ग्लोबल मार्केट में बढ़ती अनिश्चितता और रुपये पर बढ़ते दबाव के बीच, भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) ने पिछले हफ्ते की रिकॉर्ड ऊंचाई से गोता लगाया है। 20 फरवरी, 2026 को समाप्त सप्ताह में, ये भंडार $2.119 बिलियन की गिरावट के साथ $723.608 बिलियन पर आ गए, जबकि पिछले हफ्ते ये $725.727 बिलियन के ऑल-टाइम हाई पर पहुंचे थे।
भंडार घटने की वजह: RBI का 'हस्तक्षेप'
जानकार सूत्रों का मानना है कि इस गिरावट की मुख्य वजह भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का फॉरेन करेंसी एसेट्स (Foreign Currency Assets) में किया गया हस्तक्षेप है। माना जा रहा है कि रुपये की कमजोरी को थामने के लिए RBI ने डॉलर बेचे हैं। 20 फरवरी, 2026 को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 0.34% कमजोर होकर 90.99 के स्तर पर कारोबार कर रहा था। ट्रेडर्स का कहना है कि RBI ने 91 के साइकोलॉजिकल लेवल को बचाने के लिए डॉलर की बिकवाली की।
क्या घटी है मजबूती?
विदेशी मुद्रा भंडार में कमी मुख्य रूप से विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों (Foreign Currency Assets) में $1.039 बिलियन की गिरावट और सोने के भंडार (Gold Reserves) में $977 मिलियन की कमी के कारण आई है। स्पेशल ड्राइंग राइट्स (SDRs) और IMF के साथ भारत की स्थिति में भी मामूली कमी देखी गई। यह गिरावट ऐसे समय में आई है जब मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tensions) बढ़ा हुआ है, जिसने कच्चे तेल की कीमतों को ऊपर धकेला है और ग्लोबल रिस्क को बढ़ाया है। साथ ही, अमेरिका में ब्याज दरों के ऊंचे बने रहने की उम्मीदों ने भी रुपये पर दबाव डाला है।
बाजार की चाल और आगे का आउटलुक
यह फॉरेक्स रिजर्व में आई यह गिरावट अहम है, खासकर तब जब हाल ही में रिजर्व ने $700 बिलियन का आंकड़ा पार किया था। पिछले साल के अंत और इस साल की शुरुआत में भी रिजर्व में कई बार गिरावट देखी गई थी, जैसे नवंबर 2025 के आखिरी हफ्ते में $1.877 बिलियन की कमी आई थी।
दूसरे उभरते बाजारों (Emerging Markets) की तरह भारत का रुपया भी डॉलर की मजबूती और ग्लोबल अनिश्चितताओं से प्रभावित हो रहा है। हालांकि, RBI की ओर से रुपये को बचाने के लिए फॉरेक्स रिजर्व का इस्तेमाल एक बड़ी रणनीति है, लेकिन अगर बाहरी दबाव बना रहता है तो इन रिजर्व की स्थिरता पर सवाल उठ सकते हैं।
जोखिम और चुनौतियाँ
फॉरेक्स रिजर्व का लगातार इस्तेमाल RBI की भविष्य में किसी बड़े संकट से निपटने की क्षमता को कम कर सकता है। रुपये की रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट (REER) में नरमी से निर्यात को फायदा हो सकता है, लेकिन आयात महंगा होगा और महंगाई का खतरा बढ़ सकता है। भारत तेल आयात पर काफी निर्भर है, इसलिए ऊर्जा की बढ़ती कीमतें रुपये पर और दबाव डाल सकती हैं। इसके अलावा, भारतीय शेयर बाजारों में गिरावट और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) की बिकवाली भी पूंजी प्रवाह (Capital Outflows) को लेकर चिंताएं बढ़ा सकती है।
कुल मिलाकर, 2026 में ग्लोबल इकोनॉमिक ग्रोथ 2.7% से 3.1% के बीच रहने की उम्मीद है। महंगाई में नरमी की संभावना है, लेकिन क्षेत्रीय अंतर बने रहेंगे। ऐसे में RBI का फॉरेक्स रिजर्व प्रबंधन, रुपये की स्थिरता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाएगा।