कॉमर्स सेक्रेटरी राजेश अग्रवाल ने इस बात पर चिंता जताई है कि भारत की तरफ से साइन किए गए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTAs) का बिजनेस कम्युनिटी द्वारा इस्तेमाल बेहद कम है। उन्होंने बताया कि केवल 25% एक्सपोर्टर्स ही इनগুলোর का फायदा उठा पा रहे हैं, जबकि विकसित देशों में यह दर 70% से 80% तक है और वियतनाम जैसे उभरते देशों में भी 40% से 50% है।
कम उपयोग की वजहें
इसकी मुख्य वजहों में बिजनेसमैन के बीच इनগুলোর के बारे में जागरूकता की कमी, 'रूल्स ऑफ ओरिजिन' (Rules of Origin) के जटिल नियम और काफी ज्यादा कागजी कार्रवाई शामिल हैं। नतीजतन, बड़े बाजार तक पहुंच के अवसर होने के बावजूद, एक्सपोर्ट और वैल्यू-एडेड सेक्टर्स में ग्रोथ की संभावनाओं का पूरी तरह से लाभ नहीं उठाया जा रहा है। ऐतिहासिक तौर पर, 2010 से 2012 के बीच हुए बड़े FTAs के बाद प्रमुख क्षेत्रों में निर्यात में गिरावट देखी गई थी।
नए FTAs की रणनीति
हालांकि, भारत की वर्तमान FTA रणनीति पहले की तुलना में काफी अलग है। नए एग्रीमेंट्स को ऐसे देशों के साथ सोच-समझकर साइन किया जा रहा है जिनकी इकोनॉमी भारत की पूरक हो, बाजार बड़ा हो और जहां से फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) आने की अच्छी संभावना हो। ये समझौते सिर्फ टैरिफ कम करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सर्विसेज, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी और संवेदनशील घरेलू उद्योगों की सुरक्षा जैसे अहम नियमों को भी शामिल करते हैं। इस टारगेटेड अप्रोच का सकारात्मक असर दिख रहा है, क्योंकि FY 2020-21 से FY 2024-25 के बीच स्ट्रैटेजिक FTA पार्टनर्स के साथ मर्चेंडाइज ट्रेड में 92% की ग्रोथ देखी गई है, जो वैश्विक व्यापार वृद्धि 41.5% से काफी ज्यादा है। यह पिछले ASEAN, जापान और दक्षिण कोरिया के साथ हुए FTAs से अलग है, जिनमें ट्रेड डेफिसिट बढ़ा था।
ग्लोबल तुलना और ट्रेड पर असर
वैश्विक स्तर पर देखें तो भारत की FTA उपयोग दर कई देशों से काफी पीछे है। वियतनाम, मेक्सिको और चिली जैसे देश अपने FTAs का ज्यादा सक्रियता से इस्तेमाल करते हैं। वहीं, अमेरिका ने NAFTA जैसे समझौतों से निर्यात और निवेश में अच्छी वृद्धि देखी है। भारत के लिए, खासकर चीन और ASEAN के साथ लगातार बना हुआ ट्रेड डेफिसिट एक बड़ी रुकावट है, जो कुछ समझौतों के कारण और बढ़ गया है। FY24-25 में मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट्स में सिर्फ 0.14% की मामूली बढ़ोतरी हुई, जबकि सर्विसेज एक्सपोर्ट्स 13.6% बढ़े। टैरिफ कटने के बावजूद, भारत का औसत अप्लाइड टैरिफ कुछ पार्टनर्स की तुलना में अभी भी ज्यादा है।
स्ट्रक्चरल दिक्कतें और खतरे
भारत की FTA रणनीति के सामने सबसे बड़ा जोखिम यह है कि डोमेस्टिक बिजनेस इनগুলোর का प्रभावी ढंग से उपयोग करने में विफल हो रहे हैं। साथ ही, पार्टनर देशों में नॉन-टैरिफ बैरियर्स (NTBs) जैसे क्वालिटी और पर्यावरण मानक (जैसे EU का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म) भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं। 'रूल्स ऑफ ओरिजिन' के दुरुपयोग की चिंताएं भी हैं, जिससे चीन जैसे देशों का माल FTA पार्टनर्स के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से भारत में आ सकता है। कृषि जैसे पारंपरिक क्षेत्र आयात प्रतिस्पर्धा के प्रति ज्यादा संवेदनशील हैं। यही चिंताएं पहले भारत को RCEP जैसे बड़े ट्रेड ब्लॉक से बाहर निकलने पर मजबूर कर चुकी हैं। उपयोग की यह स्ट्रक्चरल कमजोरी और आयात के प्रति संवेदनशीलता, साथ में बढ़ता ट्रेड डेफिसिट, इनগুলোর से अपेक्षित आर्थिक फायदों के लिए एक बड़ा जोखिम पेश करता है।
सरकारी कदम और आगे की राह
सरकार यह जानती है कि सिर्फ FTAs साइन कर देना काफी नहीं है। इसलिए, इंडस्ट्रियल पॉलिसी को ट्रेड लक्ष्यों के साथ जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं, जैसे कि प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीमें जो डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग और FDI को बढ़ावा देने के लिए हैं। आगे का रास्ता दो-तरफा रणनीति की मांग करता है: एक तरफ पूरक अर्थव्यवस्थाओं के साथ रणनीतिक बातचीत जारी रखना और दूसरी तरफ, व्यवसायों के बीच जागरूकता बढ़ाना, अनुपालन (compliance) को सरल बनाना और नॉन-टैरिफ बैरियर्स को दूर करना। जब तक बिजनेस की भागीदारी नहीं बढ़ती और स्ट्रक्चरल बाधाएं दूर नहीं होतीं, तब तक भारत के नए FTA ढांचे की पूरी आर्थिक क्षमता शायद ही हासिल हो पाएगी।
