West Asia में जारी भू-राजनीतिक तनाव (geopolitical tensions) भारत की अर्थव्यवस्था के लिए कई मुश्किलें खड़ी कर रहा है। यह सिर्फ ऊर्जा सुरक्षा (energy security) तक सीमित नहीं है, बल्कि महंगाई (inflation), व्यापार घाटा (trade deficit) और सरकारी कर्ज (government debt) को संभालने जैसी बड़ी चुनौतियों को भी बढ़ा रहा है।
इस संघर्ष का सबसे बड़ा असर कच्चे तेल (crude oil) की कीमतों पर दिख रहा है। मार्च 2026 में जहां तेल $103 प्रति बैरल था, वो बढ़कर $128 के करीब पहुंच गया है। जानकारों का मानना है कि यह $130 तक भी जा सकता है। हर $10 की बढ़ोतरी से भारत का व्यापार घाटा जीडीपी के 0.4% तक बढ़ सकता है। खाद (fertilizer) की कीमतों में भी आग लगी है, यूरिया (urea) 81.69% महंगा हो गया है। भारतीय बोलियों में तो यह $959 प्रति टन तक पहुंचा है, जिससे खेती और खाद्य सुरक्षा पर खतरा मंडरा रहा है। इसके अलावा, खाड़ी देशों से आने वाला पैसा, जो भारतीयों के लिए एक बड़ा सहारा है, उसमें भी कमी आ सकती है। इन सब का असर भारतीय रुपये (Indian Rupee) पर भी दिख रहा है, जो मार्च 2026 में 99.82 के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा और अप्रैल 2026 के अंत तक 93.4-93.5 के आसपास ट्रेड कर रहा है, जबकि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) इसे संभालने की कोशिश कर रहा है।
Moody's Ratings ने चेतावनी दी है कि इस लंबे खिंचने वाले संघर्ष से सरकार की वित्तीय और मौद्रिक नीतियों (fiscal and monetary policy) को लागू करने में मुश्किलें आ सकती हैं। सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च बढ़ाना चाहती है, लेकिन तेल और खाद पर सब्सिडी देने का दबाव बढ़ रहा है। थोक महंगाई (wholesale prices) 38 महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है, और तेल की बढ़ी कीमतों व कच्चे माल के महंगे होने से फैक्ट्रियों की लागत भी बढ़ रही है। भले ही विदेशी मुद्रा भंडार (foreign exchange reserves) $700.9 अरब डॉलर पर मजबूत है (10 अप्रैल 2026 तक), लेकिन रुपये को संभालने के लिए RBI ने फरवरी के आखिर में $728.494 अरब डॉलर के शिखर से इसे घटाया है। भारतीय शेयर बाजार का P/E रेश्यो फिलहाल 21.4 है, और बाजार का कुल मूल्य लगभग $5.13 ट्रिलियन डॉलर (दिसंबर 2024 तक) है, जो दिखाता है कि निवेशक इन बाहरी दबावों पर कड़ी नजर रखे हुए हैं।
अलग-अलग रेटिंग एजेंसियां भारत की ग्रोथ को लेकर मिले-जुले अनुमान लगा रही हैं। Moody's ने अपनी Baa3 रेटिंग और स्थिर आउटलुक को बरकरार रखते हुए 2026-27 के लिए GDP ग्रोथ का अनुमान घटाकर 6% कर दिया है। वहीं, S&P Global Ratings ने 2027 के लिए ग्रोथ का अनुमान बढ़ाकर 7.1% किया है, लेकिन ऊर्जा संकट (energy shocks) से मंदी की आशंका जताई है। S&P का मानना है कि भारत की GDP, FY26 में 7.6% की दर से बढ़ेगी। Fitch Ratings ने FY26 के लिए 7.4% ग्रोथ का अनुमान लगाया है। Goldman Sachs ने 2026 का अनुमान घटाकर 5.9% कर दिया है और ब्याज दरें बढ़ाने की भी उम्मीद जताई है। यह अलग-अलग राय दर्शाती है कि भू-राजनीतिक घटनाओं का कितना असर होगा, यह अभी अनिश्चित है। S&P ने तो यह भी कहा है कि अगर तेल संकट लंबा खिंचा तो ग्रोथ 80 बेसिस पॉइंट तक धीमी हो सकती है और RBI को ब्याज दरें बढ़ानी पड़ सकती हैं, जो उसके पहले के नरम रुख से अलग होगा।
भारत की ऊर्जा और खाद जैसे अहम सामानों के लिए आयात पर निर्भरता एक संरचनात्मक कमजोरी (structural weakness) है। 1991 के भुगतान संकट (balance-of-payments crisis) की याद दिलाती है, जो आंशिक रूप से तेल संकट के कारण हुआ था। हालांकि, मौजूदा भंडार 11-12 महीनों के आयात को कवर करने के लिए पर्याप्त हैं, लेकिन अगर सप्लाई की दिक्कतें जारी रहीं तो सिर्फ मुद्रा के उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए इनका इस्तेमाल करना दीर्घकालिक समाधान नहीं है। इसका असर मैन्युफैक्चरिंग पर भी पड़ रहा है, HSBC India Manufacturing PMI मार्च 2026 में 45 महीनों के निचले स्तर पर आ गया है, जिसका एक कारण इस संघर्ष से जुड़ी लागत और बाजार की अनिश्चितता है। नीति निर्माताओं के सामने ग्रोथ के लक्ष्य और आर्थिक स्थिरता को संतुलित करने की एक बड़ी चुनौती है, खासकर लगातार महंगाई, सख्त वित्तीय नीति और ऊर्जा की ऊंची कीमतों से मांग में कमी जैसे जोखिमों को देखते हुए। RBI का महंगाई नियंत्रण और ग्रोथ को संतुलित करने का तरीका बारीकी से देखा जाएगा। भारत इन बाहरी झटकों से कितनी कुशलता से निपटता है, यह आर्थिक स्थिरता और निवेशकों के भरोसे को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण होगा।
