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भारतीय बॉन्ड से FPI का यू-टर्न! FY26 में ₹11 करोड़ का आउटफ्लो, जानिए वजहें

ECONOMY
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AuthorMehul Desai|Published at:
भारतीय बॉन्ड से FPI का यू-टर्न! FY26 में ₹11 करोड़ का आउटफ्लो, जानिए वजहें
Overview

वित्तीय वर्ष 2026 (FY26) में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय सरकारी बॉन्ड से अपना रुख अचानक पलट लिया है। पिछले साल जहां **₹1.2 ट्रिलियन** का शानदार इनफ्लो देखा गया था, वहीं इस बार **₹11 करोड़** का आउटफ्लो दर्ज किया गया है। इसकी मुख्य वजहें प्रॉफिट-बुकिंग, अमेरिकी बॉन्ड की तुलना में यील्ड का कम फायदा, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, रुपये का कमजोर होना और बढ़ती ग्लोबल अस्थिरता हैं।

FY25 में क्यों आई थी भारी तेजी?

FY25 में भारतीय सरकारी बॉन्ड में विदेशी निवेश की बंपर आवक का मुख्य कारण जेपी मॉर्गन के इमर्जिंग मार्केट इंडेक्स (JPMorgan's Emerging Market Index) में भारत का शामिल होना था। यह प्रक्रिया मार्च 2025 तक पूरी हो गई थी। लेकिन अगले वित्तीय वर्ष, FY26 में यह ट्रेंड पूरी तरह उलट गया। FY26 के पहले तीन महीनों में ही विदेशी निवेशकों ने इन बॉन्ड्स से ₹31,000 करोड़ से ज्यादा की निकासी कर ली, जो पूरे साल के ₹11 करोड़ के नेट आउटफ्लो का बड़ा कारण बना। यह FY25 के ₹1.2 ट्रिलियन के इनफ्लो के मुकाबले बिल्कुल विपरीत तस्वीर पेश करता है।

निवेशकों ने क्यों की बिकवाली?

विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बॉन्ड बेचने का सबसे बड़ा कारण ग्लोबल रिस्क के प्रति कम हुई भूख के चलते 'प्रॉफिट-बुकिंग' करना था। इसके साथ ही, भारतीय सरकारी डेट (Sovereign Debt) पर मिलने वाले यील्ड का फायदा भी कम हो गया था। अप्रैल 2025 तक, 10-वर्षीय यूएस ट्रेजरी बॉन्ड और भारत के बेंचमार्क 10-वर्षीय बॉन्ड के बीच यील्ड का अंतर 200 बेसिस पॉइंट्स से भी नीचे आ गया था। वहीं, ट्रेड टैरिफ के कारण अमेरिका में बढ़ी महंगाई की चिंताओं ने यूएस ट्रेजरी यील्ड को ऊपर धकेल दिया। इससे भारतीय बॉन्ड कम आकर्षक हो गए, खासकर तब जब घरेलू मांग के चलते भारत में यील्ड पहले से ही कम था। 31 मार्च 2026 तक, भारत के 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड पर यील्ड लगभग 6.961% था।

भू-राजनीतिक और करेंसी का दबाव

पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने विदेशी निवेश को और हतोत्साहित किया। इन तनावों के चलते कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार चली गईं, जिससे इम्पोर्टेड इन्फ्लेशन (आयातित महंगाई) और भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD - चालू खाता घाटा) के बढ़ने की चिंताएं बढ़ गईं। अनुमान है कि तेल की कीमतों में हर $10 की बढ़ोतरी से CAD में करीब 36 बेसिस पॉइंट्स का इजाफा हो सकता है। कच्चे तेल की बढ़ी कीमतों का भारतीय रुपये पर भी गहरा असर पड़ा, जिससे इसमें लगभग 10% की गिरावट आई। 31 मार्च 2026 तक, डॉलर-रुपया (USD/INR) विनिमय दर लगभग ₹94.26 से ₹94.77 के स्तर पर थी, जिसने विदेशी निवेशकों के रिटर्न को कम कर दिया। जेपी मॉर्गन इंडेक्स में भारत की हिस्सेदारी भी अन्य देशों के जुड़ने के बाद लगभग 10% से घटकर 9% रह गई, जिसने निवेशकों के मिजाज को और प्रभावित किया।

भारतीय बॉन्ड, विकल्पों से कम आकर्षक

आम तौर पर इमर्जिंग मार्केट डेट (Debt) में सकारात्मक इनफ्लो और आकर्षक यील्ड (लगभग 6.9% इमर्जिंग मार्केट बॉन्ड्स के लिए) देखी गई, लेकिन FY26 में भारतीय सरकारी बॉन्ड मार्केट ने इसके विपरीत बड़ा उलटफेर देखा। भारत के जेपी मॉर्गन इंडेक्स में शामिल होने से अपेक्षित बड़े इनफ्लो पर घरेलू और भू-राजनीतिक जोखिमों ने पानी फेर दिया। जहां घरेलू निवेशक इमर्जिंग मार्केट डेट में निवेश बढ़ा रहे हैं, वहीं विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय बॉन्ड से पैसा निकाला। भारत और अमेरिका के बीच घटता यील्ड गैप और करेंसी में गिरावट ने भारतीय डेट को रिस्क-एडजस्टेड बेसिस पर कम आकर्षक बना दिया। यह तब और भी सच था जब पश्चिमी देशों के सुरक्षित बॉन्ड या अन्य इमर्जिंग मार्केट के विकल्प समान या बेहतर रिटर्न दे रहे थे। रुपये पर लगातार दबाव, महंगाई और CAD की चिंताओं ने एक अस्थिर माहौल बनाया, जिसने भारत की मजबूत आर्थिक विकास दर के बावजूद विदेशी फिक्स्ड-इनकम निवेश को हतोत्साहित किया।

भारतीय बॉन्ड का आगे का रास्ता

भारतीय सरकारी बॉन्ड के लिए एक सतर्क दृष्टिकोण जारी रहने की उम्मीद है, क्योंकि निवेशक बदलते वैश्विक आर्थिक हालातों के मुकाबले बड़े डेट सप्लाई (Bonds Supply) का आकलन कर रहे हैं। हालांकि भारत का ग्लोबल बॉन्ड इंडेक्स में शामिल होना एक सकारात्मक संरचनात्मक विकास था, लेकिन FY26 में इसके फायदे बाहरी झटकों और करेंसी में उतार-चढ़ाव के कारण बेअसर हो गए। विदेशी निवेशकों की रुचि को स्थायी रूप से वापस लाने के लिए, भू-राजनीतिक तनावों को स्थिर होने, कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आने और रुपये की गिरावट का ट्रेंड उलटने की आवश्यकता होगी। लगातार राजकोषीय अनुशासन (Fiscal Responsibility) और प्रभावी मौद्रिक नीति (Monetary Policy) भी महत्वपूर्ण होंगी।

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