भारत का बड़ा वर्कप्लेस झटका: रिकॉर्ड कम बेरोज़गारी, फिर भी कर्मचारी कर रहे हैं 'Quiet Quitting'!

ECONOMY
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AuthorMehul Desai|Published at:
भारत का बड़ा वर्कप्लेस झटका: रिकॉर्ड कम बेरोज़गारी, फिर भी कर्मचारी कर रहे हैं 'Quiet Quitting'!
Overview

Gallup की नई रिपोर्ट 'State of the Global Workplace 2026' ने भारत के वर्कप्लेस कल्चर पर चिंता जताई है। चौंकाने वाली बात यह है कि देश में बेरोज़गारी दर ऐतिहासिक रूप से कम होने के बावजूद, **59.02%** भारतीय कर्मचारी 'Quiet Quitting' कर रहे हैं, यानी वे सिर्फ अपना काम चला रहे हैं और उनसे ज़्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती।

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भारत का एंगेजमेंट विरोधाभास (Engagement Paradox)

भारत एक अजीब सी आर्थिक स्थिति का सामना कर रहा है: जहाँ एक ओर बेरोज़गारी दर 👇 5% (2024 में 4.20% से 2026 की शुरुआत में लगभग 4.90%) के आसपास बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर 59.02% कर्मचारी 'Not Engaged' या 'Quiet Quitters' की श्रेणी में हैं। ये वो लोग हैं जो अपना काम तो करते हैं, लेकिन उनमें कोई खास दिलचस्पी या कमिटमेंट नहीं दिखता। Gallup की रिपोर्ट के अनुसार, साउथ एशिया, खासकर भारत में Employee Engagement में सबसे बड़ी गिरावट देखी गई है।

कर्मचारी क्यों हैं डिसएंगेज्ड: लीडरशिप और स्ट्रेस

इस भारी-भरकम डिसएंगेजमेंट (Disengagement) के पीछे कंपनी के स्ट्रक्चर और मैनेजमेंट की बड़ी खामियां नज़र आती हैं। खास तौर पर, मैनेजर्स के बीच ही Employee Engagement पिछले 2 सालों में 39% से घटकर 30% रह गया है। इसका मतलब है कि मैनेजर्स खुद अपनी टीमों का मनोबल बढ़ाने में नाकाम हो रहे हैं। इसके अलावा, भारतीय कर्मचारी पहले से कहीं ज़्यादा स्ट्रेस (Stress) में हैं। गुस्सा 28% से बढ़कर 34% और उदासी 24% से बढ़कर 39% तक पहुँच गई है। लंबे वर्क ऑवर्स (Work Hours), काम और निजी जीवन के बीच संतुलन की कमी, और जॉब की चिंता से बर्नआउट (Burnout) और मोटिवेशन (Motivation) में कमी आ रही है। इसी वजह से दुनिया भर में कम प्रोडक्टिविटी (Productivity) से सालाना लगभग $10 ट्रिलियन का आर्थिक नुकसान हो रहा है।

कम एंगेजमेंट का आर्थिक प्रभाव

कर्मचारियों की यह कम भागीदारी भारत की आर्थिक ग्रोथ (Economic Growth) के लिए एक बड़ा खतरा है। जिन कंपनियों में कर्मचारी मोटिवेटेड नहीं होते, वे अक्सर कम मुनाफे (Profitable) में रहती हैं, जिससे सीधे तौर पर इकोनॉमिक आउटपुट (Economic Output) कम होता है। भारत में GDP ग्रोथ तो अच्छी रही है, लेकिन यह ग्रोथ ज़्यादातर बिना पर्याप्त नौकरियां पैदा किए हुई है, जिसे 'Jobless Growth' कहा जाता है। यहाँ लेबर प्रोडक्टिविटी (Labor Productivity) एक बड़ा मुद्दा है। ऐसे में, 'Decent Work Deficit' और प्रोडक्टिविटी गेन (Productivity Gain) व जॉब क्रिएशन (Job Creation) के बीच बढ़ती खाई चिंता का विषय है। हालांकि बेसिक लेबर वेलफेयर (Welfare) पर काम हो रहा है, लेकिन आज के वर्कर (Worker) और ज़्यादा की उम्मीद रखते हैं - जैसे कि मीनिंगफुल जॉब्स (Meaningful Jobs), अच्छी सैलरी (Fair Pay) और करियर में आगे बढ़ने के मौके।

समय के साथ एंगेजमेंट के ट्रेंड्स

पिछले 15 सालों में भारत में सक्रिय रूप से डिसएंगेज्ड कर्मचारियों की संख्या 31% (2010-12) से घटकर 18.47% (2023-25) हो गई थी। वहीं, एंगेज्ड (Engaged) कर्मचारियों की संख्या भी बढ़ी थी, जो 2020-22 में 33.17% के शिखर पर पहुँचने के बाद लेटेस्ट सर्वे में 22.51% पर आ गई है। यह हालिया गिरावट दर्शाती है कि मौजूदा वर्कप्लेस कंडीशंस (Workplace Conditions) एंगेजमेंट को खत्म कर रही हैं, और 'Not Engaged' लोगों की संख्या बढ़ रही है।

मुख्य जोखिम और आर्थिक आउटलुक

भारत के मौजूदा लेबर मार्केट (Labor Market) की स्थिति कई गंभीर जोखिम पैदा करती है। कम बेरोज़गारी के साथ उच्च डिसएंगेजमेंट का यह विरोधाभास गहरी संरचनात्मक समस्याओं (Structural Issues) की ओर इशारा करता है। सिर्फ नौकरी की उपलब्धता प्रोडक्टिविटी या प्रॉफिटेबिलिटी (Profitability) सुनिश्चित नहीं करती। मैनेजर्स की एंगेजमेंट में गिरावट एक बड़ी कमजोरी है, क्योंकि एक मोटिवेटेड टीम के लिए अच्छी लीडरशिप (Leadership) बहुत ज़रूरी है। इसके अलावा, कर्मचारियों के बीच गुस्सा और उदासी जैसी नकारात्मक भावनाओं का बढ़ना, अनरेस्ट (Unrest) और फ्रिक्शन (Friction) को बढ़ा सकता है, जो बिजनेस ऑपरेशंस (Business Operations) को प्रभावित करेगा। 'Jobless Growth' और 'Decent Work Deficit' का जारी रहना यह बताता है कि आर्थिक प्रगति हमेशा व्यापक कल्याण (Well-being) या स्थायी प्रोडक्टिविटी की ओर नहीं ले जाती। यह भारत की लॉन्ग-टर्म इकोनॉमिक पोटेंशियल (Economic Potential) और इन्वेस्टर्स (Investors) के लिए आकर्षण को नुकसान पहुँचा सकता है। जबकि कंपटीटर्स (Competitors) हाई-स्किल एरियाज़ (High-Skill Areas) पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, भारतीय कंपनियाँ एक कम मोटिवेटेड वर्कफोर्स (Workforce) के साथ पिछड़ने का जोखिम उठा रही हैं।

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