सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल में खुदरा महंगाई दर 3.48% पर आ गई है। यह मार्च के 3.4% की तुलना में मामूली वृद्धि है, लेकिन पिछले 13 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। यह जानकारी सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने जारी की है।
हालांकि, सबसे चिंताजनक बात खाने-पीने की चीजों की कीमतों में आई तेजी है। कंज्यूमर फूड प्राइस इंडेक्स (CFPI) मार्च में 3.87% से बढ़कर अप्रैल में 4.2% पर पहुंच गया। वहीं, फूड एंड बेवरेजेज की महंगाई दर भी 3.71% से बढ़कर 4.01% हो गई। यह बढ़ोतरी आम आदमी के बजट पर सीधा असर डाल रही है।
अन्य क्षेत्रों में मिली-जुली तस्वीर दिखी। हाउसिंग, पानी, बिजली और ईंधन जैसे क्षेत्रों में महंगाई दर 1.97% से घटकर 1.71% पर आ गई। वहीं, पान और तंबाकू जैसी चीजों की कीमतों में बढ़ोतरी हुई, जो 4.23% से बढ़कर 4.76% हो गई। रेस्टोरेंट और होटल जैसी सर्विसेज में भी महंगाई बढ़ी है, जो 2.88% से बढ़कर 4.20% हो गई।
यह घरेलू महंगाई दर वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच आई है। सप्लाई चेन में दिक्कतें और कमोडिटी (Commodity) कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी है। हालांकि, भारत की महंगाई दर कुछ अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले अभी भी कम है, लेकिन खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतें एक वैश्विक चिंता का विषय है। भारतीय शेयर बाजार (Indian Equity Markets), जैसे Nifty 50 और Sensex, हाल के इन महंगाई आंकड़ों के प्रति फिलहाल शांत दिखे हैं। निवेशक ग्रोथ और कंपनियों के नतीजों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। महंगाई दर का यह स्तर अभी भी RBI के अनुमानित दायरे में है, इसलिए बाजार में तत्काल कोई बड़ी गिरावट देखने को नहीं मिली है।
मुख्य जोखिम खाद्य पदार्थों की कीमतों में लगातार बनी रहने वाली बढ़ोतरी का है। इससे निम्न-आय वर्ग के परिवारों पर अधिक बोझ पड़ता है और केंद्रीय बैंक की पॉलिसी बनाने की फ्लेक्सिबिलिटी कम हो जाती है। वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी बाजारों (जैसे कच्चा तेल, अनाज) में उथल-पुथल भी भारत के लिए इंपोर्ट कॉस्ट बढ़ा रही है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अगले कुछ महीनों में महंगाई दर 3-4% के दायरे में रह सकती है, लेकिन खाद्य कीमतों और बाहरी झटकों का जोखिम बना हुआ है। RBI से उम्मीद है कि वह डेटा पर निर्भर (data-dependent) रुख अपनाएगा और पॉलिसी रेट को स्थिर रखेगा। अगर खाद्य महंगाई बढ़ती रही या भू-राजनीतिक घटनाएं तेज हुईं, तो RBI को महंगाई रोकने के लिए कड़े कदम उठाने पड़ सकते हैं, जिससे आर्थिक विकास धीमा हो सकता है।
