### भारत में गिग वर्कफ़ोर्स का दोहरा विस्तार
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, भारत में गिग वर्कफ़ोर्स 77 लाख तक पहुँच गया है, जो देश के कुल रोज़गार का 2% से थोड़ा अधिक है। डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म, स्मार्टफोन की सर्वव्यापकता और डिजिटल भुगतान प्रणालियों द्वारा संचालित इस क्षेत्र में वित्तीय वर्ष 2021-22 से 2024-25 के बीच 55 प्रतिशत का महत्वपूर्ण विस्तार देखा गया है, जो लगभग 1.2 करोड़ श्रमिकों तक पहुँच गया है। अनुमान बताते हैं कि यह और तेज़ी से बढ़ेगा, और 2029-30 तक गैर-कृषि गिग वर्क भारत के कार्यबल का 6.7 प्रतिशत हो सकता है, जिससे सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में अनुमानित ₹2.35 लाख करोड़ का योगदान होगा। इस मज़बूत वृद्धि के बावजूद, आर्थिक योगदान और श्रमिकों द्वारा सामना की जाने वाली अंतर्निहित कमजोरियों के बीच एक बढ़ती हुई खाई कथा को परिभाषित कर रही है।
क्षेत्रीय एकाग्रता और विकसित होती गतिशीलता
गिग रोज़गार मुख्य रूप से उच्च-टर्नओवर वाले क्षेत्रों में केंद्रित है, जिसमें ई-कॉमर्स और लॉजिस्टिक्स का संयुक्त रूप से 52 लाख श्रमिक हैं। अकेले ई-कॉमर्स में 37 लाख प्रतिभागी हैं, जिसके बाद लॉजिस्टिक्स में 15 लाख हैं। वित्तीय सेवाएँ (BFSI) और विनिर्माण क्षेत्रों में प्रत्येक में लगभग 10 लाख गिग श्रमिक हैं, जबकि खुदरा में लगभग 7 लाख हैं। परिवहन और आईटी सेवाएँ क्रमशः 6 लाख और 5 लाख श्रमिकों का योगदान करती हैं। स्वास्थ्य सेवा, निर्माण और शिक्षा जैसे छोटे खंडों में भी लगभग 3 लाख श्रमिक हैं। ये आँकड़े एक विशिष्ट वितरण को रेखांकित करते हैं, जो मुख्य रूप से सेवा वितरण और डिजिटल-मध्यस्थता वाली भूमिकाओं पर केंद्रित है, हालांकि मांग बुनियादी डिलीवरी से लेकर प्रोग्रामिंग और कानूनी परामर्श जैसी विशेषीकृत पेशेवर सेवाओं तक फैली हुई है।
विश्लेषणात्मक गहनता: वृद्धि के बीच अनिश्चितता
जबकि गिग इकोनॉमी रोज़गार के लिए एक गतिशील इंजन प्रस्तुत करती है, आर्थिक सर्वेक्षण श्रमिक स्थिरता और ऊपर की ओर गतिशीलता में बाधा डालने वाली निरंतर चुनौतियों को चिह्नित करता है। लगभग 40 प्रतिशत गिग श्रमिक प्रति माह ₹15,000 से कम आय की रिपोर्ट करते हैं, जो घटती मांग, असंगत भुगतान और गारंटीकृत मज़दूरी की अनुपस्थिति का सीधा परिणाम है। यह आय अस्थिरता, सीमित औपचारिक रोज़गार इतिहास के साथ मिलकर, औपचारिक क्रेडिट तक पहुँचने में महत्वपूर्ण बाधाएँ पैदा करती है, जिससे कई लोग "थिन-फ़ाइल" क्रेडिट श्रेणी में आ जाते हैं। यह वित्तीय बहिष्करण वाहनों या विशेषीकृत उपकरणों जैसी उत्पादक संपत्तियों में निवेश करने की उनकी क्षमता को सीमित करता है, जिससे वे कम आय वाले गिग की भूमिकाओं में फँस जाते हैं। इसके अलावा, काम आवंटित करने, प्रदर्शन का मूल्यांकन करने और मज़दूरी निर्धारित करने के लिए प्लेटफ़ॉर्म एल्गोरिदम पर बढ़ती निर्भरता पारदर्शिता, संभावित पूर्वाग्रह और श्रमिक बर्नआउट के बारे में गंभीर प्रश्न उठाती है। सीमित अपस्किलिंग अवसरों और विशेष रूप से AI और मशीन लर्निंग के कारण तकनीकी प्रगति से नौकरी छूटने के खतरे, निम्न-कुशल गिग श्रमिकों की भेद्यता को बढ़ाते हैं। विश्व स्तर पर, जबकि प्लेटफ़ॉर्म वर्क विकसित बाजारों के समान लचीलापन प्रदान करता है, कई देश लाभ के अंतराल और आय अस्थिरता से भारत के संघर्षों को प्रतिध्वनित करते हैं, हालाँकि कुछ देशों में उनके कुल श्रम बल की तुलना में गिग वर्क की पैठ दर अधिक देखी गई है।
नीतिगत ढाँचा और भविष्य का दृष्टिकोण
नियामक ढाँचे में सामाजिक सुरक्षा संहिता के तहत गिग और प्लेटफ़ॉर्म श्रमिकों को मान्यता दी गई है, जो औपचारिक रूप से पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी संबंधों से परे उनकी विशिष्ट स्थिति को स्वीकार करता है। तत्काल नीतिगत अनिवार्यता पोर्टेबल कल्याणकारी ढाँचों के माध्यम से भविष्य निधि, बीमा और मातृत्व लाभों सहित सामाजिक सुरक्षा उपायों तक पहुँच का विस्तार करना है। यूरोपीय संघ के प्लेटफ़ॉर्म वर्कर्स डायरेक्टिव जैसे वैश्विक समानांतर, कार्यकर्ता अधिकारों को संबोधित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों को उजागर करते हैं, हालाँकि भारत का वर्तमान दृष्टिकोण अनिवार्य कर्मचारी पुनर्वर्गीकरण की ओर कोई कदम नहीं दर्शाता है। भविष्य के नीतिगत प्रयासों को कौशल, ऋण सुविधाओं और आवश्यक उत्पादक संपत्तियों तक पहुँच को बढ़ाने की ओर Pivot करना चाहिए। उद्देश्य वास्तविक ऊपर की ओर गतिशीलता को सक्षम करना है, यह सुनिश्चित करना कि गिग वर्क केवल कम-आय की मजबूरी से आगे बढ़कर भारत के रोज़गार और आर्थिक विस्तार में अपने बढ़ते योगदान को बनाए रखे। विश्लेषक सुझाव देते हैं कि एक संतुलित नियामक दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है, जो डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर नवाचार को बढ़ावा देता है और साथ ही व्यवस्थित जोखिमों को कम करने के लिए मजबूत श्रमिक सुरक्षा को लागू करता है।
