भारत के 2,000 ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs), जो देश की GDP में 2% का योगदान देते हैं, एक बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़े हैं। AI के आने से कम-कुशल (low-skill) नौकरियों पर खतरा मंडराने लगा है। हालांकि यह सेक्टर अभी भी अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है, एक्सपर्ट्स का मानना है कि भविष्य में बने रहने के लिए इन सेंटर्स को हाई-एंड AI डेवलपमेंट और गवर्नेंस की ओर बढ़ना होगा।
AI का बढ़ता खतरा: ट्रेडिशनल जॉब्स पर संकट
भारत के ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) देश की अर्थव्यवस्था में एक अहम भूमिका निभाते हैं। दुनिया भर के 2,000 से ज़्यादा GCCs में से लगभग 1,000 भारत में हैं, जो करीब 20 लाख लोगों को रोज़गार देते हैं और राष्ट्रीय GDP में लगभग 2% का योगदान करते हैं।
लेकिन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के तेज़ी से विकसित होने के साथ, इन सेंटर्स के बिज़नेस मॉडल में बड़ा बदलाव आने वाला है। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने चेतावनी दी है कि भारतीय GCCs का 'कॉस्ट-एडवांटेज' यानी कम लागत पर काम करने की क्षमता अब दबाव में है। AI, खासकर बेसिक कोडिंग और डेटा प्रोसेसिंग जैसे कामों में, कम-कुशल (low-skill) नौकरियों को ऑटोमेट (automate) कर सकती है। ऐसे में, जो कंपनियां इन मैनुअल कामों पर ज़्यादा निर्भर हैं, उन्हें अब ज़्यादा कॉम्प्लेक्स और वैल्यू-एडेड सर्विसेज की ओर बढ़ना होगा।
AI डेवलपमेंट और गवर्नेंस की ओर बदलाव
इन चुनौतियों के बावजूद, AI नई ग्रोथ के रास्ते भी खोल रहा है। भारत पहले से ही एंटरप्राइज़ AI वर्क के लिए दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हब बन गया है, जहाँ 1,200 से ज़्यादा सेंटर्स मशीन लर्निंग को अपने ऑपरेशंस में इंटीग्रेट कर रहे हैं। अब AI सिस्टम आर्किटेक्चर, इम्प्लीमेंटेशन (implementation) और एथिक्स (ethics) जैसे स्पेशलाइज्ड रोल्स की मांग बढ़ रही है। AI सिस्टम्स को पूरे लाइफसाइकिल (lifecycle) में ह्यूमन ओवरसाइट (human oversight) की ज़रूरत होती है, इसलिए भारतीय टैलेंट के लिए बेसिक एग्जीक्यूशन (execution) से लेकर स्ट्रैटेजिक गवर्नेंस (strategic governance) और डेवलपमेंट की ओर बढ़ने का बड़ा मौका है।
स्किल्ड टैलेंट की कमी एक बड़ी चुनौती
टेक्नोलॉजी के अलावा, सेक्टर एक और बड़ी समस्या का सामना कर रहा है - ह्यूमन कैपिटल (human capital) यानी कुशल कर्मचारियों की कमी। इंडस्ट्री रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत के सालाना ग्रेजुएट्स (graduates) में से आधे से भी कम को मॉडर्न वर्कप्लेस के लिए तैयार माना जाता है। यह एम्प्लॉयबिलिटी गैप (employability gap) GCCs के मैनेजमेंट के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है, क्योंकि हाई-एंड टेक्निकल फील्ड्स में टैलेंट की कमी इस बदलाव की रफ़्तार को धीमा कर सकती है।
हालांकि, यूनियन बजट (Union Budget) ने टैक्सेशन (taxation) और अप्रूवल्स (approvals) को आसान बनाकर सपोर्ट दिया है, लेकिन अपस्किलिंग (upskilling) की ज़िम्मेदारी एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस (educational institutions) और कॉर्पोरेशन्स (corporations) दोनों पर है। निवेशकों और इंडस्ट्री ऑब्ज़र्वर्स (observers) के लिए, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ये सेंटर्स कितनी तेज़ी से अपने वर्कफ़ोर्स (workforce) को पुराने कामों से हटाकर AI-फोक्स्ड स्पेशलाइज्ड रोल्स में ट्रांज़िशन (transition) कर पाते हैं, क्योंकि लॉन्ग-टर्म सस्टेनेबिलिटी (long-term sustainability) इसी पर निर्भर करेगी।
