क्यों रहेगा कच्चे तेल का दाम ऊंचा?
ADB के मुताबिक, मध्य पूर्व में चल रहे तनाव के चलते कच्चे तेल की कीमतें आने वाले समय में ऊंची बनी रह सकती हैं। बैंक ने 2026 के लिए औसत दाम $96 प्रति बैरल और 2027 के लिए $80 प्रति बैरल रहने का अनुमान लगाया है।
हालांकि, अमेरिकी एनर्जी इंफॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (EIA) का अनुमान थोड़ा अलग है, जो 2026 में ब्रेंट क्रूड $58/bbl और 2027 में $53/bbl रहने की उम्मीद करता है। लेकिन, S&P ग्लोबल रेटिंग्स ने एक स्ट्रेस सिनेरियो की चेतावनी दी है, जहां 2026 में ब्रेंट क्रूड का औसत दाम $130 प्रति बैरल तक जा सकता है, जो ग्रोथ के लिए बड़ा झटका होगा। इन अलग-अलग अनुमानों से बाजार की अनिश्चितता साफ झलकती है।
तेल पर निर्भरता भारत के लिए सिरदर्द
भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में, कच्चे तेल की कीमतों में थोड़ी सी भी बढ़ोतरी भारत की अर्थव्यवस्था को सीधे तौर पर प्रभावित करती है। ADB का मानना है कि तेल की ऊंची कीमतों के कारण FY27 में भारत की GDP ग्रोथ 0.6 फीसदी घटकर 6.3% रह सकती है। यह IMF (FY27 के लिए 6.5%) और वर्ल्ड बैंक (FY27 के लिए 6.6%) के अनुमानों से कम है।
साथ ही, इस फाइनेंशियल ईयर में महंगाई दर 6.9% तक पहुंचने का अनुमान है, जो पहले के 4.5% के अनुमान से काफी ज्यादा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि एशिया-प्रशांत क्षेत्र की तुलना में भारत आयातित तेल और गैस पर ज्यादा निर्भर है। ऐतिहासिक तौर पर, तेल की कीमतों में हर $10/bbl की बढ़ोतरी से भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट में GDP के मुकाबले करीब 0.4% की बढ़ोतरी होती है। इससे भारतीय रुपये पर भी दबाव बढ़ता है, जो हाल ही में रिकॉर्ड निचले स्तरों के करीब कारोबार कर रहा था।
खेती पर दोहरे वार: खाद के दाम और एल नीनो का खतरा
तेल की कीमतों के अलावा, कुछ और फैक्टर भी भारत के लिए मुश्किलें बढ़ा रहे हैं। अनुमान है कि एल नीनो (El Niño) के चलते मॉनसून सामान्य से कम रह सकता है, जिससे फसलों की पैदावार और खाद्य पदार्थों की कीमतों पर असर पड़ सकता है।
इस जोखिम को खाद की बढ़ती कीमतों से और बढ़ावा मिल रहा है, जो सीधे तौर पर नेचुरल गैस और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से जुड़ी हैं। उदाहरण के लिए, यूरिया की कीमतों में 2026 तक 60% तक की बढ़ोतरी हो सकती है, जबकि वैश्विक स्तर पर खाद की कीमतों में कुल 31% का इजाफा हो सकता है। लागत बढ़ने के कारण किसान खाद का इस्तेमाल कम कर सकते हैं, जिससे फसल की पैदावार घटेगी। इससे खाद्य महंगाई में एक और उछाल आ सकता है, किसानों की आय कम हो सकती है और ग्रामीण मांग पर असर पड़ सकता है।
खतरे आपस में जुड़े, ग्रोथ पर बनी रहेगी अनिश्चितता
हालांकि, कई संस्थाएं भारत को सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था मानती हैं, लेकिन ऊर्जा, खाद्य पदार्थ और करेंसी से जुड़े जोखिमों का यह गठजोड़ सतर्क रहने का मजबूत संकेत देता है। ऊर्जा आयात पर भारत की भारी निर्भरता इसे सप्लाई में रुकावटों और कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती है, खासकर जब वैश्विक अस्थिरता और हॉर्मुज जलडमरूमध्य जैसे प्रमुख शिपिंग मार्गों पर खतरे बने हुए हैं।
सरकार की घरेलू ईंधन की कीमतों को स्थिर रखने की कोशिशें, भले ही लोकप्रिय हों, सरकारी तेल कंपनियों के लिए बड़े नुकसान का कारण बनती हैं और सरकारी खजाने पर बोझ डालती हैं। ADB ने खुद एशिया-प्रशांत क्षेत्र के लिए 2026 में ग्रोथ का अनुमान घटाकर 4.7% कर दिया है, जो क्षेत्रीय चुनौतियों के बढ़ने का संकेत देता है। वर्ल्ड बैंक ने भी कहा है कि ऊर्जा की ऊंची कीमतें घरेलू खर्च को कम कर सकती हैं।
आगे की राह: चुनौतियां बरकरार
इन दबावों के बावजूद, भारत की आर्थिक ग्रोथ को मजबूत घरेलू मांग, जारी सुधारों और कम अमेरिकी टैरिफ से सहारा मिलने की उम्मीद है। ADB को वित्त वर्ष 2028 में ग्रोथ के बढ़कर 7.3% होने की उम्मीद है। हालांकि, मध्य पूर्व संघर्ष, एल नीनो की अप्रत्याशितता, और खेती व उद्योगों के लिए इनपुट लागत का बढ़ना यह तय करेगा कि भारत की आर्थिक मजबूती की कितनी परीक्षा होती है। वर्तमान स्थिति में ऊर्जा सुरक्षा, कृषि उत्पादकता और सरकारी खर्चों पर सावधानीपूर्वक ध्यान देने की आवश्यकता है।
