भारत की इकोनॉमी का 'कर्ज' वाला दांव: कंजम्पशन बढ़ रहा, पर रिस्क भी बेकाबू!

ECONOMY
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AuthorAditi Chauhan|Published at:
भारत की इकोनॉमी का 'कर्ज' वाला दांव: कंजम्पशन बढ़ रहा, पर रिस्क भी बेकाबू!
Overview

भारत की अर्थव्यवस्था की ग्रोथ इन दिनों कंज्यूमर खर्च पर टिकी है, लेकिन चिंता की बात यह है कि यह ग्रोथ आय बढ़ने से नहीं, बल्कि घर-घर में बढ़ते कर्ज से आ रही है। गिरती बचतें और कमजोर पड़ता रुपया इस आर्थिक मॉडल को और जोखिम भरा बना रहा है।

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घर-घर बढ़ते कर्ज से चल रहा है कंजम्पशन का पहिया

भारत की इकोनॉमी की रफ्तार, जो FY26 तक 7% तक पहुंचने का अनुमान है, मुख्य रूप से कंज्यूमर खर्च पर टिकी है। यह खर्च GDP का 61.5% तक पहुंच सकता है। लेकिन, इसके पीछे एक चिंताजनक तस्वीर उभर रही है। दरअसल, लोगों की आय बढ़ने के बजाय, यह ग्रोथ घर-घर बढ़ते Household Debt से आ रही है। पिछले कुछ सालों में, यानी FY24 में, लोगों की बचत 5.1%-5.3% के निचले स्तर पर आ गई है, जबकि घर-घर का कर्ज 6.2%-6.4% तक बढ़ गया है। महामारी से पहले के मुकाबले, Household Debt संपत्ति के मुकाबले दोगुनी रफ्तार से बढ़ रहा है। मार्च 2025 तक, यह GDP के 41.3% तक पहुंच गया, जो पांच साल के औसत 38.3% से काफी ऊपर है। Household Credit भी FY24 तक GDP के 42.1% पर पहुंच गया है, और इसमें बड़ा हिस्सा अब सामान खरीदने (कंजम्पशन लोन) के लिए लिया जा रहा है, न कि संपत्ति बनाने के लिए। यह दिखाता है कि लोग अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए कर्ज का सहारा ले रहे हैं, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति पर दबाव बढ़ सकता है।

कमजोर रुपया और इंपोर्ट का बढ़ता खर्च

कमजोर होता रुपया भी मुश्किलें बढ़ा रहा है। भारत, क्रूड ऑयल, एलएनजी, एडिबल ऑयल और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे कई जरूरी सामानों का इंपोर्ट करता है, जिनकी कीमत डॉलर में तय होती है। जब रुपया कमजोर होता है, तो इन इंपोर्टेड चीजों की कीमतें बढ़ जाती हैं। मार्च 2026 तक डॉलर के मुकाबले रुपया 95 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया था, और अप्रैल 2026 में यह 94.5922 पर ट्रेड कर रहा था, यानी पिछले 11.06% में 11.06% की गिरावट आई। इसके अलावा, वेस्ट एशिया के तनाव के कारण Brent Crude का भाव $100 प्रति बैरल के ऊपर चला गया है। यह एक तरह से 'एनर्जी टैक्स' की तरह काम कर रहा है, जिससे ट्रांसपोर्ट, खाने-पीने और मैन्युफैक्चरिंग की लागत बढ़ रही है। इससे महंगाई भी बढ़ रही है, CPI 4% के पार चला गया है। ऐसे में, लोग ज्यादा खर्च कर रहे हैं, लेकिन उन्हें वैल्यू कम मिल रही है।

भविष्य के विकास पर मंडराता खतरा

सिर्फ कंजम्पशन पर निर्भरता इकोनॉमी की लॉन्ग-टर्म ग्रोथ को नुकसान पहुंचा सकती है। हालांकि कंजम्पशन से तात्कालिक मांग बढ़ती है, लेकिन भविष्य की ग्रोथ प्रोडक्टिविटी बढ़ाने, क्षमता विस्तार और लेबर फोर्स में भागीदारी बढ़ाने पर निर्भर करती है। भारत की पोटेंशियल ग्रोथ रेट 2003-2008 के 8% से घटकर अब 6.5%-7% के आसपास रहने का अनुमान है। प्रोडक्टिविटी का कम स्तर, प्राइवेट इन्वेस्टमेंट में सुस्ती, स्किल गैप और महिलाओं की कम लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन जैसी स्ट्रक्चरल समस्याएं ग्रोथ को रोक रही हैं। IMF ने FY26 में 7.6% ग्रोथ का अनुमान लगाया है, जो बाद में घटकर 6.4% के आसपास आ सकती है। ऐसे में, इन मूलभूत समस्याओं को सुलझाना लंबे समय तक हाई ग्रोथ बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है।

कर्ज-आधारित इकोनॉमी के मुख्य जोखिम

भारत की इस कर्ज-आधारित ग्रोथ मॉडल में कई जोखिम हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि क्या यह Household Debt पर आधारित कंजम्पशन ग्रोथ लंबे समय तक टिक पाएगी। भले ही भारत का Household Debt-to-GDP रेश्यो (45.5%) कुछ दूसरे देशों से कम है, लेकिन कर्ज की तेज रफ्तार और कंजम्पशन के लिए बढ़ते लोन (जो 46% से 55.3% तक है) इसे कमजोर बनाते हैं। यह दिखाता है कि कर्ज मुख्य रूप से खर्च के लिए लिया जा रहा है, न कि संपत्ति बनाने के लिए। लगातार महंगा होता कच्चा तेल, कमजोर रुपया और बढ़ता करंट अकाउंट डेफिसिट भी इकोनॉमी के लिए बड़े झटके साबित हो सकते हैं। कम लेबर प्रोडक्टिविटी और महिलाओं की कम भागीदारी जैसी स्ट्रक्चरल दिक्कतें भी ग्रोथ को सीमित कर रही हैं। इन सबको ठीक करने के लिए बड़े पॉलिसी बदलावों की जरूरत होगी।

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