कैपिटल फ्लाइट का बढ़ता संकट: एफडीआई (FDI) पर भारी दबाव
दिसंबर 2025 में एफडीआई (FDI) के ग्रॉस इनफ्लो (Gross Inflows) में मजबूती के बावजूद, नेट आउटफ्लो (Net Outflows) ने भारत के कैपिटल अकाउंट (Capital Account) पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विदेशी निवेशकों की रिकॉर्ड फंड निकासी और भारतीय कंपनियों के तेजी से बढ़ते विदेश निवेश ने मिलकर राष्ट्रीय करेंसी पर ज़बरदस्त दबाव बनाया है और घरेलू अर्थव्यवस्था में विदेशी पूंजी के वास्तविक जुड़ाव को छिपाया है।
रिकॉर्ड फंड निकासी ने बढ़ाई चिंता
दिसंबर 2025 में विदेशी निवेशकों ने $7.45 अरब की रिकॉर्ड फंड निकासी की, जो पिछले दौर के मुकाबले लगभग 40% ज़्यादा थी। यह अब तक की सबसे बड़ी निकासी है। इस आक्रामक विनिवेश (Disinvestment) और विदेशी कंपनियों द्वारा अपने शेयर होल्डिंग को कम करने की वजह से नेट एफडीआई (FDI) में कमी आई। फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के पहले नौ महीनों में, कुल निकासी $44.45 अरब तक पहुंच गई, जो पिछले साल की तुलना में 10% अधिक है। यह बढ़त जारी है, जबकि फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में नेट एफडीआई (FDI) इनफ्लो सिर्फ $0.96 अरब रहा, जो FY24 के $10.9 अरब और FY21 के $43.9 अरब के मुकाबले काफी कम है।
भारतीय कंपनियां बढ़ा रहीं विदेशी बाज़ार में पैठ
साथ ही, भारतीय कंपनियों ने भी अपना विदेशी एफडीआई (FDI) काफी तेज़ी से बढ़ाया है। दिसंबर में, इन निवेशों में नवंबर की तुलना में 78% की उछाल आई और यह $2.75 अरब पर पहुंच गया। फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के पहले नौ महीनों में, विदेशों में कुल निवेश $24.88 अरब रहा, जो पिछले साल की तुलना में 35% ज़्यादा है। सिंगापुर, अमेरिका और यूएई प्रमुख डेस्टिनेशन रहे। बाजार विविधीकरण (Market Diversification) और संसाधन अधिग्रहण (Resource Acquisition) से प्रेरित यह आउटवर्ड इन्वेस्टमेंट (Outward Investment), इनबाउंड एफडीआई (Inbound FDI) को सीधे तौर पर ऑफसेट कर रहा है, जिससे नेट एफडीआई (FDI) का नकारात्मक बैलेंस बढ़ रहा है। इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 में कहा गया है कि ये आउटफ्लोज़ (Outflows) घरेलू आकर्षण की कमी के बजाय भारतीय उद्यमों के बढ़ते अंतर्राष्ट्रीयकरण (Internationalization) को दर्शाते हैं।
रुपए पर भारी दबाव
रिकॉर्ड निकासी और भारतीय कंपनियों के विदेश निवेश के संयुक्त प्रभाव ने फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के लिए नेट एफडीआई (FDI) इनफ्लो को $4 अरब से भी कम कर दिया है, जबकि ग्रॉस इनफ्लो 16% बढ़कर $73.31 अरब हो गया था। नेट एफडीआई (FDI) की यह लगातार कमजोरी रुपए के तेज़ी से गिरते मूल्य का एक बड़ा कारण बनी है, जिसने रुपए को ₹90 और ₹91 के पार पहुंचा दिया है, जो कई सालों का निचला स्तर है। फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) की बिकवाली, जिन्होंने 2025 में लगभग $19 अरब के भारतीय शेयर बेचे, ने भी इस स्थिति को और खराब किया है। अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ (Tariffs) भी चिंता का विषय हैं, जिनसे भारत के 70% तक निर्यात प्रभावित हो सकते हैं, जिससे करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) बढ़ने और रुपए पर दबाव बढ़ने की आशंका है। फरवरी 2026 में हुए एक अंतरिम व्यापार समझौते (Interim Trade Agreement) से कुछ स्थिरता आई है, लेकिन कैपिटल फ्लोज़ (Capital Flows) पर मूल दबाव बना हुआ है।
चिंताजनक तस्वीर: 'कैपिटल फ्लाइट' का बढ़ता संकेत
नेट एफडीआई (FDI) आउटफ्लो की ओर यह संरचनात्मक बदलाव (Structural Shift) चिंता का विषय है। भारतीय कंपनियों द्वारा बढ़ते आउटवर्ड एफडीआई (Outward FDI) की ओर झुकाव, भले ही यह उनकी वैश्विक महत्वाकांक्षाओं को दर्शाता हो, घरेलू विकास के लिए उपलब्ध पूंजी को सीधे तौर पर घटाता है और करेंसी की कमजोरी को बढ़ाता है। विदेशी निवेशकों की फंड निकासी, जो वैश्विक ब्याज दरों में बढ़ोतरी (Global Interest Rate Hikes) और बेहतर बाज़ारों की तलाश से बढ़ी है, एक संभावित भेद्यता (Vulnerability) को उजागर करती है। भारत का हालिया प्रदर्शन वैश्विक रुझानों के विपरीत है, जहाँ 2024 और 2025 की शुरुआत में एफडीआई (FDI) में गिरावट देखी गई। लेकिन भारत का 'नेट' परिदृश्य एक चिंताजनक कैपिटल फ्लाइट (Capital Flight) दिखा रहा है जो दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता (Long-term Economic Resilience) को सीमित कर सकता है। रुपए पर लगातार दबाव आयात लागत (Import Costs) को भी बढ़ाता है, जो महंगाई को भड़का सकता है और सख्त मौद्रिक नीति (Tighter Monetary Policy) को मजबूर कर सकता है, जिससे घरेलू निवेश पर असर पड़ सकता है। निर्यात नुकसान (Export Losses) के कारण GDP के 1.5% तक बढ़ सकने वाले करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) को विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) की मदद से संभाला जा रहा है, लेकिन लगातार कैपिटल आउटफ्लोज़ (Capital Outflows) इस बफर (Buffer) को चुनौती दे सकते हैं।
आगे का रास्ता
इन मुश्किलों के बावजूद, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की जनवरी 2026 की 'स्टेट ऑफ द इकॉनमी' रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रॉस एफडीआई (FDI) इनफ्लो 2024-25 में दर्ज $80.62 अरब को पार करने की राह पर है। हालाँकि, असली ध्यान नेट आंकड़ों पर होना चाहिए। अमेरिका के साथ अंतरिम व्यापार समझौता टैरिफ (Tariffs) से उत्पन्न नकारात्मक सेंटीमेंट (Negative Sentiment) को कम करने में मदद करेगा, और फरवरी की शुरुआत में विदेशी निवेशकों ने लगभग $2 अरब के भारतीय शेयर खरीदे। फिर भी, स्थिर और दीर्घकालिक एफडीआई (FDI) को आकर्षित करने और बनाए रखने के लिए संरचनात्मक बाधाओं (Structural Impediments) को दूर करना होगा और नीतिगत निश्चितता (Policy Certainty) का प्रदर्शन करना होगा, ताकि दूसरे उभरते बाज़ारों (Emerging Markets) का आकर्षण और वैश्विक पूंजी पुन: आवंटन (Global Capital Reallocation) का मुकाबला किया जा सके।