भारत पर जलवायु परिवर्तन का साया: जीडीपी से लेकर खेती तक, अर्थव्यवस्था पर बड़े खतरे के संकेत

ECONOMY
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AuthorNeha Patil|Published at:
भारत पर जलवायु परिवर्तन का साया: जीडीपी से लेकर खेती तक, अर्थव्यवस्था पर बड़े खतरे के संकेत
Overview

भारत की अर्थव्यवस्था इन दिनों तेजी से बदल रहे मौसम और जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरों से जूझ रही है। लेटेस्ट अनुमानों के मुताबिक, देश की जीडीपी को बड़ा नुकसान हो सकता है और 2030 तक एग्रीकल्चर प्रोडक्शन में 16% तक की गिरावट आ सकती है। बढ़ते एक्सट्रीम वेदर इवेंट्स इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचा रहे हैं, इंश्योरेंस की लागत बढ़ा रहे हैं और सरकारी खजाने पर भी दबाव डाल रहे हैं।

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बदलता मौसम, हिलता बाज़ार: भारत के सामने बढ़ते जलवायु जोखिम

भारत की आर्थिक चाल अब जलवायु परिवर्तन के सामने उसकी संवेदनशीलता से तय हो रही है। जैसे-जैसे औसत तापमान बढ़ रहा है और मौसम की चरम घटनाएं तेज हो रही हैं, देश कई तरह के जोखिमों का सामना कर रहा है। ये जोखिम एग्रीकल्चर से लेकर शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर और फाइनेंशियल स्टेबिलिटी तक फैले हुए हैं। अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन के कारण देश की जीडीपी को 10% तक के राष्ट्रीय आय के नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।

खेती-बाड़ी पर मंडराता खतरा

देश की आबादी के एक बड़े हिस्से के लिए रीढ़ की हड्डी माने जाने वाले एग्रीकल्चर सेक्टर पर इसका सबसे ज्यादा असर दिख रहा है। बेमौसम बारिश और हीट वेव के कारण 2030 तक फसल की पैदावार में 16% की गिरावट का अनुमान है। यह न सिर्फ खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका के लिए खतरा है, बल्कि खाने-पीने की चीजों की कीमतों में बढ़ोतरी भी कर सकता है। चिंता की बात यह है कि भारत की लगभग 68% आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से एग्रीकल्चर से जुड़ी है, जो मौसम पर बहुत निर्भर है। अनुमान है कि हर डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ने पर मुख्य फसलों की पैदावार में 5% से 20% तक का नुकसान हो सकता है।

इंफ्रास्ट्रक्चर पर बढ़ता बोझ

समुद्र का बढ़ता जलस्तर, भयानक बाढ़ और तीव्र चक्रवात भारत के तेजी से विकसित हो रहे इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए सीधा खतरा पैदा कर रहे हैं। रिपोर्ट बताती हैं कि इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश हो रहा है, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा ऐसे इलाकों में है जो जलवायु के लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं। अनुमान है कि दक्षिण एशिया (भारत सहित) में 2070 तक बाढ़ से होने वाला सालाना नुकसान $1 ट्रिलियन से अधिक हो सकता है।

इंश्योरेंस सेक्टर में उथल-पुथल

इंश्योरेंस कंपनियां पहले से ही बढ़ते क्लेम, प्रीमियम में बढ़ोतरी और हाई-रिस्क ज़ोन में इंश्योरेंस की अनुपलब्धता जैसी समस्याओं से जूझ रही हैं। जलवायु परिवर्तन की अनिश्चितताओं के कारण पारंपरिक जोखिम आकलन मॉडल पर भारी दबाव है। इसके लिए नए तरह के इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स और जोखिमों के बारे में अधिक पारदर्शिता की जरूरत है।

रिन्यूएबल एनर्जी का बढ़ता महत्व

जलवायु लक्ष्यों और ऊर्जा सुरक्षा की जरूरतों को पूरा करने के लिए, भारत तेजी से रिन्यूएबल एनर्जी (जैसे सोलर और विंड पावर) की क्षमता बढ़ा रहा है। 2030 तक 500 GW नॉन-फॉसिल फ्यूल क्षमता का लक्ष्य रखा गया है। यह सेक्टर सरकारी नीतियों, टेक्नोलॉजी की घटती लागतों और ESG-फोकस्ड निवेशकों की बढ़ती रुचि के कारण निवेश के बड़े अवसर पैदा कर रहा है।

फाइनेंशियल मार्केट्स पर असर

बैंकों और वित्तीय संस्थानों को अब सीधे जलवायु जोखिमों (जैसे मौसम से होने वाली तबाही) और ट्रांजिशन जोखिमों (डीकार्बोनाइजेशन के कारण होने वाले आर्थिक बदलाव) दोनों का सामना करना पड़ रहा है। जलवायु जोखिम डेटा और रिपोर्टिंग फ्रेमवर्क की कमी सटीक मूल्यांकन और क्रेडिट निर्णय लेने में एक बड़ी चुनौती पेश कर रही है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.