E20 ट्रांज़िशन और मार्केट की चाल
E20 फ्यूल, जो 20% इथेनॉल और 80% पेट्रोल का मिश्रण है, भारत के चालू खाते (Current Account) को संभालने के तरीके में एक बड़ा बदलाव ला रहा है। महंगे आयातित कच्चे तेल की जगह घरेलू बायोफ्यूल (Biofuel) का इस्तेमाल करके, सरकार ग्लोबल तेल बाज़ार की उथल-पुथल के खिलाफ एक सुरक्षा कवच बनाने की कोशिश कर रही है। इसका सीधा फ़ायदा ये है कि ऊर्जा की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए जो अरबों डॉलर देश से बाहर जाते हैं, वो देश में ही रहेंगे। लेकिन इस काम में लॉजिस्टिक्स (Logistics) का भारी तालमेल बिठाना होगा। ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को अपनी सप्लाई चेन (Supply Chain) को ठीक करना होगा, वहीं ऑटोमोबाइल कंपनियों को मौजूदा गाड़ियों की तकनीकी दिक्कतों से निपटना होगा, जो ज़्यादा इथेनॉल के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं।
फीडस्टॉक का संकट और इंडस्ट्री का री-बैलेंसिंग
शुरुआत में, इस प्रोजेक्ट के लिए ज़रूरी इथेनॉल की सप्लाई काफी हद तक शुगर इंडस्ट्री से आ रही थी। इससे चीनी की कीमतों को सहारा मिला और किसानों की लिक्विडिटी (Liquidity) भी बढ़ी। लेकिन अब, E20 के लक्ष्य को पूरा करने के लिए दूसरी पीढ़ी के इथेनॉल उत्पादन को तेज़ी से बढ़ाना होगा। अगर इंडस्ट्री कृषि अवशेषों (Agricultural Residue) और बायोमास को बड़े पैमाने पर प्रोसेस करने में कामयाब नहीं होती है, तो इस पॉलिसी से खाने की सुरक्षा पर खतरा मंडराने लगेगा। इसके लिए पारंपरिक फर्मेंटेशन (Fermentation) तरीकों से हटकर एडवांस बायोकेमिकल (Biochemical) पाथवे की ज़रूरत है, जहाँ भारत अभी ब्राज़ील जैसे देशों से काफी पीछे है।
स्ट्रक्चरल रिस्क और मंदी का डर
निवेशकों और नीति निर्माताओं को E20 रोडमैप में छुपे बड़े खतरों पर ध्यान देना होगा। सबसे बड़ी चिंता मौजूदा नॉन-फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों की कम्पैटिबिलिटी (Compatibility) को लेकर है। इथेनॉल से मिलने वाली हाई ऑक्टेन (High Octane) परफॉरमेंस के बावजूद, पुराने इंजनों में इसके लगातार इस्तेमाल से फ्यूल सिस्टम के पुर्जे खराब हो सकते हैं। इससे ग्राहकों के लिए मेंटेनेंस (Maintenance) का खर्च बढ़ सकता है और लम्बे समय में रेगुलेटरी (Regulatory) समस्याएँ आ सकती हैं। साथ ही, मौसमी फसलों पर निर्भरता इथेनॉल सप्लाई चेन को मौसम की मार, जैसे सूखा या खराब मानसून, के प्रति बहुत संवेदनशील बनाती है। जिन देशों के पास एनर्जी पोर्टफोलियो (Energy Portfolio) ज़्यादा विविध है, उनके विपरीत, भारत का यह अचानक कदम एक बड़ा जोखिम पैदा करता है; अगर फीडस्टॉक की सप्लाई कम होती है, तो सरकार को या तो ज़्यादा तेल आयात करना पड़ेगा या घरेलू ईंधन की किल्लत झेलनी पड़ेगी, दोनों ही सूरतों में महंगाई (Inflation) पर बुरा असर पड़ेगा।
भविष्य का नज़ारा और सेक्टर पर असर
E20 की ओर बढ़ना भारत के घरेलू ऊर्जा निर्माण को एक ज़रूरी विकास की ओर ले जा रहा है। उम्मीद है कि कंपनियों को स्टोरेज (Storage) और डिस्ट्रीब्यूशन (Distribution) नेटवर्क को बेहतर बनाने के लिए भारी कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capital Expenditure) करना होगा। हालांकि कार्बन उत्सर्जन में कमी ESG (Environmental, Social, and Governance) लक्ष्यों के अनुरूप है, लेकिन इथेनॉल-ब्लेंडिंग (Ethanol-Blending) सेक्टर का लम्बा मुनाफा पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार खुदरा उपभोक्ताओं पर भारी बोझ डाले बिना बायोफ्यूल के लिए स्थिर मूल्य निर्धारण (Pricing) फॉर्मूला बनाए रखने में कितनी कामयाब होती है।
