भारत के क्लीन एनर्जी लक्ष्य खतरे में! क्रिटिकल मिनरल्स पर निर्भरता बिगाड़ेगी खेल?

ECONOMY
Whalesbook Logo
AuthorKaran Malhotra|Published at:
भारत के क्लीन एनर्जी लक्ष्य खतरे में! क्रिटिकल मिनरल्स पर निर्भरता बिगाड़ेगी खेल?
Overview

भारत के महत्वाकांक्षी क्लीन एनर्जी लक्ष्यों को बड़ा झटका लग सकता है। देश लिथियम, कोबाल्ट और निकेल जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के लिए पूरी तरह से विदेशी सप्लायर्स पर निर्भर है, जिससे 2030 तक के टारगेट पूरे करना मुश्किल हो सकता है।

Instant Stock Alerts on WhatsApp

Used by 10,000+ active investors

1

Add Stocks

Select the stocks you want to track in real time.

2

Get Alerts on WhatsApp

Receive instant updates directly to WhatsApp.

  • Quarterly Results
  • Concall Announcements
  • New Orders & Big Deals
  • Capex Announcements
  • Bulk Deals
  • And much more

भारत के क्लीन एनर्जी मिशन पर मंडरा रहा खतरा!

भारत 2030 तक 500 GW नॉन-फॉसिल फ्यूल एनर्जी क्षमता हासिल करने और क्लीन एनर्जी की ओर बढ़ने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है। लेकिन, इस राह में एक बड़ा रोड़ा सामने आ रहा है - वो है क्रिटिकल मिनरल्स पर भारी विदेशी निर्भरता। देश इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs), बैटरी स्टोरेज और ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए जरूरी लिथियम, कोबाल्ट और निकेल जैसे खनिजों का 100% आयात करता है। यह निर्भरता भारत को कीमतों में उतार-चढ़ाव, भू-राजनीतिक तनाव, और प्रमुख उत्पादक देशों द्वारा 'रिसोर्स नेशनलिज्म' या एक्सपोर्ट बैन जैसे जोखिमों के सामने ला खड़ा करती है।

कमोडिटी की कीमतों का हाल

कमोडिटी की कीमतों में जबरदस्त वोलैटिलिटी देखी जा रही है। लिथियम कार्बोनेट की कीमतें, जो 2023 में अपने उच्चतम स्तर से गिरी थीं, अब चीनी मांग और पावर इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश के कारण फिर बढ़ रही हैं। वहीं, एनर्जी ट्रांजिशन में तेजी और EVs तथा रिन्यूएबल्स की मांग बढ़ने से कॉपर की कीमतें ऊपर जा रही हैं और रिकॉर्ड स्तर छू सकती हैं। निकेल बाजारों में इंडोनेशियाई सप्लाई और भू-राजनीतिक घटनाओं के कारण उतार-चढ़ाव रहा है, और 2026 तक बाजार में कमी का अनुमान है। कोबाल्ट की कीमतें डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) से निर्यात कोटे और इलेक्ट्रॉनिक्स व रक्षा क्षेत्र की मजबूत मांग के कारण तेजी से बढ़ी हैं, जिससे यह काफी महंगा हो गया है। ग्रेफाइट की कीमतों पर अधिक सप्लाई का दबाव रहा, हालांकि चीन के एक्सपोर्ट कंट्रोल और टैरिफ भी सप्लाई और ट्रेड रूट्स को प्रभावित कर रहे हैं।

सप्लायर्स पर कंसन्ट्रेशन का बड़ा जोखिम

भारत की यह कमजोरी और बढ़ जाती है क्योंकि ये खनिज और इनकी प्रोसेसिंग कुछ ही देशों में केंद्रित है, खासकर चीन, जो कई क्रिटिकल मिनरल्स के 60% से 90% तक प्रोसेसिंग को कंट्रोल करता है। सप्लाई कट या कीमतों में हेरफेर का खतरा यहां से बढ़ता है, जैसा कि चीन द्वारा रेयर अर्थ और ग्रेफाइट एनोड मैटेरियल पर एक्सपोर्ट लिमिट से देखा गया है। अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अपनी सप्लाई चेन को सुरक्षित करने के लिए 'इंफ्लेशन रिडक्शन एक्ट' और 'क्रिटिकल रॉ मैटेरियल्स एक्ट' जैसे कदम उठा रही हैं। ये नीतियां डोमेस्टिक प्रोडक्शन, सहयोगी देशों के साथ 'फ्रेंड-शोरिंग' और स्थानीय उत्पादन को बढ़ाने पर जोर देती हैं।

सप्लाई चेन वेपन्सनाइजेशन का डर

क्रिटिकल मिनरल सप्लाई चेन का यह कंसन्ट्रेशन 'सप्लाई चेन वेपन्सनाइजेशन' का बड़ा जोखिम पैदा करता है, जहां प्रमुख उत्पादक भू-राजनीतिक लाभ के लिए एक्सपोर्ट कंट्रोल का इस्तेमाल कर सकते हैं। भारत की भारी निर्भरता का मतलब है कि किसी भी व्यवधान से रिन्यूएबल एनर्जी ग्रोथ, EV एडॉप्शन और मैन्युफैक्चरिंग प्लान्स में देरी हो सकती है। डोमेस्टिक माइनिंग और प्रोसेसिंग विकसित करने में लंबा समय और भारी इन्वेस्टमेंट लगता है, जिससे तेजी से आत्मनिर्भरता मुश्किल है। IEA (इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी) का अनुमान है कि 2030 तक क्रिटिकल मिनरल की मांग दोगुनी से अधिक हो जाएगी, जो नई सप्लाई के विकास से कहीं तेज है। चीन के रेयर अर्थ और ग्रेफाइट पर एक्सपोर्ट लिमिट, और DRC का 2025 की शुरुआत में कोबाल्ट बैन का प्लान, सप्लाई के लिए स्पष्ट खतरे दिखाते हैं।

भारत का मिनरल सिक्योरिटी प्लान

इन जोखिमों से निपटने के लिए, भारत ने फाइनेंशियल ईयर 2024-25 से फाइनेंशियल ईयर 2030-31 तक के लिए ₹16,300 करोड़ के बजट के साथ एक नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन (NCMM) लॉन्च किया है। इस मिशन का लक्ष्य डोमेस्टिक एक्सप्लोरेशन को तेज करना, विदेशी माइनिंग एसेट्स खरीदना, और ई-वेस्ट व बैटरीज से मिनरल रीसाइक्लिंग को प्रोत्साहित करके सप्लाई को सुरक्षित करना है। भारत ऑस्ट्रेलिया, चिली और अमेरिका जैसे देशों के साथ भी साझेदारी कर रहा है, जिसमें मिनरल्स सिक्योरिटी पार्टनरशिप जैसे प्रयास शामिल हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि मजबूत सप्लाई चेन बनाने के लिए सरकारी समझौतों से आगे बढ़कर लॉन्ग-टर्म पार्टनरशिप, इंडस्ट्री कोलैबोरेशन, जॉइंट एक्सप्लोरेशन, R&D (रिसर्च एंड डेवलपमेंट) और टेक ट्रांसफर की जरूरत है। ये प्रयास भारत के विविधीकरण के इरादे को दर्शाते हैं, लेकिन असली रेजिलिएंस बनाने के लिए एग्जीक्यूशन की चुनौतियों से निपटना होगा और ग्लोबल सप्लाई चेन पर निर्भरता कम करने के लिए मजबूत डोमेस्टिक कैपेबिलिटीज विकसित करनी होंगी।

Get stock alerts instantly on WhatsApp

Quarterly results, bulk deals, concall updates and major announcements delivered in real time.

Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.