RBI की दर में कटौती का असर
RBI द्वारा अपनी पॉलिसी दरों में 125 बेसिस पॉइंट की कटौती के बाद, भारत का कॉमर्शियल क्रेडिट ₹300 लाख करोड़ के आंकड़े को पार कर गया है। यह पिछले साल इसी अवधि के मुकाबले 14.7% की सालाना बढ़ोतरी है। इस फाइनेंशियल ईयर के पहले दस महीनों में ही, क्रेडिट ग्रोथ में 35% का उछाल देखा गया, जो कुल ₹34.5 लाख करोड़ तक पहुँच गया। इकॉनमिस्ट्स का मानना है कि दरें कम होने और बाज़ार में लिक्विडिटी (Liquidity) बढ़ने का ये कम्बाइंड असर है।
NBFCs और बैंकों की दौड़
इस दौरान एक दिलचस्प बात सामने आई है। जहाँ बैंकों ने कुल मिलाकर बाज़ार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई है, वहीं NBFCs (नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनीज़) ने तेज़ी से ग्रोथ की है। पिछले दस महीनों में, NBFCs ने अपने क्रेडिट में 20% की वृद्धि दर्ज की, जबकि कमर्शियल बैंकों की ग्रोथ 14% रही। इसका मतलब है कि NBFCs नए लेंडिंग (Lending) में ज़्यादा हिस्सेदारी ले रहे हैं, भले ही बैंकों का कुल योगदान बड़ा हो।
इक्विटी की जगह कर्ज़ को तरजीह
एक और अहम संकेत यह है कि कॉर्पोरेट्स ने इक्विटी इश्यूएंस (Equity Issuances) से दूरी बना ली है। इस अवधि में इक्विटी जारी करने में 12% की गिरावट आई है, जो ₹2.97 लाख करोड़ रह गया। यह दिखाता है कि कंपनियाँ अब अपने विस्तार या प्रोजेक्ट्स के लिए इक्विटी डाइल्यूट (Dilute) करने के बजाय कर्ज़ लेने को ज़्यादा तरजीह दे रही हैं।
भविष्य की राह और जोखिम
भारत की आर्थिक ग्रोथ अच्छी रहने की उम्मीद है, और विश्लेषक वित्तीय क्षेत्र के लिए सकारात्मक बने हुए हैं। NBFCs की ग्रोथ आगे भी तेज़ रहने का अनुमान है, खासकर रिटेल लेंडिंग (Retail Lending) में। हालांकि, इन कंपनियों के लिए फंड जुटाने के तरीक़े और लोन की क्वालिटी बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी। वहीं, बैंकों को भी बढ़ती प्रतिस्पर्धा और डिपॉजिट पर मार्जिन (Margin) बनाए रखने का दबाव झेलना पड़ सकता है।