GST काउंसिल की देरी, बिज़नेस के लिए आफत
GST काउंसिल की मीटिंग्स में हो रही लंबी देरी के कारण भारत में बिज़नेस के लिए अनिश्चितता बढ़ गई है। GST 2.0 रिफॉर्म्स को लागू करने के बाद से जो समस्याएं खड़ी हुई थीं, वे अब और गंभीर हो गई हैं। इसका सीधा असर कंपनियों के ज़रूरी वर्किंग कैपिटल (Working Capital) पर पड़ रहा है और महत्वपूर्ण सुधार (Reforms) रुक गए हैं।
'इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर' से कैश की किल्लत
मुख्य समस्या 'इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर' (Inverted Duty Structure) है। इसमें बिज़नेस को कच्चा माल खरीदने पर ज़्यादा टैक्स देना पड़ता है, जबकि तैयार माल पर टैक्स कम लगता है। इस टैक्स के अंतर की वजह से कंपनियों का अरबों रुपया 'अन-रिफंडेड टैक्स क्रेडिट' (Unrefunded Tax Credits) के रूप में फंस गया है। यह पैसा कंपनियों के वर्किंग कैपिटल को जाम कर रहा है। मैन्युफैक्चरिंग, फार्मा, FMCG, टेक्सटाइल और इलेक्ट्रिक व्हीकल जैसे सेक्टर्स पर इसका बुरा असर दिख रहा है।
रिफॉर्म्स रुके, एक्सपर्ट्स चिंतित
GST काउंसिल की पिछली मीटिंग सितंबर 2025 में हुई थी और उसके बाद से कोई नई तारीख तय नहीं हुई है, जबकि नियम के अनुसार हर तीन महीने में मीटिंग होनी चाहिए। इस देरी के कारण 'इनवॉइस मैनेजमेंट सिस्टम' (Invoice Management System - IMS) जैसे ज़रूरी डिजिटल रिफॉर्म्स भी ठप पड़े हैं। EY India, AMRG Global और Khaitan & Co जैसे एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस तरह की पॉलिसी अनिश्चितता (Policy Uncertainty) निवेशकों का भरोसा कम करती है और बिज़नेस को आगे बढ़ाने वाले बदलावों को धीमा कर देती है। फार्मा एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (Pharmexcil) ने तो चेतावनी दी है कि दवा निर्माण (Drug Manufacturing) सिकुड़ सकता है और सप्लाई चेन (Supply Chain) बाधित हो सकती है।
MSMEs पर भारी बोझ, ₹30 लाख करोड़ का क्रेडिट गैप
यह समस्या सिर्फ मीटिंग में देरी की नहीं, बल्कि GST 2.0 के डिज़ाइन में भी खामी मानी जा रही है। ऐसा लगता है कि सरकार ने खपत बढ़ाने पर ज़्यादा ध्यान दिया, लेकिन मैन्युफैक्चरर्स के लिए वर्किंग कैपिटल की समस्या को हल नहीं किया। 'इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर' की वजह से छोटे और मझोले व्यवसायों (MSMEs) पर कैश की भारी किल्लत है। अनुमान है कि ₹30 लाख करोड़ से ज़्यादा का क्रेडिट गैप (Credit Gap) बन गया है, जहाँ कंपनियाँ सरकार को टैक्स के ज़रिए कर्ज़दार बनी हुई हैं। रिफंड (Refund) की धीमी और जटिल प्रक्रिया इस समस्या को और बढ़ा रही है, जिससे टैक्स क्रेडिट एक 'बेकार संपत्ति' (Unusable Asset) बन गए हैं।
आर्थिक ग्रोथ के बावजूद नीतिगत स्थिरता ज़रूरी
भारत की इकोनॉमी FY26 में 6.7% से 8.2% की दर से बढ़ने का अनुमान है, और महंगाई भी कंट्रोल में है। ऐसे मजबूत आर्थिक माहौल के बावजूद, ये टैक्स की नीतियां (Tax Policies) एक बड़ी चुनौती पेश कर रही हैं। GST काउंसिल की नियमित मीटिंग्स और इन समस्याओं का तुरंत समाधान, इंडस्ट्री-स्पेसिफिक अनिश्चितताओं को दूर करने, टैक्स की स्पष्टता (Tax Certainty) देने और 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' (Ease of Doing Business) को मज़बूत करने के लिए बहुत ज़रूरी हैं। यह घरेलू और विदेशी निवेश (Domestic and Foreign Investment) को आकर्षित करने और बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।