RBI को मजबूत ग्रोथ पर भरोसा
RBI की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता का मानना है कि भारत की ग्रोथ उम्मीद से ज़्यादा मजबूत है और इसका मुख्य जरिया निवेश है। उन्होंने कहा कि देश की क्षमता उपयोगिता (Capacity Utilization) पहली तिमाही 2026 में 75.6% रही, जो बताता है कि अर्थव्यवस्था अभी अपनी पूरी क्षमता से कोसों दूर है। गुप्ता के अनुसार, पब्लिक और प्राइवेट सेक्टर में लगातार हो रहा निवेश, स्किल डेवलपमेंट, डिजिटल टेक्नोलॉजी और इंफ्रास्ट्रक्चर में हो रही प्रगति अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रही है।
IMF ने FDI और एशिया के झटकों पर जताई चिंता
इसके ठीक उलट, IMF के डायरेक्टर (एशिया और पैसिफिक डेवलपमेंट) कृष्णा श्रीनिवासन ने चिंता जताई है कि भारत में नेट फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) हाल के दिनों में लगभग शून्य पर पहुंच गया है। हालांकि कंपनियों और बैंकों की फाइनेंसियल पोजीशन अच्छी है, लेकिन निवेश उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ रहा। यह भारत के DPIIT के उस अनुमान से काफी अलग है, जिसके तहत 2025-26 के फाइनेंशियल ईयर में FDI $90 अरब से ज़्यादा होने की उम्मीद है, जबकि फरवरी तक $88 अरब का इनफ्लो हो चुका था। श्रीनिवासन ने मिडिल ईस्ट से आने वाले एनर्जी शॉक को भी बड़ा खतरा बताया है, जिससे एशिया में महंगाई बढ़ रही है, ट्रेड डेफिसिट बढ़ रहा है और सरकारी खर्चों के विकल्प सीमित हो रहे हैं।
RBI का महंगाई लक्ष्य पर स्टैंड
पूनम गुप्ता ने RBI के महंगाई लक्ष्य (Inflation Target) का भी पुरजोर बचाव किया। उन्होंने कहा कि कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) महंगाई को 4% पर रखने का लक्ष्य, जिसमें +/- 2% का टॉलरेंस बैंड है, भारत के लिए मार्च 2031 तक पूरी तरह उपयुक्त है। RBI के एक पेपर में 90% से ज़्यादा जवाब देने वालों ने भी हेडलाइन CPI को मुख्य एंकर मानने का समर्थन किया। गुप्ता ने चेतावनी दी कि इस लक्ष्य को बदलने से सेंट्रल बैंक की विश्वसनीयता को नुकसान पहुँच सकता है।
वैश्विक दरें और भारतीय रुपया
IMF ने यह भी बताया कि वैश्विक ब्याज दरें, खासकर US फेडरल रिजर्व की नीतियां, भारत को कैपिटल मूवमेंट और करेंसी वैल्यू के ज़रिए प्रभावित करती हैं। डॉलर का मज़बूत होना और वैश्विक दरों का बढ़ना, भारत से कैपिटल को बाहर ले जा सकता है और रुपये को कमज़ोर कर सकता है। जैसा कि पिछले एक साल में देखा गया है, भारतीय रुपया 12.20% तक गिर चुका है।
FDI गैप और बाज़ार का मिजाज़
FDI पर यह बड़ा अंतर निवेशकों के लिए चिंता का विषय है। जहाँ सरकार बड़े इनफ्लो की उम्मीद कर रही है, वहीं IMF का लगभग शून्य नेट फ्लो का आंकड़ा फॉरेन मनी को आकर्षित करने और बनाए रखने में अंदरूनी समस्याओं की ओर इशारा करता है। इस स्थिति को भारत के आउटवर्ड FDI में आई तेज़ बढ़त ने और खराब कर दिया है, जो FY26 में $48.6 अरब तक पहुँच गया। इकोनॉमिस्ट्स का मानना है कि यह हालिया उछाल घरेलू अनिश्चितता का संकेत है, जो भारत के अंदर आकर्षक निवेश के मौके कम होने की ओर इशारा करता है। भारतीय शेयर बाज़ारों (Stock Markets) में भी यह मिला-जुला सेंटीमेंट दिख रहा है। Sensex लगभग 77,018 पर ट्रेड कर रहा है, जिसका P/E रेश्यो 21.0 है, जो पिछले साल के मुकाबले 4.49% कम है। Nifty 50 भी 24,033 के आसपास सावधानी दिखा रहा है।
भविष्य की राह
इन विरोधाभासों के बावजूद, भारत सरकार फॉरेन इन्वेस्टमेंट को आकर्षित करने पर केंद्रित है और 2025-26 के फाइनेंशियल ईयर के लिए $90 अरब FDI का लक्ष्य रखा है। हालांकि, IMF के अप्रैल 2026 के एशिया आउटलुक में जोखिमों को 'स्पष्ट रूप से निगेटिव' बताया गया है, जो मुख्य रूप से लगातार एनर्जी शॉक और ट्रेड अनिश्चितताओं से आ रहे हैं। बाज़ार बारीकी से देखेगा कि भारत इन वैश्विक दबावों से कैसे निपटता है और क्या उसका घरेलू निवेश ड्राइव, मज़बूत फॉरेन कैपिटल के बिना भी ग्रोथ को सहारा दे पाता है।
