'गोल्डन शेयर' की वापसी: कंट्रोल और पूंजी का संतुलन?
केंद्र सरकार सरकारी कंपनियों (PSUs) में 'गोल्डन शेयर' की व्यवस्था को फिर से शुरू करने की संभावना तलाश रही है। यह नीतिगत कदम सरकार की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह महत्वपूर्ण पब्लिक सेक्टर यूनिट्स (PSUs) पर अपना रणनीतिक नियंत्रण बनाए रखना चाहती है, भले ही उसकी हिस्सेदारी (equity holding) कम हो जाए। इस पॉलिसी के जरिए सरकार ₹12.5 लाख करोड़ तक की पूंजी जुटा सकती है। आपको बता दें कि जून 2025 तक भारतीय PSUs का कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन (Market Capitalisation) करीब ₹69 लाख करोड़ था। इस बीच, Nifty PSE इंडेक्स ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है, जिसने पिछले एक साल में 16.23% का रिटर्न दिया है, जबकि 5 साल का CAGR (Compound Annual Growth Rate) 28.1% रहा है। फरवरी 2026 की शुरुआत तक यह इंडेक्स 10,396.25 के स्तर पर पहुंच गया था। सरकार इस 'गोल्डन शेयर' व्यवस्था के जरिए आर्थिक विकास और राजस्व बढ़ाने के अपने लक्ष्य को राष्ट्रीय हितों की रक्षा के साथ संतुलित करना चाहती है।
पिछला अनुभव और दुनिया भर के सबक
'गोल्डन शेयर' का कॉन्सेप्ट भारत के लिए नया नहीं है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में और अरुण शौरी के विनिवेश मंत्री (Disinvestment Minister) रहते हुए इस तरह की रणनीतियाँ अपनाई गई थीं। हालांकि, तब ज्यादातर डिसइन्वेस्टमेंट (Disinvestment) में छोटी हिस्सेदारी बेची गई थी, जिससे प्रबंधन नियंत्रण (Management Control) प्रभावी ढंग से ट्रांसफर नहीं हो पाया और वैल्यूएशन भी कम मिला। दुनिया भर में, ब्राजील की Embraer या ऐतिहासिक रूप से यूके जैसे देशों ने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए 'गोल्डन शेयर' का इस्तेमाल किया है। लेकिन, यूरोपीय संघ (EU) जैसे कई मंचों पर इसके इस्तेमाल पर सवाल उठे हैं। यूरोपीय संघ ने पूंजी के मुक्त प्रवाह (free movement of capital) से जुड़े कानूनों के चलते इसके उपयोग को काफी हद तक प्रतिबंधित कर दिया है। आलोचकों का कहना है कि 'गोल्डन शेयर' भले ही शत्रुतापूर्ण अधिग्रहण (hostile takeovers) को रोके और सार्वजनिक सेवा सुनिश्चित करे, लेकिन यह कॉर्पोरेट नियंत्रण (corporate control) के बाजार को सीमित कर सकता है और अधिग्रहण के प्रीमियम (takeover premium) का पूरा फायदा नहीं मिल पाता। भारत में भी अरुण शौरी की विनिवेश योजनाओं को उनकी कार्यकुशलता और वैल्यूएशन को लेकर विरोध का सामना करना पड़ा था।
कानूनी राह और बाजार पर असर
'गोल्डन शेयर' पॉलिसी को लागू करने के लिए कंपनी अधिनियम (Companies Act) में संशोधन की आवश्यकता पड़ सकती है। मौजूदा नियमों के तहत, किसी कंपनी को 'सरकारी कंपनी' (Government Company) माने जाने के लिए सरकार की 51% हिस्सेदारी होना जरूरी है। लेकिन, नए प्रस्तावों के अनुसार, विशेष प्रस्ताव (special resolution) अधिकारों के साथ, सरकार केवल 26% हिस्सेदारी रखते हुए भी प्रभावी नियंत्रण बनाए रख सकती है। उद्योग जगत इसे एक 'स्ट्रक्चरली ट्रांसफॉर्मेटिव आइडिया' (structurally transformative idea) बता रहा है। इससे सरकार को अपनी हिस्सेदारी बेचकर अधिक पूंजी जुटाने और विनिवेश से लगातार आमदनी सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है। विश्लेषकों का मानना है कि Nifty PSE इंडेक्स, जो फिलहाल 11.5 के P/E पर कारोबार कर रहा है, ने मजबूत प्रदर्शन किया है। हालांकि, व्यापक बाजार की भावना (broader market sentiment) सतर्कता से भरी हुई है, और कुछ रणनीतिकार 2026 की दूसरी छमाही (H2 2026) से बाजार में तेजी की उम्मीद कर रहे हैं, जो मैक्रो इकोनॉमिक इंडिकेटर्स (macro economic indicators) और आय (earnings) में सुधार पर निर्भर करेगा। हालिया अमेरिका-भारत व्यापार समझौते (US-India trade deal) ने सेंटीमेंट को बढ़ावा दिया है, लेकिन लगातार खरीदारी आय में सुधार और बुनियादी मजबूती पर निर्भर करेगी। इसलिए, 'गोल्डन शेयर' व्यवस्था का पुनरुद्धार राज्य नियंत्रण की अनिवार्यता और बाजार की दक्षता एवं निजी पूंजी को आकर्षित करने की मांग के बीच एक जटिल नीतिगत विकल्प प्रस्तुत करता है।