India's Gig Economy: लाखों वर्कर्स की मुश्किल! आर्थिक सर्वे ने खोली पोल

ECONOMY
Whalesbook Logo
AuthorNeha Patil|Published at:
India's Gig Economy: लाखों वर्कर्स की मुश्किल! आर्थिक सर्वे ने खोली पोल
Overview

भारत की गिग इकॉनमी (Gig Economy) तेज़ी से बढ़ रही है, लेकिन इकोनॉमिक सर्वे (Economic Survey) 2025-26 की रिपोर्ट चौंकाने वाले खुलासे करती है। रिपोर्ट के मुताबिक, जहां वर्कर्स की संख्या **55%** बढ़कर **1.2 करोड़** हो गई है, वहीं **40%** से ज़्यादा लोग हर महीने **₹15,000** से भी कम कमा रहे हैं।

चमक के पीछे का सच: इकॉनमी की दोहरी तस्वीर

इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 के नतीजे भारत की तेजी से विकसित हो रही गिग इकॉनमी की एक जटिल तस्वीर पेश करते हैं। एक तरफ जहां इस सेक्टर में ज़बरदस्त विस्तार देखा जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ वर्कर्स के लिए लगातार अनिश्चितता बनी हुई है। भले ही यह सेक्टर कुल रोज़गार और GDP में बड़ा योगदान दे रहा है, लेकिन इसके एक बड़े हिस्से के वर्कर्स आज भी बुनियादी आर्थिक असुरक्षाओं से जूझ रहे हैं।

ग्रोथ और इनसिक्योरिटी का द्वंद्व

भारत में गिग वर्कर्स की संख्या में भारी उछाल आया है। FY21 में यह जहां 77 लाख थी, वहीं FY25 तक यह 55% बढ़कर करीब 1.2 करोड़ तक पहुंच गई है। स्मार्टफोन और डिजिटल पेमेंट सिस्टम के बढ़ते इस्तेमाल ने इस ग्रोथ को रफ्तार दी है। अब यह देश के कुल रोज़गार का 2% से ज़्यादा हिस्सा बन गया है। अनुमान है कि यह ट्रेंड और तेज़ होगा, और 2029-30 तक नॉन-एग्रीकल्चरल गिग वर्क भारत के वर्कफ़ोर्स का 6.7% हो सकता है, जिससे करीब ₹2.35 लाख करोड़ GDP में जुड़ने की उम्मीद है।

इस ज़बरदस्त बढ़त के बावजूद, गिग वर्कर्स का एक बड़ा हिस्सा पैसों की तंगी से जूझ रहा है। सेक्टर में लगभग 40% लोग हर महीने ₹15,000 से कम कमा पाते हैं। यह उनकी आय में भारी अस्थिरता और आर्थिक असुरक्षा को दिखाता है। कम और अनिश्चित आय के साथ-साथ, फॉर्मल रोज़गार का लंबा इतिहास न होने के कारण, गिग वर्कर्स अक्सर 'थिन-फाइल' क्रेडिट कैटेगरी में आते हैं। इससे उन्हें फॉर्मल फाइनेंशियल सर्विसेज़ (जैसे लोन) मिलने में दिक्कत होती है। इस वित्तीय बाधा के चलते वे ज़रूरी एसेट्स जैसे वाहन या खास उपकरण खरीदने में निवेश नहीं कर पाते, जिससे बेहतर कमाई वाले रोल्स में जाने के उनके अवसर सीमित हो जाते हैं।

सेक्टर पर फोकस और एल्गोरिदम का कंट्रोल

गिग रोज़गार कुछ खास सेक्टर्स में केंद्रित है। ई-कॉमर्स और लॉजिस्टिक्स सबसे बड़े एम्प्लॉयर बनकर उभरे हैं, जिनमें कुल 52 लाख वर्कर्स काम कर रहे हैं। अकेले ई-कॉमर्स में 37 लाख लोग हैं, जबकि लॉजिस्टिक्स में 15 लाख। BFSI और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर करीब 10-10 लाख गिग वर्कर्स को सपोर्ट कर रहे हैं, और रिटेल में 7 लाख हैं।

प्लेटफॉर्म एल्गोरिदम अब वर्क एलोकेशन, परफॉरमेंस मॉनिटरिंग, सैलरी तय करने और डिमांड-सप्लाई मैच करने में एक अहम भूमिका निभा रहे हैं। ये सिस्टम प्लेटफॉर्म्स के लिए ऑपरेशनल एफिशिएंसी बढ़ाते हैं, लेकिन पारदर्शिता की कमी, एल्गोरिदम में संभावित पक्षपात और वर्कर्स के बर्नआउट जैसी चिंताएं भी पैदा करते हैं। यह एल्गोरिथमिक कंट्रोल, स्किल्स बढ़ाने के सीमित अवसरों और AI व मशीन लर्निंग जैसी तकनीकों से नौकरी छूटने के डर के साथ मिलकर वर्कर्स की असुरक्षा को और बढ़ाता है, खासकर कम स्किल्स वाले रोल्स में। डिलीवरी मॉडल्स और बेहतर पेमेंट की मांग को लेकर हालिया वर्कर्स के प्रोटेस्ट इस बात की ओर इशारा करते हैं कि काम करने की बेहतर कंडीशंस और फॉर्मल पहचान की ज़रूरत बढ़ रही है।

पॉलिसी की राहें और भविष्य का अनुमान

इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 ने गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को 'कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी, 2020' के तहत फॉर्मल मान्यता देने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है। इसमें प्रोविडेंट फंड, इंश्योरेंस और मैटरनिटी बेनिफिट्स जैसी सोशल सिक्योरिटी का दायरा बढ़ाने की बात कही गई है, जिसे पोर्टेबल वेलफेयर फ्रेमवर्क के ज़रिए लागू किया जा सके। सर्वे में प्रति घंटा या प्रति टास्क मिनिमम अर्निंग तय करने, और इंतज़ार के समय का भी भुगतान शामिल करने का सुझाव दिया गया है, ताकि यह रेगुलर एम्प्लॉयमेंट के गैप को कम कर सके और फॉर्मलाइजेशन को बढ़ावा दे।

आगे चलकर, यह उम्मीद की जा रही है कि नॉन-एग्रीकल्चरल गिग वर्क 2029-30 तक भारत की GDP में बड़ा योगदान देगा। लेकिन, यह सुनिश्चित करने के लिए कि इस ग्रोथ का फायदा सीधे वर्कर्स की ज़िंदगी में सुधार लाए, पॉलिसी इंटरवेंशन ज़रूरी हैं। इनमें स्किल्स को बढ़ाना, क्रेडिट तक ज़्यादा पहुंच देना और प्रोडक्टिव एसेट्स उपलब्ध कराना शामिल है। इसका मकसद वर्कर्स को आर्थिक रूप से ऊपर उठाना है, ताकि गिग वर्क केवल कम आय की ज़रूरत बनकर न रह जाए, बल्कि एक भरोसेमंद करियर पाथवे बन सके।

Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.