रणनीतिक ज़रूरत (The Strategic Imperative)
भारत के लिए 'क्रिटिकल मिनरल्स' जैसे कॉपर, लिथियम और रेयर अर्थ्स अब सिर्फ अर्थव्यवस्था का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का भी अहम हिस्सा बन गए हैं। खास तौर पर 'ग्रीन एनर्जी' और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की बढ़ती माँग के चलते इनकी अहमियत और बढ़ गई है। भारत में इन खनिजों के बड़े भंडार मौजूद हैं, जैसे कॉपर के करीब 163.9 मिलियन टन और कोबाल्ट अयस्क के 44.9 मिलियन टन। लेकिन, इन विशाल भंडारों का फायदा उठाने में सबसे बड़ी रुकावट है बड़े पैमाने पर प्रोसेसिंग (प्रसंस्करण) की कमी।
'इन्वेस्टमेंट' का बड़ा अंतर (Navigating the Investment Chasm)
इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार ने कई बड़े कदम उठाए हैं। जनवरी 2025 में लॉन्च हुए नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन (NCMM) के लिए अगले सात सालों में ₹16,300 करोड़ का खर्च अनुमानित है। वहीं, सरकारी कंपनियां (PSUs) इसमें ₹18,000 करोड़ का अतिरिक्त निवेश करेंगी, जिससे कुल फंड ₹34,300 करोड़ हो जाएगा। बजट 2026-27 में भी रेयर-अर्थ गलियारे बनाने और 'क्रिटिकल मिनरल' प्रोसेसिंग के लिए कैपिटल गुड्स पर इंपोर्ट ड्यूटी में छूट देने का ऐलान किया गया है। मगर, यह सब चीन के अकेले के निवेश के सामने बहुत कम है। चीन ने अकेले 2024 में 'क्रिटिकल मिनरल्स' में $21.44 बिलियन (यानी लगभग ₹1.7 लाख करोड़ से ज़्यादा) का निवेश किया है। यह भारी 'इन्वेस्टमेंट' का अंतर भारत के लिए अपनी वैल्यू चेन को मजबूत करने में एक बड़ी बाधा है।
चीन का प्रोसेसिंग पर एकछत्र राज (China's Unrivaled Refining Dominance)
चीन का सबसे बड़ा फायदा सिर्फ माइनिंग (खनन) में नहीं, बल्कि प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग (शोधन) क्षमताओं में है। दुनिया भर के रेयर अर्थ का लगभग 60% चीन में निकाला जाता है, जबकि अलगाव (separation) और रिफाइनिंग के 91% चरणों पर चीन का कब्जा है। कुल मिलाकर, चीन ग्रेफाइट और रेयर अर्थ एलिमेंट्स की 90% से ज़्यादा रिफाइनिंग क्षमता को कंट्रोल करता है। इसके अलावा, दुनिया के लिथियम और कोबाल्ट का करीब 60% प्रोसेस चीन में होता है, और कॉपर व निकल की रिफाइनिंग में भी इसकी बड़ी हिस्सेदारी है। यह एकाधिकार भारत जैसे देशों के लिए सप्लाई चेन में बड़ी कमजोरियाँ पैदा करता है, क्योंकि फिलहाल भारत को प्रोसेस किए हुए 'क्रिटिकल मिनरल्स' का बड़ा हिस्सा आयात करना पड़ता है।
अहम कमियाँ और भविष्य की राह (Strategic Gaps and Future Avenues)
भारत की आत्मनिर्भर बनने की महत्वाकांक्षा के सामने 'इन्वेस्टमेंट' के अलावा भी कई मुश्किलें हैं। बड़े पैमाने पर 'डाउनस्ट्रीम प्रोसेसिंग' की लगभग अनुपस्थिति एक गंभीर कमी है। NCMM का लक्ष्य इस गैप को भरना है। इसके लिए खोज (exploration) को बढ़ावा दिया जाएगा, खानिज़ विदेश इंडिया लिमिटेड (KABIL) जैसी संस्थाओं के जरिए विदेशी संपत्तियाँ हासिल की जाएंगी, और टेक्नोलॉजी व रीसाइक्लिंग (पुनर्चक्रण) को बढ़ावा दिया जाएगा। KABIL के ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना और चिली जैसे देशों के साथ हुए समझौते सप्लाई को अलग-अलग देशों से जुटाने (diversification) के लिए महत्वपूर्ण कदम हैं। इसके अलावा, 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' को जियोलॉजिकल एनालिसिस में इस्तेमाल करने और सामुदायिक सह-निवेश को प्रोत्साहित करने से प्रोजेक्ट्स में तेजी आ सकती है।
जोखिम: पड़े रहेंगे 'खनिज भंडार' और भू-राजनीतिक खतरा (The Bear Case: Dormant Assets and Geopolitical Risk)
असली खतरा यह है कि भारत के खनिज भंडार 'प्रोसेसिंग' की कमी के कारण 'निष्क्रिय' (dormant) पड़े रहें। इस निर्भरता से देश भू-राजनीतिक दबाव और सप्लाई शॉक का शिकार हो सकता है, खासकर जब दुनिया भर में इन खनिजों की माँग बढ़ रही है। NCMM जैसी नीतियां अच्छी शुरुआत हैं, लेकिन इनका बजट चीन के निरंतर निवेश की तुलना में काफी छोटा है, जो एक संरचनात्मक नुकसान पैदा करता है। चीन के बाहर नए माइनिंग और रिफाइनिंग प्रोजेक्ट्स को शुरू करना भी कहीं ज़्यादा महंगा और धीमा है। जब तक भारत निजी पूंजी को आकर्षित करने और एडवांस्ड 'प्रोसेसिंग' टेक्नोलॉजी को अपनाने में बड़ी छलांग नहीं लगाता, तब तक देश 'क्रिटिकल मिनरल्स' के वैल्यू-एडेड सेक्टर में एक प्रमुख खिलाड़ी बनने के बजाय सिर्फ कच्चे माल का सप्लायर बनकर रह सकता है। यह भारत के एनर्जी ट्रांज़िशन और औद्योगिक सुरक्षा के लक्ष्यों पर भारी पड़ सकता है।
