तेल की कीमतों पर भारत का 'ब्रेक': क्या है असली कीमत?
पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें $70 प्रति बैरल से बढ़कर हाल ही में $120 के पार चली गई हैं। दुनिया के कई देश जहां इस महंगाई की मार झेल रहे हैं, वहीं भारत सरकार ने एक साहसिक कदम उठाते हुए घरेलू पेट्रोल और डीजल की कीमतों को नहीं बढ़ाया है। यह नीति, जो आम नागरिकों को तत्काल राहत दे रही है, देश की वित्तीय सेहत पर भारी पड़ रही है।
सरकारी कंपनियों पर अरबों का बोझ
भारत की सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs) जैसे इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम इस वक्त भारी नुकसान झेल रही हैं। रिपोर्टों के अनुसार, वे हर महीने करीब ₹30,000 करोड़ का नुकसान उठा रही हैं। यह 'अंडर-रिकवरी' (under-recovery) तब हो रही है जब कीमतें लंबे समय से स्थिर हैं, जबकि वैश्विक कच्चा तेल महंगा हो गया है। अकेले अप्रैल 2026 में, दैनिक नुकसान ₹700-1,000 करोड़ तक पहुंच गया था। इन कंपनियों की बैलेंस शीट और भविष्य की निवेश योजनाओं पर इसका साफ असर दिख रहा है। सरकार ने एक्साइज ड्यूटी में कटौती करके भी इस बोझ को कम करने की कोशिश की है, लेकिन इससे सरकार को ही लगभग ₹1.7 लाख करोड़ के राजस्व घाटे का सामना करना पड़ सकता है।
अर्थव्यवस्था पर गहराता संकट: रुपया हुआ कमजोर
जहां एक ओर यह नीति जनता को खुश कर रही है, वहीं लंबी अवधि में यह कई आर्थिक जोखिम पैदा कर सकती है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 90% कच्चा तेल आयात करता है, जिससे वह वैश्विक मूल्य झटकों के प्रति बेहद संवेदनशील है। विश्लेषकों का अनुमान है कि अगर क्रूड ऑयल की कीमतें $82-87 प्रति बैरल के आसपास बनी रहती हैं, तो फाइनेंशियल ईयर 2027 में भारत का चालू खाता घाटा (CAD) बढ़कर जीडीपी का 2.0% हो सकता है, जो बेस केस 1.5% से अधिक है। इतिहास गवाह है कि तेल की कीमतों में बड़ा झटका सीधे भारत के बाहरी संतुलन पर पड़ा है; 2008 में तेल के चरम पर CAD जीडीपी का 11% तक पहुंच गया था। इसके अलावा, तेल के बढ़ते आयात बिल लगातार भारतीय रुपये पर दबाव डाल रहे हैं। हाल ही में रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर 95.33 पर आ गया था, जो पिछले साल में 12.07% की गिरावट है। इस कमजोरी से आयात और महंगा होता है, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा है।
'छिपी हुई सब्सिडी' और भविष्य की राह
लगातार सरकारी हस्तक्षेप और रिफाइनरियों पर पड़ रहा दबाव एक तरह की 'छिपी हुई सब्सिडी' है जो बाजार के संकेतों को बिगाड़ रही है। अमेरिका जैसे ऊर्जा-स्वतंत्र देशों के विपरीत, जहां घरेलू उत्पादन उपभोक्ताओं को बचाता है, भारत की आयात पर निर्भरता उसे कमजोर बनाती है। रेटिंग एजेंसी मूडीज (Moody's) का कहना है कि भारत मुश्किलों को झेलने में अन्य उभरते बाजारों की तुलना में अधिक सक्षम है, लेकिन उसके अपने उच्च ऋण स्तर और कमजोर राजकोषीय संतुलन चिंता का विषय हैं। यह भी सच है कि ऐसी सब्सिडी अक्सर गरीबों की बजाय अमीर परिवारों को अधिक फायदा पहुंचाती है। वर्तमान नीति पश्चिम एशिया संघर्ष के जल्द समाधान पर टिकी है, जो एक जुआ है और अगर तनाव बना रहा तो यह और गहरी आर्थिक समस्याएं पैदा कर सकता है। भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा के लिए घरेलू उत्पादन (तेल, गैस, रिन्यूएबल एनर्जी) को बढ़ाना और ऊर्जा टोकरी में विविधता लाना महत्वपूर्ण कदम हैं।
