ई-रुपी का मुख्य मकसद सरकारी सहायता (aid) पहुंचाने की प्रक्रिया में आ रही अड़चनों को दूर करना है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि सब्सिडी वाकई सही लोगों तक पहुंचे। 80 अरब डॉलर की इस व्यवस्था में, कृषि सब्सिडी और राशनिंग जैसे क्षेत्रों को लक्षित करना लीकेज (leakage) रोकने की दिशा में एक अहम कदम है।
ई-रुपी का 'प्रोग्रामेबल' फीचर: वरदान या बाधा?
इस डिजिटल करेंसी की सबसे खास बात है इसकी 'प्रोग्रामेबल' क्षमता। इसका मतलब है कि सब्सिडी, जैसे कि ड्रिप सिंचाई सिस्टम के लिए ₹103,000 की लागत पर 80% की सब्सिडी, केवल स्वीकृत विक्रेताओं से ही खर्च की जा सकेगी। यह डायरेक्ट ट्रांसफर मॉडल किसानों के लिए पारंपरिक देरी और शुरुआती पूंजी की जरूरत को खत्म करने का वादा करता है। लेकिन, इस खास लक्ष्य का सामना भारत के सबसे लोकप्रिय डिजिटल पेमेंट सिस्टम, UPI, से है। मार्च 2026 में UPI ने 22.64 अरब से ज्यादा ट्रांजेक्शन किए, जिनकी कुल वैल्यू ₹29.53 लाख करोड़ थी। यह आंकड़ा ई-रुपी की अपने लॉन्च (2022 के अंत) से लेकर अब तक की कुल 3.6 अरब डॉलर की ट्रांजेक्शन वैल्यू से कहीं ज्यादा है। अप्रैल 2026 की शुरुआत में 1 डॉलर की कीमत लगभग 93-94 रुपये थी, जो इन आंकड़ों को समझने में मदद करती है।
ग्लोबल CBDC रेस और भारत की चुनौतियाँ
यह जानना अहम है कि दुनिया भर में 49 देश CBDC पर पायलट चला रहे हैं और 134 देश इस पर विचार कर रहे हैं, जिससे भारत भी इस दौड़ में आगे है। हालांकि, चीन का ई-युआन (e-yuan) इस मामले में कहीं ज्यादा आगे है। चीन ने जनवरी 2026 तक ब्याज देने वाले वॉलेट (interest-bearing wallets) लॉन्च करने की योजना बनाई है और खरबों की ट्रांजेक्शन वैल्यू हासिल कर ली है, जो भारत की महत्वाकांक्षा से कहीं बड़ी है। भारत ने प्रोग्रामेबल CBDC में करीब 1 करोड़ (10 million) पायलट यूजर्स के साथ अच्छा प्रदर्शन किया है, लेकिन ट्रांजेक्शन वॉल्यूम और फीचर्स के मामले में अभी भी चीन से पीछे है। भारत सरकार महाराष्ट्र में कृषि सब्सिडी (जहां करीब 1,400 किसानों ने आवेदन किया) और गुजरात में खाद्य वितरण (जिसमें करीब 7.5 मिलियन परिवारों को लक्षित किया गया है) जैसे खास उपयोग के मामलों पर ध्यान केंद्रित कर रही है, ताकि इसके लिए कोई 'किलर एप्लीकेशन' खोजा जा सके।
यूजर एडॉप्शन की चुनौती: कंट्रोल या सुविधा?
MIT की डिजिटल करेंसी इनिशिएटिव की नेहा नारूला ने बड़ी चिंताएं जताई हैं। उनका मानना है कि ई-रुपी की 'प्रोग्रामेबल' क्षमता, जो यह तय करती है कि पैसा कैसे, कहाँ और कब खर्च होगा, उपयोगकर्ताओं को असहज कर सकती है। यह डिजिटल कूपन जैसा महसूस हो सकता है, न कि एक लचीले पैसे की तरह। यह 'फ्रिक्शन' UPI जैसे सुविधाजनक पेमेंट मेथड के मुकाबले एक बड़ी बाधा है, जिसका इस्तेमाल भारत के 81% रिटेल डिजिटल ट्रांजेक्शन में होता है। मौजूदा डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) सिस्टम पहले से ही कल्याणकारी योजनाओं (2026 तक 0.91 का वेलफेयर एफिशिएंसी इंडेक्स) में सुधार दिखा चुका है, तो ऐसे में CBDC से मिलने वाले अतिरिक्त फायदे पर सवाल उठते हैं। इसके अलावा, भारत का जीडीपी के प्रतिशत के तौर पर सामाजिक सेवाओं पर सरकारी खर्च अपेक्षाकृत कम है, जिसका मतलब है कि CBDC डिलीवरी को ऑप्टिमाइज़ कर सकता है, लेकिन बजट की कमी को दूर नहीं कर सकता।
आगे का रास्ता: पायलट से व्यापक इस्तेमाल तक?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ई-रुपी को मौजूदा पेमेंट सिस्टम के पूरक के तौर पर देखता है, जिसका लक्ष्य टायर्ड प्राइवेसी के साथ सहज ट्रांजेक्शन सुनिश्चित करना है। लेकिन, खास सरकारी योजनाओं से परे आम जनता द्वारा इसे व्यापक रूप से अपनाना 'प्रोग्रामेबिलिटी' की दुविधा को सुलझाने पर निर्भर करेगा। अगर लोगों को लचीले और स्थापित पेमेंट मेथड से ई-रुपी पर स्विच करने के लिए कोई मजबूत प्रोत्साहन (incentive) नहीं मिलता है, तो यह डिजिटल मुद्रा कुछ खास सरकारी उपयोगों तक ही सीमित रहने का खतरा है और 'पेमेंट के भविष्य' के तौर पर स्थापित नहीं हो पाएगी।
