10 साल में IBC की बड़ी सफलताएं: क्रेडिटर की रिकवरी में जबरदस्त उछाल
साल 2016 में लॉन्च हुए इंडिया के इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) ने कॉर्पोरेट जगत में दिवालियापन से निपटने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है। IBC से पहले, क्रेडिटर को कर्ज वसूली के लिए लंबे इंतजार और बहुत कम रिटर्न का सामना करना पड़ता था। IBC ने एक सिंगल, टाइम-बाउंड प्रोसेस तैयार की, जिससे रिकवरी रेट में नाटकीय सुधार हुआ है।
बैंकों के लिए रिकवरी रेट FY2018 में जहां सिर्फ 13.2% थी, वहीं FY2025 तक यह बढ़कर 30-36.6% तक पहुंचने का अनुमान है। S&P ग्लोबल रेटिंग्स ने भी इस प्रगति को स्वीकार करते हुए दिसंबर 2025 में भारत की इनसॉल्वेंसी व्यवस्था को 'ग्रुप B' में अपग्रेड किया। एजेंसी ने देखा कि रिकवरी में सुधार हुआ है और रेज़ोल्यूशन का समय कई सालों से घटकर लगभग 2 साल रह गया है। 2025 के आखिर तक 4,000 से ज़्यादा कॉर्पोरेट देनदारों (corporate debtors) के मामलों को हल किया जा चुका है, जिसमें क्रेडिटर को लिक्विडेशन (liquidation) से मिलने वाली संपत्ति से 171% ज़्यादा की रिकवरी हुई है। हल हुई कंपनियों का मार्केट वैल्यू भी पांच साल में बढ़कर ₹9 लाख करोड़ हो गया है।
लगातार देरी और कानूनी झटके IBC के रास्ते में रोड़े
इन सब सफलताओं के बावजूद, IBC को बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। सबसे बड़ी समस्या केसों को सुलझाने में होने वाली भारी और लगातार देरी है। IBC के तहत किसी केस को हल करने की अधिकतम समय सीमा 330 दिन तय है, लेकिन आजकल केस औसतन 713-853 दिन ले रहे हैं, जो तय सीमा से दोगुना से भी ज्यादा है।
इस बैकलॉग (backlog) का नतीजा यह है कि नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की बेंचों पर करीब 30,600 केस लंबित हैं। मौजूदा रफ्तार से इन्हें निपटाने में करीब 10 साल लग सकते हैं। कोर्ट के कुछ फैसलों ने भी अनिश्चितता पैदा की है। उदाहरण के लिए, 'विद्याधर इंडस्ट्रीज' जजमेंट ने सवाल उठाया कि क्या पिटीशन एडमिशन (petition admission) हमेशा अनिवार्य है, और 'रेनबो पेपर्स' केस ने सरकारी बकाया को सुरक्षित कर्ज (secured debt) के समान मानकर भुगतान के क्रम को बदल दिया। इन मुद्दों ने IBC द्वारा लाई गई पूर्वानुमान (predictability) को खतरे में डाल दिया है।
दुनिया से तुलना: भारत कहां ठहरता है?
वैश्विक स्तर पर देखें तो भारत का इनसॉल्वेंसी ढांचा मजबूत है, लेकिन सुधार की गुंजाइश है। अमेरिका और यूके जैसे देशों में रिकवरी रेट भारत के 30-36.6% की तुलना में 81.8% और 85.3% तक है। जबकि भारत में रेज़ोल्यूशन का समय IBC से पहले के 6-8 साल से घटकर लगभग 2 साल हो गया है, यह अभी भी सिंगापुर के औसत 0.8 साल से लंबा है।
भारत में 'क्रॉस-क्लास क्रैम-डाउन' (cross-class cram-down) जैसे कानूनी टूल की कमी है, जो यूके के कंपनी कानून में मिलता है। यह टूल कुछ खास नियमों के तहत, असंतुष्ट क्रेडिटर पर भी रीस्ट्रक्चरिंग प्लान लागू करने की अनुमति देता है। इसकी अनुपस्थिति से प्लान को मंजूरी मिलना मुश्किल हो सकता है और विवाद लंबे खिंच सकते हैं।
असली समस्या: इरादे और अमल के बीच का फासला
IBC की मुख्य चुनौती कानून के इरादे और उसके जमीनी अमल के बीच का बढ़ता अंतर है। ट्रिब्यूनल पर अत्यधिक बोझ और लंबी अदालती लड़ाइयों के कारण होने वाली ये देरी सिर्फ ऑपरेशनल दिक्कतें नहीं हैं, बल्कि ये पूरे ढांचे की विश्वसनीयता पर सीधा असर डाल रही हैं। देरी का हर दिन एसेट वैल्यू को कम करता है, रिकवरी की संभावना घटाता है और निवेशकों को हतोत्साहित करता है।
हालांकि IBC ने कर्जदारों की बजाय क्रेडिटर को सशक्त बनाने की दिशा में बदलाव किया है, लेकिन न्याय में हो रही देरी इस क्रेडिटर कंट्रोल (creditor control) को बाधित कर रही है। 18 फरवरी, 2026 को सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने केस एडमिशन के लिए एक ऑब्जेक्टिव स्टैंडर्ड (objective standard) बहाल कर दिया, जिससे पहले की भ्रमित करने वाली व्याख्याओं के बाद कुछ हद तक पूर्वानुमान वापस आया। हालांकि, ट्रिब्यूनल की सीमित क्षमता और लंबित मामलों का विशाल अंबार अभी भी बड़ी कमजोरियां बनी हुई हैं।
IBC (अमेंडमेंट) बिल, 2025, जिसे 2026 की शुरुआत में पारित किया गया था, समय-सीमा को कड़ा करने, सरकारी बकाया की प्राथमिकता स्पष्ट करने और क्रॉस-बॉर्डर इनसॉल्वेंसी के नियम तय करने जैसे कई मुद्दों को हल करने का लक्ष्य रखता है।
आगे की राह: बेहतर अमल और संस्कृति की ज़रूरत
IBC का पहला दशक संस्थागत सुधार की शक्ति को दर्शाता है। इसने क्रेडिट बिहेवियर (credit behavior) को बदला है, रिकवरी रेट को बढ़ाया है और अर्थव्यवस्था में अधिक अनुशासन लाया है। हालांकि, यह ढांचा अभी भी विकसित हो रहा है।
अगले महत्वपूर्ण कदम के लिए सिर्फ नए कानूनों की नहीं, बल्कि इनसॉल्वेंसी व्यवस्था के भीतर एक सांस्कृतिक बदलाव की आवश्यकता है। ट्रिब्यूनल की क्षमता बढ़ाना, इनसॉल्वेंसी प्रैक्टिशनर्स (insolvency practitioners) के लिए प्रोफेशनल स्टैंडर्ड्स (professional standards) में सुधार करना और अदालती फैसलों को तेज करना आवश्यक है। हालिया संशोधन एक सकारात्मक कदम हैं, लेकिन क्या भारत की इनसॉल्वेंसी क्रांति वास्तव में सफल हो सकती है, यह ऑपरेशनल एफिशिएंसी (operational efficiency) पर निरंतर ध्यान और समय पर न्याय सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता पर निर्भर करेगा।
