भारत के ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCC) अब एक मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने चेतावनी दी है कि बढ़ती ऑपरेशनल कॉस्ट और ग्लोबल कॉम्पिटिशन इन सेंटर्स के भविष्य के लिए खतरा बन सकते हैं। ये सेक्टर, जो अभी **$100 बिलियन** का राजस्व जुटाता है, अब सिर्फ लागत घटाने से आगे बढ़कर वैल्यू-एडेड इनोवेशन और AI इंटीग्रेशन पर ध्यान देने की ज़रूरत है।
लागत की मार और बढ़ती चुनौती
भारत के ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCC), जो देश के सर्विस एक्सपोर्ट का अहम हिस्सा बन चुके हैं, अब एक बड़े मोड़ पर खड़े हैं। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने इस बात पर ज़ोर दिया कि हालांकि ये सेंटर्स $100 बिलियन के उद्योग में बदल गए हैं, लेकिन सिर्फ लागत दक्षता (cost efficiency) पर निर्भर रहने का पुराना मॉडल अब दबाव में है। वर्तमान में भारत में 2,000 से ज़्यादा ऐसे सेंटर्स हैं, जो 20 लाख से अधिक प्रोफेशनल्स को रोज़गार देते हैं और देश के GDP में करीब 2% का योगदान करते हैं। लेकिन, भारत में बढ़ती ऑपरेशनल लागत और दूसरी देशों की कोशिशें, जो इसी मॉडल को अपनाने की फिराक में हैं, इस विकास की खिड़की को तेज़ी से बंद कर रही हैं।
कॉस्ट कटिंग से आगे बढ़ना होगा
यह चिंता की बात है कि भारत का कॉम्पिटिटिव एडवांटेज कोई स्थायी चीज़ नहीं है। जैसे-जैसे दूसरे देश ग्लोबल कंपनियों के काम को आकर्षित करने के लिए समान मॉडल अपना रहे हैं, कम लागत पर निर्भर रहना अब टिकाऊ नहीं रहा। नागेश्वरन ने बताया कि कुछ खास हाई-डिमांड स्किल वाले क्षेत्रों में टैलेंट की कमी के कारण वेतन पहले ही बढ़ रहे हैं, जिसका सीधा असर इन सेंटर्स की प्रॉफिटेबिलिटी पर पड़ रहा है। निवेशकों के लिए, इसका मतलब है कि इन सेंटर्स को चलाने वाली कंपनियों को सिर्फ काम करने के बजाय वैल्यू क्रिएशन, जैसे कि जटिल इंजीनियरिंग, रिसर्च और इनोवेशन, पर ज़्यादा ध्यान देना होगा।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का असर
इन सेंटर्स के भविष्य के लिए एक बड़ा सवाल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उदय है। जहां एक तरफ ऑटोमेशन से नौकरियों के जाने का डर है, वहीं सरकार का मानना है कि AI का इस्तेमाल इंसानी क्षमताओं को बढ़ाने के लिए किया जाना चाहिए। AI मॉडल्स को लागू करने और मैनेज करने से जुड़े जटिल काम फिलहाल भारतीय GCCs के लिए विकास का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं, जो देश को एंटरप्राइज AI टैलेंट का एक बड़ा ग्लोबल हब बनाते हैं। इस बदलाव की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह इंडस्ट्री अपने वर्कफोर्स और इंफ्रास्ट्रक्चर को कितनी जल्दी विकसित कर पाती है।
रेगुलेटरी और इंडस्ट्री का सहयोग
इस विकास को सपोर्ट करने के लिए, यूनियन बजट 2026-27 में टैक्स निश्चितता (tax certainty) प्रदान करने और ट्रांसफर-प्राइसिंग नियमों को सरल बनाने जैसे बदलाव किए गए हैं, जो मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए बहुत ज़रूरी हैं। हालांकि, सरकार ने यह भी संकेत दिया है कि पॉलिसी सपोर्ट सिर्फ एक हिस्सा है। भविष्य के विकास के लिए एक ज़्यादा इंटीग्रेटेड अप्रोच की ज़रूरत होगी, जिसमें यूनिवर्सिटीज़ और प्राइवेट सेक्टर के बीच पार्टनरशिप शामिल हो, ताकि टैलेंट पूल हाई-वैल्यू काम के लिए तैयार हो सके। निवेशकों को इन कंपनियों पर नज़र रखनी चाहिए कि वे सर्विस एग्जीक्यूशन हब से इनोवेशन सेंटर्स बनने की ओर कितनी प्रभावी ढंग से बढ़ती हैं, क्योंकि यह बदलाव उनके लॉन्ग-टर्म मार्जिन और बढ़ती कॉम्पिटिटिव मार्केट में ग्लोबल क्लाइंट्स को बनाए रखने की क्षमता तय करेगा।
