'विकसित भारत' का रास्ता महिलाओं के बिना अधूरा!
भारत का 'विकसित भारत' 2047 का बड़ा सपना और लगातार 8% से 10% की GDP ग्रोथ का लक्ष्य, तभी पूरा हो सकता है जब देश की आधी आबादी, यानी महिलाएं, कामकाजी बल (workforce) में बड़े पैमाने पर शामिल हों। एक नई रिपोर्ट बताती है कि महिला श्रमिकों की भागीदारी दर (FLFPR) बढ़ाना सिर्फ़ सामाजिक मुद्दा नहीं, बल्कि देश की आर्थिक तरक्की की चाबी है।
GDP ग्रोथ की बड़ी छलांग!
इस आंकड़े का महत्व समझिए: अगर भारत में महिला श्रमिकों की भागीदारी दर 10% भी बढ़ाई जाए, तो देश की GDP में 16% का उछाल आ सकता है। वहीं, अगर लैंगिक अंतर को पूरी तरह पाटा जाए, तो GDP 27% तक बढ़ सकती है! फिलहाल, 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, पुरुषों की भागीदारी दर जहाँ 77.1% है, वहीं महिलाएं सिर्फ़ 32.8% पर हैं। ये कम भागीदारी देश के आर्थिक विकास को धीमा कर रही है।
बाधाएं जो रोक रही हैं महिलाओं को
आखिर ऐसा क्यों है? कई गहरी जड़ें जमा चुकी सामाजिक और संरचनात्मक रुकावटें महिलाओं को काम पर जाने से रोकती हैं। सुरक्षा और आने-जाने की चिंताएं सबसे ऊपर हैं, जिनके लिए सार्वजनिक परिवहन और जगहों पर बेहतर इंतजामों की ज़रूरत है। घर और बच्चों की देखभाल का सारा बोझ अक्सर महिलाओं पर ही आता है, और सस्ते व अच्छे क्रेच (creche) या डे-केयर सेंटरों की कमी एक बड़ी समस्या है। इसके अलावा, घर के पास नौकरियों का अभाव, काम करने के लचीले माहौल की कमी और समाज की वो सोच जो महिलाओं के काम करने पर सवाल उठाती है, ये सब मिलकर एक बड़ी दीवार खड़ी करते हैं।
नौकरी में वापसी और कम वेतन वाली नौकरियां
नौकरी में लंबा ब्रेक लेने के बाद वापसी करना भी मुश्किल हो जाता है। कंपनियों की पुरानी सोच, स्किल्स (skills) का पीछे रह जाना और उम्र का फैक्टर जैसी दिक्कतें आती हैं। भले ही महिलाओं की शिक्षा का स्तर बढ़ा हो, पर यह हमेशा अच्छी नौकरियों में तब्दील नहीं होता। ज़्यादातर महिलाएं खेती-बाड़ी (जो 60% से ज़्यादा काम है) या कपड़ा उद्योग जैसे कम वेतन वाले, अनौपचारिक (informal) क्षेत्रों में काम करती हैं, जहाँ सुरक्षा और तरक्की के मौके कम होते हैं।
G20 देशों में भारत की स्थिति
चिंता की बात यह है कि भारत की महिला श्रम भागीदारी दर G20 देशों में सबसे कम है। अगर महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के बराबर हो जाए, तो भारत की GDP 60% तक बढ़ सकती है। इस मौके को गंवाना देश के आर्थिक भविष्य के लिए ठीक नहीं।
योजनाओं का असर और चुनौतियां
भले ही सरकार ने महिला विकास के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं, जैसे स्किल डेवलपमेंट (Skill Development) और उद्यमिता (entrepreneurship) को बढ़ावा, पर गहरे सामाजिक और संरचनात्मक मुद्दे अब भी कायम हैं। मातृत्व लाभ (Maternity Benefit) और कार्यस्थल पर उत्पीड़न (POSH Act) से जुड़े कानून, अनजाने में महिलाओं को काम पर रखने की लागत बढ़ा सकते हैं, जिससे नियोक्ताओं (employers) के लिए बाधाएं खड़ी हो सकती हैं।
आगे का रास्ता
इस समस्या से निपटने के लिए एक व्यापक रणनीति की ज़रूरत है। इसमें महिलाओं के लिए ज़्यादा से ज़्यादा नौकरियाँ पैदा करना, खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ महिलाएं ज़्यादा हैं, और लचीले काम के घंटे देना शामिल है। साथ ही, सस्ते डे-केयर सेंटर, बेहतर पब्लिक ट्रांसपोर्ट और सुरक्षित यात्रा के विकल्प भी ज़रूरी हैं। सामाजिक सोच को बदलना और लैंगिक समानता लाना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम होंगे।