लक्ष्यों को पूरा करने के लिए रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) और ट्रांसमिशन लाइनों (Transmission Lines) का तेजी से विस्तार जरूरी है। लेकिन ऐतिहासिक रूप से, जमीन अधिग्रहण (Land Acquisition), फंड की कमी और रेगुलेटरी अड़चनों के कारण इन क्षेत्रों में काफी देरी होती रही है।
कार्बन सिंक और जमीन के डायवर्जन पर सवाल
साथ ही, कार्बन सिंक (Carbon Sink) को बढ़ाने के लिए वनीकरण (Afforestation) और भूमि-आधारित परियोजनाओं पर निर्भरता है। ऐसे में, जब वनों की महत्वपूर्ण भूमि को विकास परियोजनाओं के लिए डायवर्ट किया जाता है, तो सवाल उठते हैं। उदाहरण के लिए, अकेले ग्रेट निकोबार द्वीपों पर परियोजनाओं के लिए हाल ही में 13,000 हेक्टेयर से ज्यादा वन भूमि आवंटित की गई है।
नीति की निरंतरता और रोडमैप का अभाव
भारत की अपडेटेड क्लाइमेट प्लान (NDC) में विभिन्न क्षेत्रों के लिए अलग-अलग रोडमैप (Roadmap) का अभाव भी चिंता का विषय है। इससे यह अनिश्चितता बनी हुई है कि भारी उद्योग (Heavy Industries) और परिवहन (Transport) जैसे क्षेत्रों से होने वाले उत्सर्जन (Emissions) को कैसे प्रबंधित किया जाएगा।
कोयले पर निर्भरता और फाइनेंसिंग गैप
तत्काल मांग को पूरा करने के लिए कोयला-आधारित बिजली उत्पादन (Coal-based Power Generation) का विस्तार, रिन्यूएबल एनर्जी की प्रगति को कमजोर कर सकता है। भारत की योजना 2034-35 तक 97,000 मेगावाट नई कोयला और लिग्नाइट थर्मल क्षमता जोड़ने की है। इसके लिए भारी फाइनेंस (Financing) की आवश्यकता होगी, लेकिन घरेलू बजट की सीमाएं और अप्रत्याशित अंतरराष्ट्रीय जलवायु फंड (International Climate Funds) कार्यान्वयन को और जटिल बना रहे हैं।
विकास (Growth) और डीकार्बोनाइजेशन (Decarbonisation) को संतुलित करने की यह कोशिश संस्थागत क्षमताओं (Institutional Capabilities) पर भारी पड़ सकती है। भारत के जलवायु लक्ष्य उसकी मंशा तो दर्शाते हैं, लेकिन सफलता स्पष्ट निगरानी, प्राप्य समय-सीमा और योजनाओं को यथार्थवादी ढंग से निष्पादित करने की अनुशासन पर निर्भर करेगी। राजनीतिक प्रतिबद्धता (Political Commitment) की निरंतरता भी एक महत्वपूर्ण चिंता बनी हुई है।