सरकार का बड़ा दांव: 'इंडस्ट्रियल पावर' बनने की ओर भारत
साल 2026 के यूनियन बजट में सरकार ने देश की आर्थिक दिशा बदलने का साफ संकेत दिया है। अब भारत सिर्फ सर्विस-आधारित अर्थव्यवस्था से आगे बढ़कर एक 'स्ट्रैटेजिक इंडस्ट्रियल पावर' बनने की ओर कदम बढ़ा रहा है। इसके लिए सरकार ने उन सेक्टरों पर ध्यान केंद्रित किया है जहां एंट्री करना आसान नहीं है। इस नई रणनीति का मकसद भारत को भविष्य की ग्लोबल सप्लाई चेन का एक अहम हिस्सा बनाना है, जिसमें सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग ही नहीं, बल्कि डीप-टेक और डिजाइनिंग क्षमताएं भी शामिल हों। इस नई राह पर चलने के लिए बजट में भारी भरकम फंड का ऐलान किया गया है। 'इलेक्ट्रॉनिक्स इनिशिएटिव' (ISM 2.0) के लिए ₹40,000 करोड़ का फंड रखा गया है, जिसका लक्ष्य भारत को सिर्फ एक असेंबलर से आगे ले जाकर एक डिज़ाइनर और मैन्युफैक्चरर के रूप में स्थापित करना है। इसके अलावा, 'बायोफार्मा शक्ति' (Biopharma SHAKTI) इनिशिएटिव हाई-वैल्यू बायो-लॉजिक्स पर फोकस करेगा, ताकि ग्लोबल मार्केट के बड़े हिस्से पर कब्जा किया जा सके। ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (CDSCO) और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्युटिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (NIPERs) जैसे रेगुलेटरी बॉडीज को भी ग्लोबल स्टैंडर्ड्स के अनुसार मजबूत किया जा रहा है।
दुनिया की बड़ी ताकतों से मुकाबला
सेमीकंडक्टर जैसे हाई-टेक सेक्टर में ग्लोबल लीडरशिप हासिल करने की भारत की कोशिशों में मुकाबला बहुत कड़ा है। भले ही भारत इस क्षेत्र में भारी निवेश कर रहा है और ताइवान व चीन जैसी कंपनियों को चुनौती देने की तैयारी में है, लेकिन हकीकत यह है कि अभी भारत काफी पीछे है। अकेले ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी (TSMC) के पास चिप मैन्युफैक्चरिंग में 61% की ग्लोबल रेवेन्यू मार्केट शेयर है, जबकि भारत की अपनी क्षमताएं अभी शुरुआती दौर में हैं। इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 का मकसद एक पूरा इकोसिस्टम तैयार करना है, जिसमें इक्विपमेंट, मैटेरियल्स और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी डेवलपमेंट तक को सपोर्ट मिलेगा। इसी तरह, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और क्लाउड कंप्यूटिंग के क्षेत्र में भारत ग्लोबल कंपनियों को भारतीय डेटा सेंटरों का इस्तेमाल करने पर 2047 तक 20 साल की टैक्स हॉलिडे दे रहा है। इसका मकसद भारत को एक संप्रभु (sovereign) क्लाउड और AI हब बनाना है। हालांकि, इस दौड़ में भारत को अमेरिका और चीन जैसी ताकतों से मुकाबला करना होगा, जिनके पास पहले से ही मजबूत कंप्यूट इंफ्रास्ट्रक्चर और रिसर्च इकोसिस्टम है। भारत की AI महत्वाकांक्षा को इंडियाAI मिशन से $1 बिलियन से ज़्यादा का आउटले मिला है, लेकिन कंप्यूट कैपेसिटी और एडवांस्ड रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी एक बड़ी चुनौती है।
निश (Niche) पर फोकस और डीकार्बोनाइजेशन की दौड़
हाई-टेक सेक्टर के अलावा, सरकार लेबर-इंटेंसिव इंडस्ट्रीज को भी 'निश डिफरेंशिएशन' की ओर मोड़ रही है, ताकि चीन जैसी देशों के साथ सिर्फ प्राइस-बेस्ड कॉम्पिटिशन से बचा जा सके। नेशनल फाइबर स्कीम और मेगा टेक्सटाइल पार्क जैसे इनिशिएटिव टेक्निकल टेक्सटाइल्स और एडवांस्ड मैन-मेड फाइबर्स पर फोकस करेंगे, जिनका मार्जिन ज्यादा होता है और ये सस्टेनेबिलिटी कंप्लायंस के अनुरूप भी हैं। 'सस्टेनेबिलिटी शील्ड' के तहत 'टेक्स-इको इनिशिएटिव' ESG-कंप्लायंट अपैरल को बढ़ावा देगा। इसके साथ ही, भारत कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन और स्टोरेज (CCUS) में भी बड़ा स्ट्रेटेजिक निवेश कर रहा है। इसके लिए अगले पांच सालों में ₹20,000 करोड़ (लगभग $2.2 बिलियन) का फंड आवंटित किया गया है। यह कदम यूरोपियन यूनियन (EU) के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) जैसे नियमों के खिलाफ एक बचाव रणनीति है, जो भारतीय एक्सपोर्ट्स (जैसे स्टील, सीमेंट, एल्युमीनियम) पर कार्बन टैरिफ लगाकर खतरा पैदा कर सकते हैं। CCUS का मकसद उन इंडस्ट्रियल सेक्टर्स से कार्बन उत्सर्जन को कम करना है, जहां यह बहुत मुश्किल है। हालांकि, इसकी ऊंची लागत और नई टेक्नोलॉजी अभी भी बड़ी बाधाएं हैं, क्योंकि प्रति टन CO2 कैप्चर करने की लागत $40 से $150 तक जा सकती है।
जोखिम और चिंताएं: पॉलिसी पर निर्भरता और एग्जीक्यूशन गैप
बजट में एक महत्वाकांक्षी रोडमैप तो पेश किया गया है, लेकिन इस बड़े बदलाव में कई जोखिम भी हैं। यह रणनीति काफी हद तक सरकारी इंसेंटिव्स, जैसे प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव्स (PLIs), टैक्स हॉलिडे और डायरेक्ट फाइनेंशियल सपोर्ट पर निर्भर करती है। ऐसे में, अगर मार्केट से वैसी प्रतिक्रिया नहीं मिली या ग्लोबल कॉम्पिटिशन और कड़ा हो गया, तो यह सरकार के लिए फिस्कली (fiscally) अनसस्टेनेबल साबित हो सकता है। भारत की पिछली इंडस्ट्रियल पॉलिसी के नतीजों में अक्सर एग्जीक्यूशन गैप्स और देरी देखने को मिली है, जिससे मंज़िलें हासिल करने में मुश्किलें आई हैं। सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में भारत अभी भी ताइवान और चीन से दशकों पीछे है। ऐसे में, मौजूदा निवेश से तुरंत बड़ा बाजार में बदलाव लाना मुश्किल लग रहा है। रेगुलेटरी बॉडीज जैसे CDSCO को ग्लोबल स्टैंडर्ड्स को पूरा करने के लिए लगातार प्रयास करने होंगे। CCUS इनिशिएटिव, भले ही CBAM के खिलाफ स्ट्रेटेजिक हो, लेकिन यह काफी महंगा है। इसकी लागत रिन्यूएबल एनर्जी सॉल्यूशंस से कहीं ज्यादा है, और अगर इसे इंडस्ट्रियल प्रोसेस में ठीक से इंटीग्रेट नहीं किया गया, तो यह महंगे और कम इस्तेमाल होने वाले एसेट्स का सबब बन सकता है। भारत का डेमोग्राफिक डिविडेंड (युवा आबादी) एक बड़ा एसेट हो सकता है, लेकिन इसके लिए हेल्थकेयर, एम्प्लॉयमेंट और जेंडर एम्पावरमेंट जैसी नीतियों का सही होना जरूरी है, जो ऐतिहासिक रूप से हमेशा नहीं रहा है।
आगे का रास्ता
AI और क्लाउड सर्विसेज के लिए ग्लोबल हब बनने की भारत की कोशिशें, लंबी अवधि के टैक्स इंसेंटिव्स के साथ, इसके बड़े टैलेंट पूल और बढ़ते डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का फायदा उठाने का लक्ष्य रखती हैं। बजट MSMEs (माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज) की एजिलिटी (agility) बढ़ाने पर भी जोर देता है, उन्हें इक्विटी-आधारित फंडिंग और बेहतर क्रेडिट एक्सेस के ज़रिए ग्लोबल वैल्यू चेन में शामिल करने का इरादा है। इस मल्टी-प्रॉन्ग इंडस्ट्रियल स्ट्रैटेजी की सफलता काफी हद तक कुशल पॉलिसी इंप्लीमेंटेशन, घरेलू इनोवेशन को बढ़ावा देने और कॉम्प्लेक्स जियो-पॉलिटिकल व इकोनॉमिक परिदृश्य को समझने पर टिकी हुई है। सरकार का क्रिटिकल सेक्टर्स में संप्रभु क्षमताएं (sovereign capabilities) बनाने का इरादा साफ है, लेकिन इस विजन को लगातार ग्लोबल कॉम्पिटिटिवनेस में बदलने के लिए महत्वपूर्ण स्ट्रक्चरल और मार्केट-ड्रिवन चुनौतियों से पार पाना होगा।