रिपोर्ट का बड़ा खुलासा: क्या है जनसांख्यिकीय लाभांश और खतरा?
आरबीआई की 'स्टेट फाइनेंस' (State Finances) रिपोर्ट ने भारत की मानव पूंजी विकास की वित्तीय रणनीति और देश की जनसांख्यिकीय क्षमता के बीच एक बड़ी खाई को उजागर किया है। जहां एक ओर भारत की युवा आबादी भविष्य में आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए तैयार है, वहीं दूसरी ओर रिपोर्ट बताती है कि उच्च शिक्षा और उन्नत कौशल (Advanced Skilling) में निवेश कम हो रहा है। इस तरह की वित्तीय रणनीति, जो भविष्य के लिए तैयार रहने के बजाय वर्तमान पर ज़्यादा केंद्रित है, एक पीढ़ी के अवसर को एक बड़ी आर्थिक देनदारी में बदल सकती है।
शिक्षा के खर्च में भारी असंतुलन
आरबीआई ने भारतीय राज्यों को उनकी जनसांख्यिकीय प्रोफाइल के आधार पर बांटा है: युवा (Youthful), मध्यवर्ती (Intermediate) और वृद्ध (Ageing)। अनुमान है कि 2036 तक आधे से ज़्यादा भारतीय राज्य वृद्ध श्रेणी में आ जाएंगे। सैद्धांतिक रूप से, इस बदलाव के लिए अलग-अलग वित्तीय रणनीतियों की आवश्यकता होती है। युवा राज्यों को भविष्य के श्रमिकों को खपाने के लिए मानव पूंजी में भारी निवेश की ज़रूरत है, जबकि वृद्ध राज्यों को सामाजिक सुरक्षा और उत्पादकता बढ़ाने में संतुलन बनाना होगा।
लेकिन, डेटा एक चिंताजनक तस्वीर दिखाता है। शिक्षा पर खर्च की वृद्धि, जनसांख्यिकीय वृद्ध के साथ आनुपातिक रूप से कम हो रही है। 2014 से 2024 के बीच, युवा राज्यों में यह सालाना 6.1% थी, जो वृद्ध राज्यों में घटकर 4.1% रह गई। इससे भी गंभीर बात यह है कि इस खर्च का बड़ा हिस्सा, यानी लगभग 80% से 87%, स्कूल शिक्षा पर खर्च हो रहा है। इसके मुकाबले, उच्च शिक्षा और उन्नत कौशल विकास के लिए केवल 11% से 12% बजट आवंटित किया जा रहा है। यह असंतुलित आवंटन कार्यबल को कौशल-संचालित वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए तैयार करने में विफल हो रहा है।
'डेमोग्राफिक डिविडेंड' का व्यर्थ जाना
भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश, जिसमें बड़ी संख्या में कार्य-आयु वाली आबादी शामिल है, आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। अनुमानों के अनुसार, ऐतिहासिक रूप से उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में यह कुल विकास का 15% तक हो सकता है। लेकिन इस क्षमता को साकार करने के लिए उच्च शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण पर रणनीतिक ध्यान देना ज़रूरी है। पूर्वी एशियाई देशों ने इसी तरह के जनसांख्यिकीय बदलावों का लाभ तृतीयक शिक्षा (Tertiary Education) और अनुसंधान (Research) में भारी निवेश करके उठाया है।
भारत का वर्तमान दृष्टिकोण इस महत्वपूर्ण क्षेत्र की उपेक्षा करता प्रतीत होता है। हालांकि शिक्षा पर कुल सार्वजनिक व्यय जीडीपी (GDP) के लगभग 4.2% पर बना हुआ है, लेकिन पिछले दो दशकों में उच्च शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च जीडीपी के लगभग 1.3% पर ही स्थिर रहा है। हाल के बजट आवंटन, जैसे कि केंद्रीय बजट 2026 में, शिक्षा पर कुल खर्च में निरपेक्ष वृद्धि दिखी है, लेकिन कुल केंद्रीय व्यय में शिक्षा का हिस्सा अभी भी लगभग 2.6% के आसपास है। इसमें भी स्कूल के बुनियादी ढांचे पर ज़्यादा ज़ोर है, न कि उन्नत कौशल विकास और अनुसंधान पर। यह सरकार की उस मंशा के विपरीत है जिसमें एक कुशल कार्यबल बनाने की बात कही गई है।
भविष्य की राह: एक 'बेकार संपत्ति' का खतरा
इस वित्तीय उपेक्षा के परिणाम जल्द ही सामने आने की संभावना है। शिक्षित बेरोजगारी, अनौपचारिक क्षेत्र का बढ़ना और उत्पादकता में कमी, खासकर जब भारत 2026 में 6.6% से 7.3% के बीच मजबूत आर्थिक विकास का लक्ष्य रखता है। सरकारी पहल जैसे 'स्किल इंडिया मिशन' (Skill India Mission) और बजट 2026 में उद्योग-अकादमिक जुड़ाव पर ज़ोर, कौशल की आवश्यकता के प्रति जागरूकता दर्शाते हैं।
हालांकि, शिक्षा बजट में मूलभूत असंतुलन, जो स्कूल नामांकन को उच्च-स्तरीय दक्षताओं पर तरजीह देता है, एक बड़ी चुनौती पेश करता है। उच्च शिक्षा, अनुसंधान और उन्नत व्यावसायिक प्रशिक्षण की ओर एक मौलिक पुनर्संतुलन के बिना, भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश एक 'बेकार संपत्ति' (Wasting Asset) बनने का जोखिम उठाएगा। यह देश को भविष्य की आर्थिक मांगों के लिए अप्रस्तुत छोड़ देगा और संभावित रूप से सामाजिक व आर्थिक असमानताओं को बढ़ाएगा।