भारतीय नौसैनिकों पर बढ़ा खतरा
पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव के कारण फारस की खाड़ी और आसपास के समुद्री इलाकों में सुरक्षा का माहौल काफी गंभीर हो गया है। डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ शिपिंग ने भारतीय नौसैनिकों के लिए एक खास एडवाइजरी जारी की है, जिसमें समुद्री घटनाओं और जानमाल के नुकसान की वजह से अत्यधिक सावधानी बरतने को कहा गया है। हालांकि, भारतीय झंडे वाले जहाजों पर फिलहाल किसी हताहत की खबर नहीं है, लेकिन विदेशी जहाजों पर सफर कर रहे भारतीय नौसैनिकों में से तीन की जान जा चुकी है और एक घायल हुआ है। यह स्थिति न केवल तत्काल मानवीय चिंता का विषय है, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़े झटके साबित हो सकती है।
ग्लोबल शिपिंग ठप्प, तेल के दाम आसमान पर
इस संघर्ष की वजह से होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे अहम वैश्विक शिपिंग मार्गों पर जहाजों की आवाजाही लगभग रुक सी गई है। इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर दिख रहा है, ब्रेंट क्रूड के दाम $100 से $130 प्रति बैरल तक पहुंचने की आशंका है, अगर यह रुकावटें जारी रहीं। भारत, जो अपनी लगभग 90% कच्ची तेल की जरूरतें आयात करता है और ऐतिहासिक रूप से 46-55% तेल पश्चिम एशिया से मंगाता है, उसके लिए यह मूल्य वृद्धि बेहद नुकसानदायक है। विश्लेषकों का अनुमान है कि तेल की कीमतों में हर $10 की बढ़ोतरी भारत के चालू खाता घाटे (current account deficit) को करीब 36 बेसिस पॉइंट बढ़ा सकती है। मौजूदा तेल भंडार केवल 20-25 दिनों की मांग को पूरा करने लायक हैं, जिससे यह स्थिति और नाजुक हो गई है। रूसी तेल पर मिलने वाली छूट का खत्म होना भी वित्तीय दबाव को और बढ़ा रहा है।
व्यापार मार्ग और निर्यात पर असर
भारत की आर्थिक असुरक्षा सिर्फ ऊर्जा आयात तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके निर्यात पर भी इसका गहरा असर पड़ने वाला है। पश्चिम एशिया भारत के निर्यात के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार है, जो उसके कुल निर्यात का लगभग 17% हिस्सा है, जिसकी कीमत करीब $99 बिलियन है। इसमें रिफाइंड पेट्रोलियम, आभूषण और टेलीफोन जैसे उत्पाद प्रमुख हैं। समुद्री परिवहन में आई बाधाओं से कई सेक्टरों में सप्लाई चेन के जोखिम बढ़ गए हैं। हालांकि भारत ने होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आयात को 70% तक दूसरे मार्गों पर रीरूट करना शुरू कर दिया है, लेकिन केप ऑफ गुड होप के चक्कर लगाकर जहाजों को पहुंचने में 10-15 दिनों का अतिरिक्त समय लग रहा है। इससे वॉर-रिस्क इंश्योरेंस प्रीमियम और लंबी यात्राओं के कारण शिपिंग लागत में भारी बढ़ोतरी हो रही है।
व्यापक आर्थिक चुनौतियाँ और नीतिगत दबाव
कच्चे तेल के आयात पर भारत की उच्च निर्भरता इसे वैश्विक मूल्य उतार-चढ़ाव के प्रति बेहद संवेदनशील बनाती है। अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहीं, तो यह FY27 में भारत की GDP ग्रोथ को 15-40 बेसिस पॉइंट तक कम कर सकती है और खुदरा महंगाई को 5% से ऊपर धकेल सकती है। यह स्थिति स्टैगफ्लेशन (stagflation) यानी धीमी ग्रोथ और बढ़ती महंगाई के दुष्चक्र को जन्म दे सकती है, जिसमें गिरता रुपया सभी आयातित वस्तुओं को और महंगा बना देगा। मूडीज़ (Moody's) जैसे रेटिंग एजेंसियों का भी मानना है कि तेल की ऊंची कीमतें रुपये को कमजोर करेंगी, महंगाई बढ़ाएंगी, चालू खाता घाटा बढ़ाएंगी और मौद्रिक व राजकोषीय नीतियों को जटिल बना देंगी। ईंधन की बढ़ती कीमतों से आम जनता को बचाने के लिए सरकार की ओर से दी जाने वाली सब्सिडी भी सरकारी खजाने पर दबाव डाल रही है। इन सब वजहों से विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की बिकवाली बढ़ी है, जिसने भारतीय शेयर बाजारों में तेज गिरावट ला दी है।
आगे की राह और समाधान
पश्चिम एशियाई संघर्ष की अवधि और तीव्रता ही तय करेगी कि भारत की अर्थव्यवस्था पर इसका कितना गंभीर असर पड़ेगा। लंबे समय तक कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा बनी रहेंगी, जो GDP ग्रोथ में कमी, महंगाई में बढ़ोतरी और चालू खाता घाटे में इजाफे का कारण बन सकती हैं। ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाना और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (strategic petroleum reserves) बढ़ाना इन जोखिमों को कम करने के लिए महत्वपूर्ण कदम हैं। हालांकि, पश्चिम एशिया के अस्थिर क्षेत्र से ऊर्जा आयात पर भारत की संरचनात्मक निर्भरता उसकी आर्थिक स्थिरता के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।