एक्सटर्नल सेक्टर पर बढ़ा दबाव
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अपनी ताजा मई बुलेटिन में पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी को भारत के एक्सटर्नल सेक्टर के लिए बड़ा खतरा बताया है। इन टेंशन की वजह से ग्लोबल कमोडिटी मार्केट्स, ट्रेड रूट्स और वित्तीय प्रणालियों पर असर पड़ रहा है, जिससे भारत की इकोनॉमिक स्टेबिलिटी को चुनौती मिल रही है। इस अस्थिरता का असर सप्लाई चेन्स पर तो पड़ ही रहा है, साथ ही ग्लोबल फाइनेंशियल मार्केट्स में भी अनिश्चितता बढ़ गई है।
मुश्किलों के बीच घरेलू मजबूती
इन बाहरी दबावों के बावजूद, भारत की डोमेस्टिक इकोनॉमी लगातार मजबूत बनी हुई है। अप्रैल में इंडस्ट्रियल और सर्विसेज दोनों सेक्टर्स ने अपनी रफ्तार कायम रखी। एग्रीकल्चर सेक्टर में भी अच्छी खबर है, क्योंकि प्री-मानसून बारिश और जलाशयों में पर्याप्त पानी के चलते खरीफ की बुवाई अच्छी चल रही है। यह डोमेस्टिक मजबूती ग्लोबल इकोनॉमिक अनिश्चितताओं के खिलाफ एक बड़ा सहारा है। खासकर सर्विसेज सेक्टर, भारत के ट्रेड के लिए एक मजबूत पिलर साबित हुआ है, जिसके एक्सपोर्ट्स रिकॉर्ड लेवल पर पहुंच गए हैं। फाइनेंशियल ईयर 26 में, सर्विसेज एक्सपोर्ट्स $421.3 बिलियन तक पहुंच गए, जो भारत के कुल एक्सपोर्ट्स $863.1 बिलियन में एक बड़ा योगदान रहा।
महंगाई की चिंता बढ़ी
अप्रैल में कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) इन्फ्लेशन बढ़कर 3.5% हो गया, जिसका मुख्य कारण फूड प्राइसेज में आई तेजी है। कोर इन्फ्लेशन भले ही स्थिर रहा हो, लेकिन RBI ने सप्लाई-साइड के दबावों का डोमेस्टिक प्राइसेज पर पड़ने वाले असर पर नजर रखने की बात कही है। पश्चिम एशिया संघर्ष से सीधे तौर पर जुड़ी कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें एक बड़ी चिंता का विषय हैं। कच्चे तेल की कीमतों में $10 प्रति बैरल की बढ़ोतरी भारत की GDP ग्रोथ को 44 बेसिस पॉइंट्स तक कम कर सकती है। एनर्जी की ऊंची कीमतें, अगर लंबे समय तक बनी रहीं, तो ट्रांसपोर्टेशन और प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ने की उम्मीद है, जिससे रिटेल इन्फ्लेशन पर दबाव बनेगा। अनुमान है कि चालू तिमाही के अंत तक भारत की इन्फ्लेशन रेट 3.80% तक पहुंच सकती है और फाइनेंशियल ईयर 27 में यह औसतन 4.6% से 5.0% के बीच रह सकती है।
झटकों से निपटने के लिए बफ़र्स
भारत इस ग्लोबल अनिश्चितता के दौर में मैक्रोइकोनॉमिक मजबूती की स्थिति में प्रवेश कर चुका है। सर्विसेज एक्सपोर्ट्स में मजबूती, फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व्स (Foreign Exchange Reserves) की बड़ी मात्रा और प्रोएक्टिव पॉलिसी मेजर्स से इकोनॉमी को बाहरी झटकों से बचाने में मदद मिलने की उम्मीद है। मार्च 2026 तक, भारत का फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व $552.3 बिलियन था। फरवरी के $573.1 बिलियन से थोड़ी गिरावट के बावजूद, यह अभी भी काफी मजबूत है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, 8 मई 2026 को समाप्त सप्ताह में फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व बढ़कर $696.99 बिलियन हो गया, जिसका मुख्य कारण गोल्ड होल्डिंग्स में आई बढ़ोतरी है। हालांकि, RBI द्वारा करेंसी डेप्रिसिएशन को मैनेज करने के लिए किए गए हालिया इंटरवेंशन से डॉलर्स की नेट सेल हुई है, और रुपया 95.69 के आसपास ट्रेड कर रहा है। रेमिटेंस (Remittances) में देश की मजबूत स्थिति, जो फाइनेंशियल ईयर 25 में $135.4 बिलियन तक पहुंची, बाहरी खाते की स्थिरता के लिए एक महत्वपूर्ण सपोर्ट प्रदान करती है।
इम्पोर्ट पर निर्भरता की स्ट्रक्चरल कमजोरी
भारत के लिए एक बड़ी कमजोरी कच्चे तेल के इम्पोर्ट पर भारी निर्भरता बनी हुई है। देश अपनी लगभग 88% कच्चे तेल की जरूरतें इम्पोर्ट करता है, जिसमें से लगभग 46% पश्चिम एशियाई देशों से आता है। हॉरमुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण शिपिंग रूट्स में किसी भी तरह के व्यवधान से, जिससे भारत के कच्चे तेल और LPG इम्पोर्ट का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है, एक गंभीर सप्लाई की समस्या खड़ी हो सकती है। यह निर्भरता न केवल भारत को प्राइस वोलेटिलिटी के प्रति संवेदनशील बनाती है, बल्कि इसके ट्रेड बैलेंस को भी प्रभावित करती है। कच्चे तेल की कीमतों में हर $10 प्रति बैरल की बढ़ोतरी से सालाना ऑयल इम्पोर्ट बिल $13-14 बिलियन बढ़ जाता है। इस संघर्ष ने ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) को भी बढ़ाया है, जो अप्रैल 2026 में $7.81 बिलियन था।
