मजबूत ग्रोथ के आंकड़े
SBI Research ने हालिया रिपोर्ट में कहा है कि वित्तीय वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही (Q3 FY26) में भारत की रियल GDP ग्रोथ 8.1% रहने का अनुमान है। यह ग्रोथ मजबूत डोमेस्टिक डिमांड, कंजम्पशन (खपत), एग्रीकल्चर (कृषि), इंडस्ट्री (उद्योग) और सर्विसेज (सेवाएं) जैसे क्षेत्रों में आए सुधार का नतीजा है। रिसर्च में 50 से ज़्यादा लीडिंग इंडिकेटर्स को ट्रैक किया गया, जिनमें से 87% में Q3 FY26 में तेजी दर्ज की गई। यह दर्शाता है कि इकोनॉमी में अच्छी खासी रफ्तार है। अन्य एजेंसियां भी FY26 के लिए 7.4% से 7.8% के बीच ग्रोथ का अनुमान लगा रही हैं।
अनिश्चितता का सबसे बड़ा कारण: GDP डेटा का रीकैलिब्रेशन
लेकिन, इस मजबूत ग्रोथ के अनुमानों के बीच सबसे बड़ी चिंता GDP डेटा को मापने के तरीके में आने वाले बड़े बदलावों को लेकर है। सबसे अहम डेवलपमेंट यह है कि भारत के GDP सीरीज का बेस ईयर 2011-12 से बदलकर 2022-23 किया जा रहा है। यह बड़ा रीकंस्ट्रक्शन 27 फरवरी, 2026 को जारी होने वाले दूसरे एडवांस एस्टिमेट्स के साथ किया जाएगा। इसका मकसद डिजिटल इकोनॉमी, कंजम्पशन पैटर्न और अन्य स्ट्रक्चरल बदलावों को नए सिरे से आंकना है।
क्या पुराने आंकड़े बदल जाएंगे?
ऐतिहासिक तौर पर, बेस ईयर में ऐसे बड़े बदलावों से पहले के आर्थिक आंकड़ों की तुलना करना मुश्किल हो जाता है। 2015 में 2011-12 बेस ईयर में बदलाव के बाद, पिछले सालों के मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ रेट्स और फिस्कल डेफिसिट-टू-GDP जैसे मैक्रोइकोनॉमिक रेश्योज़ में काफी बड़े एडजस्टमेंट हुए थे। यह साफ नहीं है कि नया बेस ईयर 2022-23 पिछले आंकड़ों को कितना बदलेगा और इससे भारत की इकोनॉमिक ग्रोथ की कहानी पर क्या असर पड़ेगा।
ग्लोबल इकोनॉमी के मुकाबले भारत
ग्लोबली, इमर्जिंग मार्केट्स से 2026 में करीब 3% से 4% की मॉडरेट ग्रोथ की उम्मीद है। ऐसे में भारत की 8% से ज़्यादा की ग्रोथ इसे एक दमदार परफॉर्मर बनाती है। RBI ने अपनी रेपो रेट 5.25% पर स्थिर रखी है, जिससे इकोनॉमिक स्टेबिलिटी बनी हुई है। FY27 के लिए इन्फ्लेशन (मुद्रास्फीति) 4% के आसपास रहने का अनुमान है।
डेटा की परछाईं में ग्रोथ
GDP सीरीज के रिवीजन से जुड़ी अनिश्चितता ही इस समय सबसे बड़ा जोखिम है। पिछले अनुभवों के अनुसार, बेस ईयर बदलने से ग्रोथ रेट्स में बड़े अपवर्ड या डाउनवर्ड रिवीजन हो सकते हैं। इससे पिछले सालों की इकोनॉमिक परफॉरमेंस की तस्वीर भी बदल सकती है। यह मैक्रोइकोनॉमिक रेश्योज़ को भी प्रभावित कर सकता है, जिससे फिस्कल असेसमेंट और इंटरनेशनल तुलनाएं अलग दिख सकती हैं। RBI ने भी माना है कि CPI बेस ईयर अपडेट के बाद इन्फ्लेशन टारगेटिंग रेंज के रिवीजन पर विचार हो रहा है। यह दिखाता है कि ये बदलाव कितने दूरगामी हो सकते हैं। एक आशंका यह भी है कि 7.2% (ICRA) से 8.1% (SBI Research) तक के GDP ग्रोथ अनुमानों में दिख रहा अंतर, नए सीरीज आने के बाद और बढ़ सकता है।
आगे का रास्ता: डेटा पर फोकस
आने वाला GDP डेटा रिवीजन भारत की इकोनॉमिक परफॉरमेंस को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित होगा। भले ही मौजूदा इंडिकेटर्स मजबूत डोमेस्टिक ग्रोथ की ओर इशारा कर रहे हैं, नई सीरीज जारी होने के बाद इकोनॉमिक ट्रेंड्स का गहन विश्लेषण और संभवतः पुनर्मूल्यांकन होगा। इन्वेस्टर्स और पॉलिसी मेकर्स इस पर बारीकी से नजर रखेंगे कि यह नए आंकड़े भारत की ग्रोथ, फिस्कल हेल्थ और ग्लोबल इकोनॉमिक पोजीशन पर क्या असर डालते हैं।