'मैराथन और स्प्रिंट' साथ-साथ: भारत की दोहरी रणनीति
पूर्व RBI गवर्नर शक्तिकांत दास ने भारत की आर्थिक रणनीति को 'मैराथन और स्प्रिंट' दोनों की तरह बताया है। उनका विजन है कि भारत सिर्फ एक भागीदार नहीं, बल्कि आने वाले दस सालों में वैश्विक आर्थिक विकास का मुख्य 'आर्किटेक्ट' बने। इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करने के लिए, भारत एक साथ मैक्रोइकॉनॉमिक स्थिरता (Macroeconomic Stability) बनाए रखने और विकास को तेजी से आगे बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
फिस्कल कंसॉलिडेशन और निवेश पर जोर
दास के रोडमैप का एक अहम हिस्सा फिस्कल कंसॉलिडेशन है। इसके तहत, सरकार का लक्ष्य 2031 तक सेंट्रल गवर्नमेंट डेट-टू-जीडीपी रेश्यो (Debt-to-GDP Ratio) को घटाकर लगभग 50% (±1%) करना है। वर्तमान में यह अनुमानित 56.1% (मार्च 2026 तक) है। डेट-टू-जीडीपी रेश्यो को पॉलिसी का मुख्य आधार बनाने से आर्थिक झटकों से निपटने में अधिक लचीलापन मिलेगा। इसके साथ ही, कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capital Expenditure) में भी बड़ी बढ़ोतरी की योजना है। यह रणनीति दर्शाती है कि कैसे राजकोषीय अनुशासन (Fiscal Prudence) को विकास-उन्मुख सरकारी निवेश में बाधा डाले बिना आगे बढ़ाया जा सकता है। अनुमान है कि नॉमिनल जीडीपी ग्रोथ (Nominal GDP Growth) सालाना लगभग 10% रहेगी।
ट्रेड पॉलिसी में बड़ा बदलाव
भारत की ट्रेड पॉलिसी (Trade Policy) में एक बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव आया है। अब स्ट्रैटेजिक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTAs) पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है, खासकर उन देशों के साथ जिनके साथ व्यापार में पूरकता (Complementarities) है और लॉजिस्टिक्स (Logistics) बेहतर हैं। इसके नतीजे भी दिखने लगे हैं: फाइनेंशियल ईयर 2020-21 और 2024-25 के बीच, स्ट्रैटेजिक FTA पार्टनर्स के साथ मर्चेंडाइज ट्रेड (Merchandise Trade) में 92% की वृद्धि हुई है, जो ग्लोबल ट्रेड ग्रोथ से काफी अधिक है। भारत ने EFTA, UAE, ऑस्ट्रेलिया और यूके के साथ समझौते किए हैं और अन्य देशों के साथ बातचीत जारी है।
टेक्नोलॉजी और एनर्जी का बड़ा दांव
टेक्नोलॉजी और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (Digital Public Infrastructure) भारत की भविष्य की रणनीति का एक मुख्य स्तंभ हैं। "इंडिया स्टैक 2.0" (India Stack 2.0) के साथ, भारत एक अधिक इंटेलिजेंट, AI-संचालित और विश्व स्तर पर स्केलेबल (Globally Scalable) समाधानों की ओर बढ़ रहा है। एनर्जी सेक्टर में भी बड़े लक्ष्य हैं, जैसे 2030 तक सालाना 50 लाख मीट्रिक टन ग्रीन हाइड्रोजन (Green Hydrogen) का उत्पादन। इसके लिए, 50% से अधिक बिजली पहले से ही नॉन-फॉसिल फ्यूल सोर्स (Non-Fossil Fuel Source) से आ रही है, और 2030 तक 500 GW नॉन-फॉसिल फ्यूल कैपेसिटी का लक्ष्य है। हालांकि, रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) के एग्जीक्यूशन में ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर (Transmission Infrastructure) की कमी और क्रिटिकल मिनरल्स (Critical Minerals) की सप्लाई चेन (Supply Chain) संबंधी कमजोरियां जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं।
विनिर्माण (Manufacturing) में बढ़त, पर हैं कुछ कमियां
भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर (Manufacturing Sector) मजबूत हो रहा है, खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स (Electronics) में। लेकिन, इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) के मामले में कुछ कमी है। वियतनाम और मेक्सिको जैसे प्रतिद्वंद्वी देशों की तुलना में, वियतनाम का इलेक्ट्रॉनिक्स में मजबूत दबदबा है और इंपोर्ट ड्यूटी (Import Duty) कम है, जबकि मेक्सिको USMCA और अमेरिकी बाजार से निकटता का फायदा उठाता है। भारत का फायदा विशाल लेबर पूल (Labor Pool) और लागत दक्षता (Cost Efficiencies) में है, लेकिन लॉजिस्टिक्स की चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं।
वित्तीय मोर्चे पर मजबूत स्थिति
एक दशक पहले की 'ट्विन बैलेंस शीट' (Twin Balance Sheet) समस्या (स्ट्रेस्ड बैंक और ओवर-लिवरेज्ड कॉर्पोरेट्स) से भारत का वित्तीय सिस्टम अब काफी मजबूत हो गया है। ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (GNPAs) 2017-18 में 11.2% के शिखर से घटकर सितंबर 2025 तक 2.1% रहने का अनुमान है। इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (Insolvency and Bankruptcy Code) जैसे सुधारों ने इसे और मजबूत किया है।
वैश्विक जोखिमों का सामना
इन महत्वाकांक्षी लक्ष्यों और मजबूत घरेलू फंडामेंटल्स के बावजूद, भारत को कई बाहरी जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है। दुनिया 'लगातार भू-राजनीतिक विखंडन', 'सप्लाई-चेन रीड्जस्टमेंट' और 'असमान आर्थिक गति' का सामना कर रही है, जिससे बड़े देशों में जोखिम 'निचले स्तर की ओर झुके' हुए हैं। प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बढ़ा हुआ पब्लिक डेट (Public Debt) और फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) वैश्विक वित्तीय स्थितियों को टाइट कर सकते हैं, जिससे भारत जैसे उभरते बाजारों (Emerging Markets) के लिए कैपिटल फ्लो (Capital Flow) में अस्थिरता बढ़ सकती है।
2031 तक 50% के डेट-टू-जीडीपी लक्ष्य को पूरा करना और साथ ही पब्लिक इन्वेस्टमेंट (Public Investment) को ऊंचा रखना एक बड़ा वित्तीय संतुलन (Fiscal Tightrope) का काम है। कुछ अनुमान बताते हैं कि इंफ्रास्ट्रक्चर और कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च की वजह से FY2026-27 का फिस्कल डेफिसिट बजटेड 4.3% के बजाय 4.5-4.6% के करीब रह सकता है। ग्रीन हाइड्रोजन और AI जैसे क्षेत्रों में महत्वाकांक्षाएं बड़ी हैं, लेकिन क्रिटिकल मिनरल्स के आयात पर निर्भरता और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी से इन लक्ष्यों को समय पर हासिल करना मुश्किल हो सकता है।
भविष्य का अनुमान
विश्लेषकों का अनुमान है कि भारत की रियल जीडीपी ग्रोथ 2025 और 2026 में 6.5% से 7.4% के बीच रहेगी, जो प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे बेहतर प्रदर्शन होगा। घरेलू खपत (Domestic Consumption), मजबूत पब्लिक इन्वेस्टमेंट और निरंतर सुधारों से इस ग्रोथ को सहारा मिलने की उम्मीद है। हालांकि, वैश्विक अनिश्चितताएं, व्यापार तनाव और लगातार नीतिगत निष्पादन (Policy Execution) की आवश्यकताएं इस विस्तार की गति और स्थिरता को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक बने रहेंगे।