भारत की शिक्षा का अनोखा सच: ज़्यादा पढ़ाई, ज़्यादा बेरोज़गारी!

ECONOMY
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AuthorKaran Malhotra|Published at:
भारत की शिक्षा का अनोखा सच: ज़्यादा पढ़ाई, ज़्यादा बेरोज़गारी!
Overview

भारत एक अनोखे आर्थिक विरोधाभास (Paradox) से जूझ रहा है। देश में जहां साक्षरता दर तेज़ी से बढ़ रही है, वहीं पढ़े-लिखे लोगों, खासकर ग्रैजुएट्स के बीच बेरोज़गारी की दर भी आसमान छू रही है। जहां बिना पढ़े-लिखे लोगों में बेरोज़गारी की दर महज़ **3%** है, वहीं **15-24** साल के ग्रैजुएट्स में यह आंकड़ा **40%** तक पहुंच जाता है।

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उम्मीदों और रोज़गार के बीच बढ़ता फासला

भारत की साक्षरता दर, जो पीरियॉडिक लेबर फ़ोर्स सर्वे (PLFS) 2023-24 के अनुसार 80.9% तक पहुंच गई है, एक गंभीर हकीकत छिपा रही है: जितना ज़्यादा कोई पढ़ा-लिखा है, उसके बेरोज़गार रहने की संभावना उतनी ही ज़्यादा है। यह वो विरोधाभास है जो भारत के रोज़गार परिदृश्य को जटिल बना रहा है। जहां बिना किसी औपचारिक शिक्षा वाले लोगों के लिए बेरोज़गारी दर सिर्फ़ 3% है, वहीं 15 से 24 साल के ग्रैजुएट्स के बीच यह दर 40% तक है। यह खाई इसलिए नहीं है कि शिक्षा बेकार है, बल्कि इसलिए है क्योंकि अर्थव्यवस्था, बढ़ती शिक्षा प्रणाली से पैदा हुई आकांक्षाओं और योग्यताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त हाई-स्किल रोज़गार के अवसर पैदा करने के लिए संघर्ष कर रही है। यह समस्या दशकों से बनी हुई है, ग्रैजुएट बेरोज़गारी की दर 1983 से ही 35% से 40% के बीच बनी हुई है।

संरचनात्मक बाधाएं बढ़ा रही हैं संकट

यह चुनौती कई मोर्चों पर है, और यह शिक्षा संस्थानों द्वारा सिखाए जाने वाले कौशल और आधुनिक बाज़ार की मांगों के बीच बुनियादी तालमेल की कमी से जुड़ी है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारतीय ग्रैजुएट्स में से सिर्फ़ लगभग 54.8% ही एम्प्लॉयर्स के अनुसार नौकरी के लिए तैयार माने जाते हैं। कौशल के इस अंतर को पुराने हो चुके करिकुलम और भी बढ़ा देते हैं, जो अक्सर व्यावहारिक ज्ञान के बजाय किताबी ज्ञान को प्राथमिकता देते हैं, जिससे ग्रैजुएट्स उभरते हुए इंडस्ट्री की ज़रूरतों के लिए तैयार नहीं हो पाते। आर्थिक बदलाव भी मुश्किलें खड़ी कर रहा है, क्योंकि अर्थव्यवस्था किसानों को गैर-कृषि भूमिकाओं में समाहित करने के लिए संघर्ष कर रही है। इन दबावों को और बढ़ा रही है भारत की जनसांख्यिकीय (Demographic) स्थिति। वर्किंग-ऐज आबादी का हिस्सा 2030 के बाद चरम पर पहुंचकर घटने लगेगा, जिससे आने वाले दशक में गुणवत्तापूर्ण नौकरियों का सृजन महत्वपूर्ण हो जाता है। एक और जटिलता यह है कि महिलाओं की श्रम बल भागीदारी (Female Labour Force Participation) भी कम बनी हुई है, जो हाल के वर्षों में 32% से 40% के बीच रही है, जो वैश्विक और अन्य उभरते बाज़ारों के औसत से काफी कम है।

जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) खतरे में?

लगातार बनी हुई ग्रैजुएट बेरोज़गारी एक गहरी संरचनात्मक समस्या का संकेत देती है, न कि सिर्फ़ एक अस्थायी आर्थिक झटके का। अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की 'स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026' रिपोर्ट बताती है कि 2004 और 2023 के बीच, हर साल लगभग 50 लाख नए ग्रैजुएट्स जुड़े, जबकि सिर्फ़ 28 लाख ग्रैजुएट नौकरियाँ ही पैदा हुईं, जिनमें से सिर्फ़ 17 लाख ही वेतनभोगी (Salaried) भूमिकाएँ थीं। इस असंतुलन का मतलब है कि ग्रैजुएट रोज़गार, आपूर्ति की गति से पिछड़ रहा है। ग्रैजुएट्स के लिए कमाई में धीमी वृद्धि हो रही है, और कई उच्च-शिक्षित व्यक्तियों को कम-कुशल वाली नौकरियाँ स्वीकार करनी पड़ रही हैं। अगर भारत रोज़गार सृजन की कमी और कौशल-उद्योग के बीच तालमेल की कमी को दूर करने में विफल रहता है, तो इसका बहुप्रशंसित जनसांख्यिकीय लाभांश, जो पहले से ही चरम पर है, जनसांख्यिकीय आपदा में बदल सकता है। सबसे बड़ा जोखिम यह है कि बड़ी, शिक्षित, लेकिन कम रोज़गार वाली या बेरोज़गार युवा आबादी विकास के बजाय सामाजिक और आर्थिक अस्थिरता का स्रोत बन सकती है। रिपोर्ट्स गिग इकोनॉमी (Gig Economy) में नौकरियों के बढ़ने की भी चेतावनी देती हैं, जो कम सुरक्षा और स्थिरता प्रदान करती हैं।

भविष्य का मार्ग: प्रणालीगत सुधार की तत्काल आवश्यकता

विशेषज्ञों और आर्थिक सर्वेक्षणों का ज़ोर इस बात पर है कि शिक्षा और कौशल विकास नीतियों दोनों में व्यापक सुधार की तत्काल आवश्यकता है। ध्यान सिर्फ़ शैक्षणिक उपलब्धि से हटकर रोज़गार क्षमता (Employability) और बाज़ार की मांगों के साथ कौशल का तालमेल बिठाने पर केंद्रित होना चाहिए। तकनीकी उन्नति और शिक्षा के विकास के बीच 'एक्सेलरेशन गैप' को पाटना सर्वोपरि है, जिसके लिए रटंत विद्या के बजाय आलोचनात्मक सोच (Critical Thinking), समस्या-समाधान (Problem-Solving) और पुनरावृत्तीय सीखने (Iterative Learning) की ओर बढ़ने की आवश्यकता है। महत्वपूर्ण संरचनात्मक बदलावों के बिना, भारत अपने जनसांख्यिकीय लाभ को गंवाने और अपनी आर्थिक क्षमता को प्राप्त करने में विफल रहने का जोखिम उठाता है। वर्तमान परिदृश्य लाखों ग्रैजुएट्स के लिए निरंतर संघर्ष का संकेत देता है, जो नीतिगत हस्तक्षेप के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ को उजागर करता है।

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