क्यों घटा भारत का बाहरी कर्ज़?
भारतीय निवासियों ने विदेश में अपनी वित्तीय संपत्तियों (Financial Assets) को $12.8 अरब तक बढ़ा दिया। यह वृद्धि, भारत में विदेशी होल्डिंग्स में हुए $1.9 अरब के इजाफे से कहीं ज़्यादा थी। विस्तार से देखें तो, विदेश में डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (Direct Investment) के ज़रिए $7.6 अरब और करेंसी व डिपॉजिट (Currency & Deposits) में $9.4 अरब का निवेश किया गया। इन सब का नतीजा यह हुआ कि देश की अंतरराष्ट्रीय एसेट-टू-लायबिलिटी रेशियो (International Assets-to-Liabilities Ratio) पिछले तिमाही के 81.4% और पिछले साल के 74.6% से बढ़कर 82.1% पर पहुंच गई है। हालांकि, इस तिमाही के दौरान रिज़र्व एसेट्स (Reserve Assets), जो कुल विदेशी होल्डिंग्स का 57.4% हैं, $12.4 अरब घटे, लेकिन साल-दर-साल आधार पर 8.2% की बढ़ोतरी भी दर्ज की गई है।
कर्ज़ का बढ़ता बोझ, एक बड़ी चिंता
इस बीच, भारत की कुल बाहरी देनदारियों (External Liabilities) में कर्ज़ (Debt) का हिस्सा लगातार बढ़ रहा है। कुल बाहरी देनदारियों में कर्ज़-आधारित देनदारियों (Debt Liabilities) का शेयर पिछले तिमाही के 54.8% से बढ़कर 55.3% हो गया है। यह एक महत्वपूर्ण चिंता का विषय है, क्योंकि सितंबर 2025 तक भारत का कुल बाहरी कर्ज़ (Total External Debt) $746.0 अरब तक पहुंच चुका है, और 2023 में इस कर्ज़ पर ब्याज का भुगतान भी काफी बढ़ा है।
ग्लोबल खतरे और भारत की फाइनेंसियल पोजीशन
एसेट-लायबिलिटी रेशियो में सुधार के बावजूद, भारत की बाहरी फाइनेंसियल पोजीशन (Financial Position) ग्लोबल इकोनॉमिक (Global Economic) चुनौतियों का सामना कर रही है। इंटरनेशनल मोनेटरी फंड (IMF) का मानना है कि भारत की स्थिति फंडामेंटल्स (Fundamentals) से कुछ बेहतर दिख रही है, पर वैश्विक स्तर पर डिमांड में कमी, आर्थिक विभाजन, अस्थिर वित्तीय हालात और कमोडिटी की कीमतों में उतार-चढ़ाव जैसे खतरे मंडरा रहे हैं। भारत का बाहरी कर्ज़ जीडीपी (GDP) के 19.2% पर है।
वैश्विक ब्याज दरों में बदलाव, खासकर यूएस फेडरल रिजर्व (US Federal Reserve) की नीतियों से भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट्स (Emerging Markets) से कैपिटल आउटफ्लो (Capital Outflow) बढ़ सकता है, जिससे रुपए पर दबाव और घरेलू वित्तीय हालात टाइट हो सकते हैं। मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष जैसे भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tensions) भी ऊर्जा की कीमतों और व्यापार मार्गों को प्रभावित कर रहे हैं।
एस एंड पी (S&P) ने अगस्त 2025 में भारत की सॉवरेन रेटिंग (Sovereign Rating) को 'BBB' तक बढ़ाया था, जो मजबूत आर्थिक ग्रोथ और फिस्कल मैनेजमेंट (Fiscal Management) का संकेत है। लेकिन यह अमेरिकी व्यापार तनाव के बीच हुआ, जिसने पहले 2025 के मध्य में एफपीआई (FPI) आउटफ्लो को बढ़ाया था। IMF ने इंपोर्ट पर पाबंदियां कम करने और एफडीआई (FDI) नॉर्म्स को आसान बनाने जैसी सलाह भी दी है।
कैपिटल फ्लो और कर्ज़ को लेकर चिंताएं
भारतीय निवासियों द्वारा विदेश में तेजी से बढ़ाया जा रहा निवेश, एसेट-लायबिलिटी रेशियो को तो बढ़ाता है, लेकिन यह घरेलू निवेश के भरोसे और विदेशी निवेशों के रणनीतिक होने पर सवाल खड़े करता है। बाहरी देनदारियों में कर्ज़ पर बढ़ती निर्भरता एक बड़ी चिंता है। बढ़ते एक्सटर्नल डेट और ब्याज भुगतानों के साथ, यह स्थिति ग्लोबल फाइनेंसिंग कंडीशंस (Global Financing Conditions) के टाइट होने या आर्थिक ग्रोथ कमजोर पड़ने पर फाइनेंशियल फ्रैजिलिटी (Financial Fragility) को बढ़ा सकती है।
भारत की मजबूत जीडीपी ग्रोथ और रिकॉर्ड फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व (Foreign Exchange Reserves) भी ग्लोबल सिस्टमिक शॉक (Global Systemic Shock) और अस्थिर कैपिटल फ्लो से पूरी तरह नहीं बचा सकते। 21.4 के आसपास निफ्टी पीई (Nifty PE) जैसे हाई मार्केट वैल्यूएशन (Market Valuations), भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं और अमेरिकी नीतियों में संभावित बदलावों से बड़े कैपिटल आउटफ्लो और करेंसी डेप्रिसिएशन (Currency Depreciation) का खतरा है।
आर्थिक आउटलुक और वैश्विक चुनौतियाँ
भारत की आर्थिक ग्रोथ मजबूत रहने की उम्मीद है। S&P अगले तीन साल 6.8% और IMF वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 6.5% की ग्रोथ का अनुमान लगा रहा है। हालांकि, इस ग्रोथ को बनाए रखने के लिए ग्लोबल चुनौतियों से निपटना होगा। IMF उच्च ग्रोथ के लिए स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स (Structural Reforms) और बाहरी झटकों को झेलने के लिए मॉनेटरी ट्रांसमिशन (Monetary Transmission) व एक्सचेंज रेट फ्लेक्सिबिलिटी (Exchange Rate Flexibility) को बेहतर बनाने पर जोर देता है।
घरेलू मांग-संचालित ग्रोथ (Demand-Driven Growth) और अंतरराष्ट्रीय कैपिटल पर निर्भरता के बीच संतुलन, भारत की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि वैश्विक व्यापार और वित्तीय बाजार भू-राजनीतिक घटनाओं और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की नीतियों से प्रभावित होते रहेंगे।