AI के जाल में फंस रहा भारत
डिजिटल इंडिया की महत्वाकांक्षी तरक्की, जिसमें इन्वेस्टमेंट, क्रेडिट और पेमेंट जैसे सेक्टर तेज़ी से फल-फूल रहे हैं, अब एक बड़े खतरे की जद में आ गई है। पिछले 3 सालों में डिजिटल धोखाधड़ी के मामले 10 गुना ज़्यादा बढ़ गए हैं, जिससे करोड़ों का नुकसान हो रहा है। इस खतरनाक बढ़त की मुख्य वजह है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल, जिसका सहारा लेकर साइबर क्रिमिनल ज़्यादा से ज़्यादा भरोसेमंद स्कैम बना रहे हैं। AI-संचालित टूल्स जैसे डीपफेक वीडियो, वॉयस क्लोनिंग और हाई-टेक फिशिंग ईमेल, वेबसाइटों को क्लोन करना, इन्हें पहचानना मुश्किल बना रहे हैं। IDfy के सीईओ अशोक हरिहरन बताते हैं कि AI से होने वाली धोखाधड़ी एक बड़ी चिंता है, क्योंकि डिजिटल ट्रांज़ैक्शन में फिजिकल कॉन्टैक्ट न होने का फायदा क्रिमिनल बार-बार उठा रहे हैं। कुल फाइनेंशियल फ्रॉड का आंकड़ा लगभग ₹34,000 करोड़ तक पहुँच गया है, और अगर अनरिपोर्टेड मामलों को भी जोड़ दें तो यह ₹1 लाख करोड़ के पार जा सकता है। सिर्फ 2024 में ही डिजिटल फ्रॉड से लगभग ₹22,812 करोड़ ($2.78 बिलियन) का नुकसान हुआ है। चिंता की बात यह है कि इनमें से कई फ्रॉड साउथ ईस्ट एशिया के देशों जैसे कंबोडिया, म्यांमार और लाओस से ऑपरेट हो रहे हैं, जहां से भारतीय नागरिकों को हर महीने लगभग ₹1,500 करोड़ का चूना लगाया जा रहा है, खासकर 2025 के शुरुआती महीनों में।
लिटरेसी और डिजिटल इंक्लूजन के बीच बढ़ती खाई
भारत में तेज़ डिजिटल अपनाने से फाइनेंशियल इंक्लूजन (वित्तीय समावेशन) बढ़ा है, खासकर माइक्रो-मर्चेंट जैसे छोटे कारोबारियों के लिए। UPI जैसी टेक्नोलॉजी ने 2023 में ₹139 ट्रिलियन से ज़्यादा के ट्रांज़ैक्शन वॉल्यूम को संभव बनाया है। लेकिन, इस डिजिटल क्रांति की रफ़्तार, वित्तीय और डिजिटल लिटरेसी के बढ़ने की रफ़्तार से कहीं ज़्यादा है। यही गैप है जिसका फायदा चालाक फ्रॉडस्टर्स उठा रहे हैं। डिजिटल बैंकिंग ने दूरियों और लागत की रुकावटें खत्म की हैं, लेकिन डिजिटल लिटरेसी की कमी, भरोसे का अभाव और सुरक्षा संबंधी चिंताएं इन सेवाओं के सही इस्तेमाल में बाधा डाल रही हैं, खासकर बुजुर्गों और ग्रामीण इलाकों में। आज के समय में डिजिटल फाइनेंशियल सर्विसेज़ को इस्तेमाल करने के लिए न सिर्फ वित्तीय समझ, बल्कि डिजिटल प्रोफिशिएंसी भी ज़रूरी है, जो कई लोगों के पास अभी भी नहीं है।
रेगुलेटर्स की जवाबी कार्रवाई और नई चुनौतियाँ
इन बढ़ते खतरों से निपटने के लिए रेगुलेटर्स (नियामक) भी सक्रिय हैं। SEBI (सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया) ने Google के साथ मिलकर मार्केट-रिलेटेड ऐप्स को वेरिफाई करने के लिए 'SEBI Check' टूल लॉन्च किया है, जो निवेशकों को पेमेंट लिंक्स और बैंक अकाउंट की प्रामाणिकता जांचने में मदद करता है। SEBI उन इन्वेस्टमेंट एडवाइजर्स और फाइनेंशियल इन्फ्लुएंसर्स के खिलाफ भी सख्त हो रहा है जो सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। वहीं, RBI (रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया) ने कंज्यूमर प्रोटेक्शन को बेहतर बनाने के लिए कदम उठाए हैं। RBI ने स्मॉल-वैल्यू डिजिटल फ्रॉड के पीड़ितों को ₹25,000 तक का मुआवजा देने का प्रस्ताव दिया है, जिससे नुकसान का बोझ व्यक्तियों से हटकर सिस्टमिक रिस्क का हिस्सा बन सके। RBI लैग्ड क्रेडिट्स और एडिशनल ऑथेंटिकेशन जैसे उपायों पर भी विचार कर रहा है ताकि फ्रॉड को पहले ही रोका जा सके। IDfy जैसी कंपनियां AI-पावर्ड डीपफेक डिटेक्शन और मजबूत KYC वेरिफिकेशन सिस्टम जैसे एडवांस्ड टेक्नोलॉजीज़ डेवलप कर रही हैं। Equifax India भी डेटा और एनालिटिक्स का इस्तेमाल कर फाइनेंशियल इंक्लूजन को बढ़ावा दे रहा है। हालांकि, AI-संचालित फ्रॉड की तेज़ी और क्रॉस-बॉर्डर ऑपरेशनल कॉम्प्लेक्सिटीज लगातार चुनौतियाँ पेश कर रही हैं।
ख़तरे अभी टले नहीं हैं
नियमित नियामक और तकनीकी प्रयासों के बावजूद, बड़ा ख़तरा बना हुआ है। इसकी मुख्य वजह डिजिटल अपनाने और लिटरेसी के बीच बढ़ती खाई है, और साइबर क्रिमिनल्स की लगातार बढ़ती चालाकी। AI का इस्तेमाल, खासकर डीपफेक और वॉयस क्लोनिंग के ज़रिए, एक बड़ा ख़तरा है। एक केस में AI-जनित वॉयस क्लोनिंग के कारण हांगकांग की एक फर्म को $25 मिलियन का नुकसान हुआ था। भारत में 47% वयस्कों ने AI वॉयस-क्लोनिंग या डीपफेक स्कैम का अनुभव किया है या वे किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जो इसका शिकार हुआ है। साउथ ईस्ट एशिया जैसे इंटरनेशनल हब से होने वाले कई फ्रॉड ऑपरेशंस कानून प्रवर्तन और रिकवरी को मुश्किल बनाते हैं। हालांकि रेगुलेटर्स AI का इस्तेमाल फ्रॉड डिटेक्शन और कंप्लायंस के लिए कर रहे हैं, पर डेटा क्वालिटी, सिस्टम इंटीग्रेशन और इफेक्टिव AI डिप्लॉयमेंट के लिए ज़रूरी शेयर्ड इंटेलिजेंस प्लैटफ़ॉर्म जैसी चुनौतियाँ बाकी हैं। फिनटेक इनोवेशन की रफ़्तार, जो ग्रोथ को बढ़ावा दे रही है, उसने नई वल्नरेबिलिटीज़ भी पैदा की हैं। इसके अलावा, कुशल साइबरसिक्योरिटी प्रोफेशनल्स की वैश्विक कमी और थर्ड-पार्टी वेंडर्स पर अत्यधिक निर्भरता भी एक समस्या है। UPI के ज़रिए होने वाले भारी ट्रांज़ैक्शन वॉल्यूम फ्रॉडस्टर्स के लिए एक आकर्षक टारगेट हैं, और भारत में ग्राहकों के लिए मजबूत फ्रॉड इंश्योरेंस की कमी का मतलब है कि कई पीड़ित अपना पैसा रिकवर नहीं कर पाते। AI का इस्तेमाल एल्गोरिद्मिक ट्रेडिंग में भी सिस्टमिक रिस्क पैदा कर सकता है, जिस पर SEBI की नज़र है।