सरकारी खजाने पर बढ़ता बोझ और आर्थिक संकट
देश की अर्थव्यवस्था पर इस नीति का असर गहरा रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, हर साल GDP का 0.6% सिर्फ ईंधन की कीमतों को स्थिर रखने में चला जाता है। यह पैसा इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure), शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी ज़रूरी चीज़ों से हट रहा है। अगर सरकार उधार लेकर इसे पूरा करती है, तो पब्लिक डेट (Public Debt) बढ़ता है। चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर (Chief Economic Advisor) वी. अनंतनागेश्वरन (V. Anantha Nageswaran) ने 4.3% के फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) लक्ष्य को लेकर चिंता जताई है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्षों के कारण कच्चे तेल की ऊंची कीमतें इस दबाव को और बढ़ा रही हैं। इससे भारत के ट्रेड गैप (Current Account Deficit) के 2% GDP से ऊपर जाने का खतरा है। भारत अपनी लगभग 85-88% कच्ची तेल की ज़रूरतें आयात (Import) करता है, इसलिए वह कीमतों के झटकों के प्रति बेहद संवेदनशील है।
सबसिडी का अनुचित लाभ और कॉम्पेटिटिवनेस पर असर
यह सबसिडी का सिस्टम भी ठीक नहीं है। पेट्रोल सबसिडी का सबसे ज़्यादा फायदा ज़्यादा आय वाले परिवारों को मिल रहा है, जो कीमत बढ़ने पर भी इसे आसानी से झेल सकते हैं। इसका मतलब है कि सरकारी पैसा ज़्यादातर उन लोगों पर खर्च हो रहा है जिन्हें इसकी सबसे कम ज़रूरत है। इसके अलावा, ऊंची ग्लोबल कीमतों पर आयात लागत बढ़ने से ट्रेड गैप और भारतीय रुपए (Indian Rupee) पर दबाव बढ़ता है। इससे सभी आयातित चीज़ें महंगी हो जाती हैं और महंगाई बढ़ सकती है। उद्योगों के लिए बिजली की ऊंची दरें, जो लगभग 95 डॉलर प्रति मेगावाट-घंटा हैं, भी भारत की कॉम्पेटिटिवनेस (Competitiveness) को दूसरे देशों के मुकाबले कमज़ोर कर रही हैं।
एनर्जी सिक्योरिटी (Energy Security) पर बढ़ता खतरा
ईंधन की कीमतें कम रखने का यह रवैया भारत के क्लीन एनर्जी (Clean Energy) को बढ़ावा देने के लक्ष्यों से भी टकराता है। इंपोर्टेड जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे मुख्य शिपिंग मार्गों में संभावित बाधाओं के साथ, ऊर्जा आपूर्ति के लिए बड़ा जोखिम पैदा करती है। भारत से भविष्य में ऊर्जा मांग में बड़ी बढ़ोतरी की उम्मीद है, ऐसे में आयात पर निर्भरता कम करना महत्वपूर्ण है। हालांकि भारत 2030 तक 500 GW रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) क्षमता बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है, फिर भी थर्मल पावर अभी भी उसकी कुल क्षमता का लगभग आधा है, जो जीवाश्म ईंधनों पर निरंतर निर्भरता दिखाता है।
लंबी अवधि की व्यवहार्यता पर सवाल
भारत की मौजूदा ईंधन मूल्य निर्धारण रणनीति की लंबी अवधि की व्यवहार्यता (Viability) पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं, खासकर अगर ग्लोबल तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं। ग्लोबल प्राइस शॉक (Price Shock) को उपभोक्ताओं तक पहुंचने से रोकने का मतलब पब्लिक डेट में भारी वृद्धि हो सकती है, जिससे बाद में कठिन नीतिगत बदलाव करने पड़ेंगे। उदाहरण के लिए, बाज़ार में उतार-चढ़ाव के बावजूद पिछले 60 दिनों से अधिक समय से रिटेल पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ है, जिसने एक बड़ा वित्तीय बोझ खड़ा कर दिया है। चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर ने चेतावनी दी है कि अगर मानसून खराब रहा और ऊर्जा लागत बढ़ती रही तो महंगाई में अचानक तेज़ी आ सकती है, जिससे आम लोगों के बजट पर असर पड़ेगा। LPG की सीमित उपलब्धता जैसी समस्याएं पहले ही शहरी गरीबों को प्रभावित कर चुकी हैं और संबंधित उद्योगों में रोज़गार का नुकसान हुआ है। भारत की इंपोर्टेड कच्चे तेल पर निर्भरता हाल के वर्षों में लगभग 88% पर बनी हुई है, और LPG का लगभग 70% आयात किया जाता है, जो ज़्यादातर खाड़ी देशों से होता है। कुल मिलाकर, आयात भारत की प्राथमिक ऊर्जा ज़रूरतों का लगभग 40% हिस्सा पूरा करते हैं, और यह आंकड़ा बढ़ने की उम्मीद है।
आगे का रास्ता: सुधार और बदलाव
विशेषज्ञों का सुझाव है कि घरेलू ईंधन की कीमतों को अंतरराष्ट्रीय कीमतों से प्रभावित होने दिया जाए, साथ ही ज़रूरतमंद परिवारों, खासकर LPG उपभोक्ताओं को सीधे सहायता दी जाए। यह दृष्टिकोण वित्तीय जोखिमों को कम करने के साथ-साथ सामाजिक सुरक्षा जाल बनाए रखने का लक्ष्य रखता है। इसमें तेल आयात पर निर्भरता कम करने, रणनीतिक तेल भंडार बढ़ाने और आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाने के लिए संरचनात्मक बदलावों (Structural Reforms) को तेज़ करने की भी मांग की गई है। इस साल 4.3% के फिस्कल डेफिसिट लक्ष्य को हासिल करने में चुनौतियां हैं, जिसके लिए लचीली नीति-निर्माण की आवश्यकता होगी। 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन (Net-Zero Emissions) के अपने लक्ष्य और 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता के लक्ष्य को हासिल करने के लिए, सामर्थ्य (Affordability) और दीर्घकालिक ऊर्जा स्थिरता (Energy Sustainability) तथा स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना महत्वपूर्ण है।
