नए आंकड़ों के साथ इकोनॉमी की मजबूत रफ्तार
भारत की इकोनॉमी ने नए सांख्यिकीय (statistical) तौर-तरीकों के तहत अपनी काबिलियत दिखाई है। वित्त वर्ष 2025-26 की तीसरी तिमाही (Q3) में GDP ग्रोथ 7.8% रही। यह आंकड़ा पिछले फाइनेंशियल ईयर की इसी तिमाही के 7.4% ग्रोथ से काफी बेहतर है। इस नई GDP सीरीज का बेस ईयर 2022-23 है। मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन (Ministry of Statistics and Programme Implementation) ने पूरे फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के लिए ग्रोथ का अनुमान 7.6% लगाया है, जो पहले के अनुमानों से ज्यादा है। इस ग्रोथ का मुख्य कारण मजबूत घरेलू खपत (domestic consumption) और निवेश (investment) है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने खासकर ज़ोरदार परफॉरमेंस दी है, पिछले सालों में डबल-डिजिट ग्रोथ के बाद अब भी यह रफ्तार बनाए हुए है। वहीं, सर्विसेज सेक्टर ने भी फाइनेंशियल ईयर 26 की पहली छमाही में 9% से ज्यादा ग्रोथ दर्ज की है।
दुनिया में सबसे तेज रफ्तार, पर अनुमानों में अंतर
फाइनेंशियल ईयर 2026 के लिए भारत का 7.6% का अनुमान, दुनिया की सबसे तेज रफ्तार से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक के तौर पर स्थापित करता है। यह ग्लोबल ग्रोथ के अनुमानों (3.1% से 3.3% 2026 के लिए) से काफी ज्यादा है। अमेरिका (लगभग 2.4%) और चीन (लगभग 4.2-4.8%) जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की ग्रोथ इससे कहीं कम रहने की उम्मीद है। हालांकि, सरकारी GDP आंकड़ों पर अलग-अलग संस्थानों के अनुमानों में बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। इंटरनेशनल मोनेटरी फंड (IMF) ने FY26 के लिए 7.3% ग्रोथ का अनुमान लगाया है, जबकि वर्ल्ड बैंक 7.2% का अनुमान दे रहा है। इसके उलट, SBI और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया जैसे घरेलू संस्थानों की रिपोर्ट 7.8% से भी ज्यादा, कुछ तो Q3 FY26 के लिए 8.1% या 8.3% तक ग्रोथ का अनुमान लगा रही हैं। यह बड़ा अंतर और नई GDP सीरीज, इकोनॉमी के सटीक भविष्य का अंदाजा लगाने में थोड़ी जटिलता ला रहे हैं।
महंगाई पर लगाम, RBI का नरम रुख
एक तरफ जहां इकोनॉमी तेजी से बढ़ रही है, वहीं महंगाई (inflation) नियंत्रण में बनी हुई है। जनवरी 2026 में भारत का कंज्यूमर इन्फ्लेशन 2.75% रहा, जो कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के टारगेट बैंड के अंदर है। ऐसे अनुमान हैं कि महंगाई मॉडरेट बनी रहेगी, Crisil का अनुमान FY26 के लिए 2.5% है और RBI खुद 2.1% के आसपास रहने की उम्मीद कर रहा है। इस नरम महंगाई के माहौल ने RBI को अपनी पॉलिसी रेपो रेट (5.25%) को अपरिवर्तित रखते हुए नरमी का रुख (accommodative stance) बनाए रखने में मदद की है। सेंट्रल बैंक का फोकस अब रेट बढ़ाने की बजाय इकोनॉमी में लिक्विडिटी बढ़ाने पर है, ताकि मोनेटरी पॉलिसी का असर बेहतर तरीके से हो सके। यह दर्शाता है कि RBI को मौजूदा ग्रोथ रफ्तार पर भरोसा है और वह कीमतों पर दबाव नहीं चाहता।
किन बातों का रखना है ध्यान?
इन सकारात्मक आंकड़ों के बावजूद, कुछ जोखिम कारक (risk factors) हैं जिन पर ध्यान देना जरूरी है। अमेरिका द्वारा लगाए जा रहे टैरिफ (tariffs) और ग्लोबल ट्रेड में बढ़ता तनाव, भारत के एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड सेक्टर्स के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। भले ही घरेलू मांग (domestic demand) मजबूत बनी हुई है, लेकिन ग्लोबल इकोनॉमी में किसी भी बड़ी मंदी का अप्रत्यक्ष असर भारत पर पड़ सकता है। इसके अलावा, नई GDP बेस ईयर और मेथोडोलॉजी का इस्तेमाल, जो इकोनॉमी का ज्यादा सटीक चित्रण करने के लिए है, वह ऐतिहासिक आंकड़ों से सीधी तुलना को थोड़ा मुश्किल बना रहा है। विभिन्न संस्थानों द्वारा दिए जा रहे अनुमानों की विस्तृत श्रृंखला भी सटीक ग्रोथ ट्रैक को समझने में अनिश्चितता पैदा करती है। ग्लोबल इकोनॉमी के आउटलुक में AI सेक्टर की वैल्यूएशन से जुड़े जोखिमों को भी उठाया गया है, जो वित्तीय बाजारों में अस्थिरता ला सकते हैं और उभरते बाजारों (emerging markets) पर असर डाल सकते हैं।
आगे की राह
आने वाले समय में, भारत ग्लोबल इकोनॉमी का एक महत्वपूर्ण ग्रोथ इंजन बने रहने के लिए तैयार है। अनुमान बताते हैं कि 2026 तक नॉमिनल GDP के मामले में भारत जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी इकोनॉमी बन जाएगा। भले ही आने वाले सालों में कुछ साइक्लिकल फैक्टर्स के कारण ग्रोथ में थोड़ी नरमी आ सकती है, लेकिन घरेलू मांग, स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स और टेक्नोलॉजिकल इनोवेशन जैसे मुख्य कारक ग्रोथ को बनाए रखेंगे। ग्लोबल ट्रेड की अनिश्चितताओं से निपटना और स्थिर मोनेटरी पॉलिसी का रुख, इस ग्रोथ की रफ्तार को मजबूत करने में महत्वपूर्ण होंगे। हालांकि, नई GDP सीरीज के तहत डेटा का मूल्यांकन करते समय एक सूक्ष्म (nuanced) दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता होगी।