मैन्युफैक्चरिंग की रफ्तार पर एनर्जी शॉक का साया
अप्रैल में मैन्युफैक्चरिंग PMI 54.7 रहा, जो पिछले करीब चार सालों में दूसरी सबसे धीमी बढ़त दर्शाता है। विश्लेषकों का मानना है कि एनर्जी सप्लाई को लेकर अनिश्चितता के बीच कंपनियों द्वारा माल का स्टॉक बढ़ाना ही इस मामूली उछाल की मुख्य वजह है। यह सब फिलहाल आर्थिक मजबूती का एक अस्थायी अहसास दे रहा है, लेकिन गहरी आर्थिक चुनौतियों को ढक रहा है।
एनर्जी झटकों से निपटने की सरकारी रणनीति
सरकार इन ग्लोबल एनर्जी झटकों और मध्य पूर्व के तनाव से निपटने के लिए कई मोर्चों पर रणनीति बना रही है। इसमें ₹2.55 लाख करोड़ के इमरजेंसी क्रेडिट लाइन गारंटी स्कीम (ECLGS) 5.0 जैसे उपाय शामिल हैं, जिनका मकसद सप्लाई चेन की दिक्कत झेल रही छोटी और मध्यम कंपनियों (MSMEs) को लिक्विडिटी (Liquidity) देना है। साथ ही, महात्मा गांधी नेशनल रूरल एंप्लॉयमेंट गारंटी एक्ट (NREGA) जैसी योजनाएं ग्रामीण आय को सहारा दे रही हैं। इन्फ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) पर सरकारी खर्च भी ग्रोथ का एक अहम जरिया बना हुआ है। हालांकि, सवाल यह उठ रहा है कि इन सब पहलों के लिए सरकार के पास कितने फंड की उपलब्धता है।
एनर्जी शॉक के प्रति भारत की संवेदनशीलता
असली चिंता भारत की एनर्जी शॉक के प्रति संवेदनशीलता को लेकर है। देश अपनी जरूरत का 45-50% तेल पश्चिम एशिया से आयात करता है, इसलिए वहां सप्लाई में कोई रुकावट या कीमतों में बड़ा उतार-चढ़ाव सीधा असर डालता है। हालिया संघर्षों के चलते Brent Crude की कीमतों में अस्थिरता देखी गई है, जिससे करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) बढ़ने और रुपये के कमजोर होने का खतरा है। मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों की इनपुट कॉस्ट (Input Cost) अगस्त 2022 के बाद सबसे तेजी से बढ़ी है, जिसके चलते आउटपुट प्राइस (Output Price) भी बढ़ रहे हैं। भले ही कंज्यूमर इन्फ्लेशन (Consumer Inflation) अभी स्थिर दिख रहा हो, लेकिन इंपोर्टेड शॉक (Imported Shock) का असर होलसेल प्राइस (Wholesale Price) पर ज्यादा गहरा हो सकता है। इसके अलावा, 2026 तक अल नीनो (El Niño) के कारण मॉनसून के सामान्य से कम रहने की आशंका है, जो सीधे तौर पर खेती और ग्रामीण मांग को प्रभावित कर सकती है।
विश्लेषकों की चिंताएं और जोखिम
विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा पॉजिटिव डेटा के पीछे बड़े खतरे छिपे हैं। मैन्युफैक्चरिंग सेंटिमेंट (Manufacturing Sentiment) और स्टॉक जमा करना केवल अस्थायी सहारा है और यह कॉर्पोरेट प्रॉफिट (Corporate Profit) व कंज्यूमर स्पेंडिंग (Consumer Spending) को हाई एनर्जी कॉस्ट (High Energy Cost) के लंबे असर से नहीं बचा सकते। एसएंडपी ग्लोबल (S&P Global) और वर्ल्ड बैंक (World Bank) जैसे प्रमुख संस्थानों ने FY27 के लिए जीडीपी ग्रोथ (GDP Growth) का अनुमान घटाकर 6.6% कर दिया है, जबकि UBS ने इसे 6.2% बताया है। सरकार के खर्चे और आमदनी के बीच का अंतर (Deficit) बढ़ने का अनुमान है, जिससे पब्लिक डेट (Public Debt) में इजाफा हो सकता है और इन्फ्रास्ट्रक्चर पर खर्च सीमित हो सकता है। क्रेडिट गारंटी (Credit Guarantee) जैसे उपाय कंपनियों की मदद कर सकते हैं, लेकिन उनकी सफलता बड़े आर्थिक सुस्ती से निपटने की क्षमता पर निर्भर करेगी।
इकोनॉमिक आउटलुक और प्रमुख चुनौतियां
FY27 के लिए भारत का इकोनॉमिक आउटलुक (Economic Outlook) काफी जटिल नजर आ रहा है, जिसमें अनुमान अलग-अलग हैं। गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) जहां 6.9% ग्रोथ की उम्मीद कर रहा है, वहीं अन्य एक्सपर्ट्स के अनुमान भिन्न हैं। HSBC लंबे समय के लिए तो पॉजिटिव है, लेकिन फिलहाल भारतीय शेयरों में निवेश को लेकर सतर्क है क्योंकि अर्निंग ग्रोथ (Earnings Growth) धीमी है और वैल्यूएशन (Valuation) महंगा है। भारत की दीर्घकालिक मजबूती तेज स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स (Structural Reforms) पर निर्भर करती है, खासकर एनर्जी और फूड सिक्योरिटी (Food Security) के मोर्चों पर। इसके साथ ही, वोलेटाइल ग्लोबल मार्केट्स (Volatile Global Markets) पर निर्भरता कम करने के लिए एनर्जी सोर्स (Energy Source) के विकल्पों में विविधता लाना एक बड़ी जरूरत है। नीति निर्माताओं को तात्कालिक राहत और लंबे समय के संरचनात्मक बदलावों के बीच एक नाजुक संतुलन बनाना होगा।
