को काफी बढ़ा सकते हैं। ऐसे में, पहले से अपेक्षित ब्याज दरों में कटौती (Interest Rate Cuts) करना RBI के लिए जोखिम भरा हो सकता है, क्योंकि इससे कीमतों का दबाव फिर बढ़ सकता है और चालू खाता घाटा चौड़ा हो सकता है। RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) इस मामले में सतर्क रुख अपनाए हुए है। कमेटी ने पिछली बार दिसंबर 2025 में रेपो रेट को 5.25% तक घटाया था, लेकिन अब दर-कटौती का चक्र रुक सकता है।
आगे क्या है उम्मीद?
यह स्थिति भारत की आर्थिक कमजोरियों को भी उजागर करती है। डॉलर के मुकाबले रुपये का 93-95 तक जाना विदेशी कर्ज (Foreign Debt) वाली कंपनियों के लिए बड़ी चुनौती है। हर महीने $7-8 अरब का अतिरिक्त इंपोर्ट बिल न सिर्फ चालू खाता घाटा बढ़ाएगा, बल्कि विदेशी निवेश (Capital Outflows) में कमी और बाजार में अस्थिरता का खतरा भी पैदा करेगा। सरकार पर भी इंपोर्ट बिल और संभावित फ्यूल सब्सिडी (Fuel Subsidies) के बोझ से राजकोषीय लक्ष्यों (Fiscal Goals) को पूरा करना मुश्किल हो सकता है।
आगे चलकर, कई ब्रोकरेज फर्मों का अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमतें 2026 तक $50-60 प्रति बैरल तक गिर सकती हैं, जिससे भारत को बड़ी राहत मिलेगी। वहीं, SBI रिसर्च का अनुमान है कि जून 2026 तक कीमतें $50 प्रति बैरल तक गिर सकती हैं। हालांकि, भू-राजनीतिक जोखिम (Geopolitical Risks) अभी भी बने हुए हैं। रुपये की दिशा भी मध्य पूर्व के तनाव कम होने और तेल की कीमतों में स्थिरता पर निर्भर करेगी। नियर-टर्म में रुपया 91-93 के स्तर पर रह सकता है, लेकिन तनाव बढ़ने पर और कमजोर हो सकता है। सरकार और RBI महंगाई और रुपये को संभालने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन कच्चे तेल की ऊंची लागत ही फिलहाल भारत की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चिंता बनी हुई है।