भारत में इस तिमाही (अप्रैल-जून) प्राकृतिक गैस की खपत में 6.5% की भारी गिरावट आई है। कुल खपत घटकर 16 बिलियन क्यूबिक मीटर (bcm) रह गई। इसके पीछे दो बड़े कारण हैं: विदेशों से गैस इंपोर्ट (Import) करने की बढ़ी हुई लागत और डोमेस्टिक प्रोडक्शन (Domestic Production) में आई कमी।
Detailed Coverage
इंपोर्ट महंगा, क्यों घटी खपत?
भारत अपनी आधी से ज़्यादा गैस की ज़रूरतें इंपोर्ट (Import) के ज़रिए पूरी करता है, इसीलिए ग्लोबल मार्केट (Global Market) में कीमतों का सीधा असर यहाँ की खपत पर पड़ता है। इस तिमाही में LNG इंपोर्ट में 8.6% की गिरावट आई और यह 7.7 bcm पर पहुँच गया। इसकी मुख्य वजह रही गैस की आसमान छूती कीमतें, जो इंपोर्ट को महंगा बना रही थीं। खासतौर पर मिडिल ईस्ट (Middle East) में जियोपॉलिटिकल टेंशन (Geopolitical Tension) ने सप्लाई चेन को और बिगाड़ दिया, जिससे स्पॉट मार्केट (Spot Market) में JKM जैसी बेंचमार्क कीमतों में ज़बरदस्त उछाल देखा गया।
डोमेस्टिक प्रोडक्शन का हाल
सिर्फ इंपोर्ट ही नहीं, डोमेस्टिक प्रोडक्शन (Domestic Production) भी इस बार फीका रहा। इस तिमाही में डोमेस्टिक गैस आउटपुट (Output) में 4.3% की गिरावट आई और यह 8.3 bcm दर्ज किया गया। यह लगातार दूसरे साल देखी जा रही प्रोडक्शन में कमी का हिस्सा है। Reliance Industries और ONGC जैसी बड़ी कंपनियां इस प्रोडक्शन के मुख्य ऑपरेटर (Operator) हैं। प्राइवेट सेक्टर (Private Sector) की फील्ड्स में प्रोडक्शन 7.5% तक गिरा, जबकि सरकारी कंपनियों के प्रोडक्शन में 2% की कमी आई। चूंकि देश के कुल डोमेस्टिक गैस प्रोडक्शन में प्राइवेट सेक्टर का योगदान लगभग 37% है, इसलिए इस गिरावट का असर कुल सप्लाई पर पड़ना लाज़मी है।
निवेशकों के लिए क्या है ख़ास?
यह पूरा ट्रेंड उन निवेशकों के लिए अहम है जो गैस पर निर्भर सेक्टर्स, जैसे पावर जनरेशन (Power Generation), फर्टिलाइज़र (Fertiliser) और सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन (City Gas Distribution) में पैसा लगाते हैं। जब गैस के दाम बढ़ते हैं या सप्लाई कम हो जाती है, तो इन इंडस्ट्रीज़ पर सीधा दबाव आता है। कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन (Profit Margin) पर असर पड़ सकता है, क्योंकि वे महंगी गैस का पूरा खर्च ग्राहकों पर डालना मुश्किल पाते हैं।
लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स (Long-term Contracts) में कमी को पूरा करने के लिए स्पॉट मार्केट पर ज़्यादा निर्भर रहने से कंपनियों के कैश फ्लो (Cash Flow) में अस्थिरता आ सकती है। निवेशकों को यह देखना होगा कि ये कंपनियां अपने फ्यूल मिक्स (Fuel Mix) को कैसे मैनेज करती हैं और क्या वे भविष्य के लिए ज़्यादा स्थिर प्राइसिंग एग्रीमेंट्स (Pricing Agreements) हासिल कर पाती हैं। कृष्णा गोदावरी बेसिन (Krishna Godavari basin) से प्रोडक्शन की ताज़ा खबरें और ग्लोबल LNG स्पॉट कीमतों का उतार-चढ़ाव इस सेक्टर की कंपनियों की फाइनेंशियल हेल्थ (Financial Health) का जायज़ा लेने के लिए ज़रूरी होगा।
