फैक्ट्रियों के अंदर 'भट्टी' जैसे हालात
हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के गारमेंट सेक्टर में काम करने वाले 90% से ज्यादा मजदूरों ने भीषण गर्मी के कारण सेहत खराब होने की बात कही है। करीब 78.3% मजदूरों का कहना है कि उनकी वर्कप्लेस ऐसी है जैसे 'भट्टी में काम कर रहे हों', जहाँ मशीनें 99 डिग्री सेल्सियस तक गर्म हो जाती हैं। इस जानलेवा माहौल का सीधा असर प्रोडक्शन पर पड़ रहा है; 68.7% मजदूरों ने माना कि गर्मी की वजह से उनकी काम करने की क्षमता घट जाती है। प्रोडक्शन टारगेट पूरा करने का दबाव इतना है कि कई बार मजदूर ब्रेक भी नहीं ले पाते, जिससे स्ट्रेस दोगुना हो जाता है।
महिलाओं पर सबसे ज्यादा मार
इस गर्मी के संकट का असर महिलाओं पर कहीं ज्यादा देखने को मिल रहा है। महिलाओं का एवरेज हीट स्ट्रेस इंडेक्स (HSI) स्कोर 61.5 रहा, जबकि पुरुषों का यह स्कोर सिर्फ 18.6 था। इसके गंभीर स्वास्थ्य परिणाम सामने आ रहे हैं; 97% से ज्यादा महिलाओं को डिहाइड्रेशन (पानी की कमी) के कारण जलन महसूस हुई, और 92% से ज्यादा महिलाओं के मासिक चक्र (menstrual cycles) में गड़बड़ी देखी गई। कई मजदूर तो पंखे या ज्यादा वॉशरूम ब्रेक मांगने पर डांट खा रहे हैं।
नीतिगत और शासन संबंधी खामियां
रिपोर्ट इन गंभीर समस्याओं के पीछे देश की जलवायु नीति (climate policy) और गवर्नेंस (शासन) की बड़ी खामियों को भी उजागर करती है। राष्ट्रीय जलवायु कार्य योजनाएं (National Action Plan on Climate Change) अक्सर इनडोर वर्कप्लेस (फैक्ट्रियों के अंदर) की गर्मी को नजरअंदाज करती हैं। साथ ही, श्रम मंत्रालय (Ministry of Labour) भी जलवायु एक्शन प्लानिंग से काफी हद तक दूर है। भारत में कार्यस्थल पर अत्यधिक गर्मी से बचाव के लिए कोई स्पष्ट, लागू करने योग्य राष्ट्रीय मानक (national standards) मौजूद नहीं हैं। शहरों में हीट एक्शन प्लान (HAP) हैं, लेकिन वे अक्सर फंड की कमी, खराब समन्वय और अनौपचारिक मजदूरों को शामिल न करने जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं।
बढ़ता ईएसजी (ESG) जोखिम और एक्सपोर्ट पर खतरा
यह स्थिति भारत के टेक्सटाइल और अपैरल सेक्टर के लिए बड़े ईएसजी जोखिम पैदा कर रही है। यह सेक्टर भारत के जीडीपी (GDP) और $35 बिलियन के एक्सपोर्ट्स में अहम योगदान देता है। आजकल ग्लोबल बायर्स (अंतरराष्ट्रीय खरीदार) कंपनियों से ईएसजी नियमों का पालन करने की मांग कर रहे हैं। जो कंपनियां इन मानकों पर खरी नहीं उतरतीं, उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजार में एंट्री मिलना मुश्किल हो रहा है। खास तौर पर छोटी और मझोली कंपनियों (SMEs) के लिए ये सख्त नियम पूरा करना एक बड़ी चुनौती है।
आर्थिक नुकसान और ILO की चेतावनी
इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन (ILO) की मानें तो अगर तुरंत कदम नहीं उठाए गए, तो गर्मी के तनाव (heat stress) के कारण भारत में 2030 तक 35 मिलियन फुल-टाइम जॉब्स (पूर्णकालिक नौकरियां) खत्म हो सकती हैं और जीडीपी में 4.5% की गिरावट आ सकती है। वैश्विक स्तर पर, ILO का अनुमान है कि 2030 तक दुनिया भर में 80 मिलियन फुल-टाइम नौकरियों का नुकसान और $2.4 ट्रिलियन का घाटा हो सकता है। भारत में, गर्मी के कारण प्रोडक्टिविटी लॉस (उत्पादकता में कमी) से अर्थव्यवस्था को अब तक $100 बिलियन का नुकसान हो चुका है। 45 मिलियन से ज्यादा लोगों को रोजगार देने वाला टेक्सटाइल उद्योग इस गर्मी के बढ़ते प्रकोप से बुरी तरह प्रभावित है।
निवेशकों की नजर में 'ESG लायबिलिटी'
निवेशकों के नजरिए से, यह स्थिति एक बड़ी ईएसजी लायबिलिटी (ESG Liability) है। श्रमिकों की गर्मी से सुरक्षा के लिए बुनियादी उपाय न कर पाना, गवर्नेंस (शासन) में गहरी कमी को दर्शाता है। जिन ब्रांड्स की सप्लाई चेन भारत में है, उन पर ग्राहकों और रेगुलेटर्स (नियामकों) का दबाव बढ़ रहा है कि वे एथिकल (नैतिक) सप्लाई चेन सुनिश्चित करें। जो कंपनियां केवल कुछ 'मॉडल यूनिट्स' को ऑडिट के लिए तैयार रखती हैं, जबकि बाकी फैक्ट्रियों में खतरनाक हालात बने रहते हैं, वे अपनी प्रतिष्ठा को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती हैं और उनकी सप्लाई चेन बाधित हो सकती है।
आगे की राह और नीतिगत जरूरतें
इस संकट से निपटने के लिए एकीकृत नीति विकास (integrated policy development) और श्रमिकों पर केंद्रित जलवायु कार्रवाई (worker-centric climate action) की ओर एक बड़े बदलाव की जरूरत है। इसमें हीट स्ट्रेस को एक व्यावसायिक रोग (occupational disease) के रूप में पहचानना, श्रम कानूनों में गर्मी से बचाव के विशेष प्रावधान जोड़ना और जलवायु व श्रम अधिकारियों के बीच सहयोग बढ़ाना शामिल है। जो कंपनियां कूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर (cooling infrastructure) में निवेश करेंगी, प्रभावी हीट एक्शन प्लान लागू करेंगी और उचित श्रम प्रथाएं अपनाएंगी, वे न केवल जोखिमों को कम करेंगी, बल्कि एक प्रतिस्पर्धी बढ़त भी हासिल करेंगी, ईएसजी-केंद्रित निवेश आकर्षित करेंगी और ब्रांड लॉयल्टी बढ़ाएंगी।