IBC में बड़ा सुधार, दिख रहा ग्लोबल एज का असर
भारत का फाइनेंशियल इकोसिस्टम एक बड़े बदलाव के लिए तैयार है। फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण ने साफ कर दिया है कि इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) में 2025 का नया अमेंडमेंट बिल जल्द ही पेश किया जाएगा। यह IBC का 7वां संशोधन होगा, जो 2016 में लागू होने के बाद पहली बार होगा। यह कदम सरकार की तरफ से कॉरपोरेट इंसॉल्वेंसी सिस्टम को और बेहतर और ग्लोबल स्टैंडर्ड्स के अनुरूप बनाने की दिशा में एक बड़ा संकेत है।
तेजी से समाधान और ग्लोबल स्टैंडर्ड्स पर फोकस
इस बार के IBC संशोधन का मुख्य मकसद इंसॉल्वेंसी प्रोसीडिंग्स के लिए लगने वाले समय को कम करना और उनकी इफेक्टिवनेस को बढ़ाना है। सरकार चाहती है कि भारत की यह प्रक्रिया दुनिया भर में अपनाई जाने वाली बेस्ट प्रैक्टिसेज के करीब पहुंचे। ऐसा इसलिए भी जरूरी है ताकि इन्वेस्टर का भरोसा बढ़े और डिफॉल्ट करने वाली कंपनियों के एसेट्स का समाधान (Resolution) आसानी से हो सके। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, IBC के तहत अब तक 1,000 से ज्यादा कंपनियों का समाधान हो चुका है, जिससे क्रेडिटर्स को ₹3.3 लाख करोड़ से ज्यादा की सीधी रिकवरी मिली है।
IBC का सफर: अब तक क्या रहा असर?
2016 से लागू होने के बाद से IBC ने भारत में कर्जदारों और लेनदारों के बीच के रिश्तों को पूरी तरह से बदल दिया है। इसने पुराने बिखरे हुए और अक्सर बेअसर सिस्टम की जगह एक ज्यादा ऑर्गनाइज्ड और टाइम-बाउंड प्रोसेस को स्थापित किया है। IBC की वजह से लोन रिकवरी रेट 40-45% तक पहुंच गया है, जबकि IBC से पहले यह सिर्फ 20% के आसपास था। इससे कंपनियों में क्रेडिट डिसिप्लिन भी बढ़ा है।
हालांकि, इस प्रोसेस में कुछ चुनौतियां भी बनी हुई हैं, जैसे कि प्रोसीजरल देरी और नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) पर भारी वर्कलोड। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखा जाए तो, 2019 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में इंसॉल्वेंसी समाधान में औसतन 1.6 साल लगते थे, जबकि अमेरिका और यूके में यह 1.0 साल और सिंगापुर में 0.8 साल था। नए अमेंडमेंट्स का लक्ष्य इस गैप को भरना है।
आगे क्या? एक मजबूत फाइनेंशियल इकोसिस्टम की ओर
यह IBC अमेंडमेंट, 2026-27 के यूनियन बजट में बताए गए बड़े फाइनेंशियल सेक्टर रिफॉर्म एजेंडा का हिस्सा है। सरकार का फोकस एक ऐसे मजबूत और भरोसेमंद फाइनेंशियल इकोसिस्टम को तैयार करना है जो लॉन्ग-टर्म कैपिटल को आकर्षित करे और इकोनॉमिक ग्रोथ को सपोर्ट करे। उम्मीद है कि यह सुधार क्रेडिट की लागत को और कम करेंगे और बैंकिंग सेक्टर की सेहत को भी बेहतर बनाएंगे।